{"_id":"f4de08243f468a7fc283f526133d37e8","slug":"how-to-win-how-losers-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"कैसे जीते, कैसे हारे","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
कैसे जीते, कैसे हारे
सहीराम
Updated Mon, 21 Sep 2015 07:35 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कोई जीता, कोई हारा तो देखो जी, चुनाव में होता है या फिर अखाड़े में। ऐसा हालांकि जिंदगी में भी होता है, पर पैंसठ का युद्ध हमने कैसे जीता, इसका पता दिल्ली में इंडिया गेट पर लगी एक प्रदर्शनी से चला। युद्ध की पचासवीं सालगिरह पर यह प्रदर्शनी लगाई गई थी। यह युद्ध हमने तब जीता था, जब हम विश्व विजय पर नहीं निकले थे और अमेरिका का दिया पीएल चार सौ अस्सी गेहूं खाकर काम चलाते थे।
विज्ञापन
आज हम विश्व विजय पर निकले हुए हैं, आईटी में अपनी जीत का झंडा गाड़ चुके हैं और जल्दी ही दुनिया की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था भी बन जाएंगे। विश्व गुरु तो हम खैर पहले से हैं ही। इसे देखने के लिए दिल्ली आने की जरूरत नहीं है। हम अपने गांवों और शहरों में भी कदम-कदम पर देख सकते हैं। पर दिल्ली चूंकि देश की राजधानी है, तो यहां इसकी बाकायदा प्रदर्शनी-सी लगी हुई है।
विज्ञापन
दरअसल दिल्ली में इस समय दो प्रदर्शनियां चल रही हैं। एक जीत की, एक हार की। हराया हमने पाकिस्तान को था और हारे हम अपने आप से हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि हम मच्छर से हार गए हैं। हमारे जवानों ने पैटन टैंक का तोड़ निकाल लिया था, पर हमारी सरकारों के पास डेंगू के मच्छर का कोई तोड़ नहीं है।
विज्ञापन
डेंगू की बीमारी का कोई इलाज नहीं है। इलाज के लिए पर्याप्त अस्पताल नहीं हैं। अस्पतालों में पर्याप्त बिस्तर नहीं हैं। मरीज एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर काटता रहता है। सरकारें और राजनीतिक पार्टियां मच्छर और इस मच्छर से पैदा होनेवाली बीमारी को एक-दूसरे के पाले में डाल रही हैं, जैसे मच्छर नहीं, गेंद हो कि यह लो, डाल दी तेरे पाले में। जैसे कह रहे हों कि यह मच्छर तेरा है, तूने पाला है, तू ही इस बीमारी के लिए जिम्मेदार है। दिल्ली के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से कह रहे हैं कि अभी तो मच्छर से लड़ रहे हैं, आपस में दो महीने बाद लड़ लेंगे। इस लड़ाई में उन दोनों में चाहे कोई भी जीते, पर मच्छर नहीं हारेगा। हारेगी तो जनता ही। हारना उसकी नियति जो बन गई है।