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तर्क और बुद्धि को महत्व देने पर ही मनुष्य के लिए बेहतर इंसान बन पाना संभव
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- फोटो : अमर उजाला
अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन में बांग्लादेशी मूल के अमेरिकी नागरिक जाइन सिद्दीकी की नियुक्ति से मुझे सचमुच बहुत खुशी मिली है। मेरी खुशी तब दोगुनी हो गई, जब मैंने पाया कि बांग्लादेश में जाइन सिद्दीकी की जड़ें जिस इलाके में है, उसे मैं अच्छी तरह जानती हूं। अपने जीवन में उसका नाम मुझे असंख्य बार लिखना पड़ा है। वह जगह है, ग्राम-मदारीनगर, पो.-नंदाइल, जिला- मैमनसिंह। यह मेरे पिता के पुश्तैनी घर का पता है।
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मैट्रिक पास करने के बाद मेरे पिता ने नंदाइल के मदारीनगर गांव से ब्रह्मपुत्र पार कर मैमनसिंह में आकर मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था। एक पिछड़े हुए गांव से निकलकर, दिन-रात पढ़ाई कर मेरे पिता डॉक्टर हुए थे। जाइन सिद्दीकी के पिता मुश्ताक अहमद सिद्दीकी ने भी निश्चय ही मेरे पिता की तरह गांव के चंडीपाशा स्कूल से मैट्रिक पास कर मैमनसिंह शहर में आकर डॉक्टरी की पढ़ाई की होगी।
मैं अनुमान कर सकती हूं कि जाइन सिद्दीकी ने अपने परिवार से शिक्षा, संस्कृति, सभ्यता, समता और समान अधिकार के जो पाठ पढ़े होंगे, उसने उन्हें समृद्ध किया होगा। इसी कारण वह अपने जीवन का स्पष्ट लक्ष्य सामने रखकर चल सके होंगे। इसी कारण शायद उनके रास्ते में कांटे नहीं रहे होंगे। जबकि मेरे परिवार में किसी को भी अपने जीवन में ऐसा आसान रास्ता नहीं मिला होगा। मेरे पिता ने पढ़ाई के दौरान ही स्कूल की एक छात्रा से शादी कर ली थी। छोटी उम्र में शादी हो जाने के कारण मेरी मां सातवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ पाईं। जबकि जाइन सिद्दीकी के माता-पिता, दोनों डॉक्टर थे। दूसरी ओर, मेरी मां की पूरी उम्र अपने बच्चों का पालन-पोषण करने तथा घर का काम निपटाने में ही गुजर गई। हम चार भाई-बहनों को घर में सिर्फ अनुशासन, डर और धमकियां मिलीं।
ऐसे माहौल में बच्चों को जीवन में आगे बढ़ने का दिशा-निर्देश नहीं मिलता। घर में सिर्फ पिता की चलती थी। मां और हम भाई-बहनों को उनके आदेशों का पालन करना पड़ता।
बाइडन के भाषण लेखक विनय रेड्डी हैं। शपथ ग्रहण के दिन बाइडन ने जो भाषण दिया था, उसके लेखक भी विनय रेड्डी थे। चुनाव अभियान के दौरान जो बाइडन और कमला हैरिस ने जो कुछ कहा था, वह सब विनय रेड्डी का लिखा हुआ ही था। यानी अमेरिका के राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के मुंह से हमने अब तक जो भी सुना है, उनके रचयिता विनय रेड्डी हैं, जो इसी उपमहाद्वीप के रहने वाले हैं। हालांकि उनका जीवन अमेरिका में बीता है।
