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ऐसे में कैसे पढ़ेंगी बेटियां

सुभाषिनी सहगल अली Updated Sat, 20 May 2017 11:44 AM IST
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सुभाषिनी सहगल अली
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हरियाणा से आने वाली भयावह और दिल दहला देने वाली खबरों के बीच अभी-अभी मन को तसल्ली देने वाली एक छोटी-सी खबर आई है। रोहतक में एक दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर उसकी निर्मम हत्या की खबरों ने रोहतक प्रशासन की उस चुप्पी को ढक दिया, जिसने उस लड़की के घरवालों की शिकायतों को एक महीन से अनसुना कर दिया था। इसके तुरंत बाद, रोहतक की ही एक बच्ची के सौतेले पिता (जो उसका सगा चाचा भी था) द्वारा महीनों से चल रहे बलात्कार की खबरें सामने आईं।
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अब उसी हरियाणा के रेवाड़ी जिले के गोठडा टप्पा दाहिना गांव से स्कूल में पढने वाली अस्सी बहादुर लड़कियों की जबरदस्त जीत की खबर आई है। उन्होंने अपनी जिद और निष्ठा के आगे हरियाणा सरकार और उसके उदासीन प्रशासन को झुका दिया और अपनी मांग मनवा ली। भीषण गर्मी की धूप झेलती ये लड़कियां धरने पर बैठी थीं। उनमें से आठ तो अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल कर रही थीं। पड़ोसी गांवों के लड़के और पुरुषों की रोजमर्रा की छींटाकशी, ताने, छेड़ने के मुकाबले भूख, प्यास, सूरज की तपन उनके लिए कम भयावह थे। ये लड़कियां गांव के सरकारी हाई स्कूल की छात्राएं हैं, जो दसवीं के बाद भी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं। पर आगे पढने के लिए उन्हें तीन किलोमीटर दूर उन्हीं गांवों से होकर जाना होगा, जहां वे डरावने लड़के और पुरुष उन्हें रास्ते भर जलील करने की कोशिश में जुटे रहते हैं। उनसे बचकर अपनी पढ़ाई जारी रखने का लड़कियों के सामने एक ही उपाय था, अपने गांव के स्कूल को बारहवीं तक अपग्रेड कराना।

 
हरियाणा की समाज-व्यवस्था पर केवल पुरुष प्रधानता ही नहीं, बल्कि जातिगत सोच और द्वेष भावना भी हावी है। इन लड़कियों के भय का एक कारण यह भी था कि उनके अपने गांव में जहां उनकी अपनी जाति का वर्चस्व है, वहीं आस-पास के गांवों में एक अन्य जाति के लोगों का। पुरुष प्रधानता और जातिगत भावना का मिश्रण महिलाओं के लिए काफी खतरनाक होता है। देश के हर कोने में, हर रोज़, कहीं न कहीं, जाति की इज्जत के नाम पर एक जाति के लोग दूसरी जाति की महिलाओं पर आक्रमण करते हैं। जातिवादी हमले पुरुषों पर भी होते हैं, पर चूंकि महिलाओं को हर जाति, परिवार, समुदाय और राष्ट्र की इज्जत का प्रतीक माना जाता है, इसलिए उन्हें जातिगत प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की लड़ाई में विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है।
 
रेवाड़ी की लड़कियों की लड़ाई केवल अपनी पढ़ाई जारी रखने की थी और उनके तमाम गांव वालों ने उनका पूरा साथ दिया। जब लड़कियों को बचाने और पढ़ाने के सैकड़ों वायदे करने वाली सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी, तो लड़कियों ने संघर्ष का रास्ता अपनाया। उनकी भूख, प्यास और भीषण गर्मी की तपन से भी सरकार का दिल हफ्ते भर तक नहीं पसीजा। आठवें दिन, जब रेवाड़ी की बहादुर बेटियों की कहानी पूर देश को विचलित करने लगी, तब सरकार ने गांव के लोगों को लिखित आश्वासन दिया कि उनका स्कूल बारहवीं तक कर दिया जाएगा।

अपनी बहादुर बेटियों के प्रति शायद गांव के लोगों में आदर और सम्मान की भावना भी जाग उठी होगी। वे बेटियां देश भर में पढ़ने के लिए उत्सुक, लेकिन परिस्थितियों से डरी हुई करोड़ों लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई हैं। लेकिन असली सवाल तो जस का तस है कि हरियाणा में स्कूल जाने के रास्ते इतने असुरक्षित क्यों हैं? हरियाणा सरकार कब तक इन सवालों से बचती रहेगी?

-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं

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