भारतीय उपमहाद्वीप में रहते हुए बड़ा वैज्ञानिक, बड़ा आविष्कर्ता, बड़ा राजनीतिविद, बड़ा लेखक या बड़ा दार्शनिक होना संभव क्यों नहीं है? यूरोप-अमेरिका जाने से ही पहचान और प्रसिद्धि क्यों मिलती है? हमारे समाज में ऐसी क्या बाधा और बुराई है, जिसे खत्म कर देने पर समुद्र पार किए बिना भी हम बड़ा, महान और असाधारण हो सकते हैं? इसके लिए आवश्यक यह है कि हम समाज के लिए नुकसानदेह चीजों को खत्म कर अपनी दृष्टि को उदार और अपने कामकाज का दायरा व्यापक करें। अगर हम एकजुट होकर सम्मिलित कोशिश करें, तो पुरुष तंत्र और अपसंस्कृति के अंधकार को खत्म कर सकते हैं। लोग सभ्य होंगे, तो समाज सभ्य होगा। तर्क और बुद्धि को महत्व देने पर ही मनुष्य के लिए बेहतर इंसान बन पाना संभव है।
मेरी मां को अगर छोटी उम्र में शादी के बंधन में बांध नहीं दिया जाता, तो वह भी मेरे पिता की तरह डॉक्टर बन सकती थीं। आत्मनिर्भर होने पर मां का आत्मविश्वास भी बढ़ता। वैसी स्थिति में उन्हें चुपचाप पिता के हर उचित-अनुचित हुक्म का पालन नहीं करना पड़ता। वैसी स्थिति में हम भाई-बहनों में भी आत्मविश्वास बढ़ता। लेकिन ऐसा नहीं था। जीवन का पहला स्कूल हमारा परिवार ही होता है। वहां हम जो सीखते हैं, उसी से जीवन के प्रति हमारी सोच और धारणा बनती है। चूंकि मेरे पिता मेरी मां की बातों को महत्व नहीं देते
थे, इसलिए हम बहन-भाई भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते थे। विडंबना यह है कि इतने साल बाद भी इस उपमहाद्वीप के परिवारों और समाज में कोई बदलाव नहीं आया है। भारतीय मूल की महिला कमला हैरिस आज अमेरिका की उप-राष्ट्रपति हैं। भविष्य में वह राष्ट्रपति भी बन सकती हैं। उनके साथ भी यही बात है। वह इस उपमहाद्वीप में नहीं रहीं। अगर वह तमिलनाडु में बड़ी होतीं, तो क्या उनमें ऐसा आत्मविश्वास पैदा होता?
सच्चाई यह है कि इस उपमहाद्वीप के ज्यादातर नेता सिर्फ अपने बारे में ही सोचते हैं। उनके सामने कोई विराट स्वप्न, कोई महान आदर्श नहीं होता। कमला हैरिस यहां रहकर राजनीति करतीं, तो शायद ऐसी ही होतीं। भ्रष्टाचार और घमंड ने जयललिता का क्या हश्र किया था, लोग इसके गवाह हैं। विदेश जाकर कोई तरक्की करता है, तो हम फूले नहीं समाते। लेकिन अगर देश में ऐसी किसी प्रतिभा की झलक दिखती है, तो निहित स्वार्थ उसे नष्ट कर देने के लिए षड्यंत्र शुरू कर देते हैं। अगर षड्यंत्रकारियों की संख्या अधिक होती है, तो सरकारें भी उनके साथ हो जाती हैं। संभावनाशील प्रतिभा को या तो खत्म कर दिया जाता है या फिर उसे देश निकाला दे दिया जाता है। यह भी एक कारण है कि बेहतर पढ़ाई के लिए अपनी संतानों को यूरोप-अमेरिका भेज देने की होड़ मची हुई है। बालिग लोग भी अच्छी नौकरी के लिए विदेश जाते हैं।
बीमार होने पर बड़े लोग बेहतर इलाज के लिए विदेश चले जाते हैं। इसके बावजूद देश के लिए गर्व करने में, उनके देशप्रेम में कोई कमी नहीं आती। दोहरापन अगर इसे नहीं कहेंगे, तो फिर किसे कहेंगे? ऐसे लोगों को देखकर मैं थक चुकी हूं। अपने देश में रह पाने की संभावना को जिलाये रखने के लिए मैंने विकसित देशों की सुख-सुविधाओं से किनारा किया है। देश कब मेरे लिए अपने दरवाजे खोलेगा, इस उम्मीद में मैं उसके पड़ोसी देश में इंतजार कर रही हूं। बाहर रहते हुए भी मैं अपने देश के बारे में सोचती हूं, देश की मंगल कामना करती हूं। अपने देश के लोगों को सभ्य, शिक्षित और सजग बनाने के लिए मैं हमेशा लिखती हूं और जोखिम उठाती हूं।