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आबादी का सही नियोजन कैसे हो

Tue, 10 Jul 2018 05:32 PM IST
अनुराग दीक्षित
अनुराग दीक्षित Updated Tue, 10 Jul 2018 05:32 PM IST
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How to make the right place for the population
अनुराग दीक्षित
आज से करीब तीन दशक पहले वर्ष 1989 में आज ही के दिन से विश्व की बढ़ती जनसंख्या को लेकर मंथन की शुरुआत हुई। इसी के मद्देनजर हर दस साल बाद हमारे मुल्क में जनगणना होती है। आबादी के आंकड़े ही केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बनाई जाने वाली योजनाओं का प्रमुख आधार होते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना ने बताया कि भारत की आबादी एक अरब 21 करोड़ है। वर्ष 2001 से 2011 के दरमियान 17.6 फीसदी की रफ्तार से 18 करोड़ आबादी बढ़ चुकी थी। ये साल 1991 से 2001 की 21.5 फीसदी की वृद्धि दर के मुकाबले करीब चार फीसदी कम थी, जो यकीनन राहत की बात है, लेकिन चुनौती यहीं खत्म नहीं होती। 

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भारत और चीन की आबादी का अंतर 10 साल में 23 करोड़ 80 लाख से घटकर 13 करोड़ 10 लाख हो चुका है। जानकार बता रहे हैं कि अगले छह साल में आबादी के मामले में हम चीन को पछाड़ देंगे। अगले 10—12 वर्षों में हमारी आबादी 1.5 अरब के पार हो जाएगी। यह तब है, जबकि 1,952 में परिवार नियोजन अभियान अपनाने वाला दुनिया का पहला देश भारत था। मगर आज दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला मुल्क भारत है। हमारे हर सूबे की आबादी दुनिया के किसी मुल्क के बराबर है।

आबादी के लिहाज से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है, जिसकी आबादी ब्राजील के बराबर है। वैसे ऐसा नहीं कि बढ़ती आबादी पर नीतियां नहीं बनीं या मंथन नहीं हुआ। बदलते वक्त में हालात कुछ सुधरे भी हैं। जागरूकता और बेहतर सुविधाओं के चलते शहरों में गांवों के मुकाबले बेहतर हालात नजर आते हैं। शहरी इलाकों में जन्म दर सिर्फ 1.8 है, जबकि ग्रामीण इलाकों में 2.5 है। इसी तरह कम विकसित राज्यों के मुकाबले विकसित राज्यों में आबादी नियंत्रण के आंकड़े राहत देते हैं। 

वैसे दिक्कत ज्यादा आबादी की नहीं, बल्कि उसके हिसाब से जरूरी संसाधनों के उपलब्ध न हो पाने की है। दुनिया की 17 फीसदी से ज्यादा आबादी हमारी है, जबकि दुनिया का केवल चार फीसदी पानी और 2.5 फीसदी जमीन ही हमारे पास है। समझा जा सकता है कि चुनौती कितनी बड़ी है। करोड़ों भारतीय जिंदगी की बुनियादी जरूरतों तक से महरूम हैं। विश्व बैंक के मुताबिक, करीब 22 करोड़ लोग हमारे मुल्क में गरीबी रेखा के नीचे हैं। मुल्क की 15 फीसदी आबादी कुपोषण का शिकार है। बच्चों में कुपोषण की दर 40 फीसदी है। 65 फीसदी आबादी के पास शौचालय तक नहीं है, जबकि 26 फीसदी आबादी निरक्षर है। जिस देश में हर साल 1.2 करोड़ लोग रोजगार के बाजार में आते हों, वहां रोजगार बड़ी चुनौती बना चुका है। 

जाहिर है हालात बेहद गंभीर हैं, लेकिन आबादी को लेकर सियासत भी जारी है। इस बीच, कुछ राज्यों ने अनोखी पहल भी की। योगी आदित्यनाथ ने नवविवाहित जोड़ों के लिए शगुन योजना की शुरुआत की। असम में दो से ज्यादा बच्चे वालों को सरकारी नौकरी न मिलने की नीति बनी, तो गुजरात में दो से ज्यादा बच्चों के अभिभावकों के पंचायत चुनाव लड़ने पर रोक लगी। लेकिन बढ़ती आबादी को लेकर ढेरों सवाल अब भी कायम हैं। जैसे, क्या बढ़ती आबादी की बड़ी वजह अशिक्षा और पिछड़ापन रहा है? अगर हां, तो बढ़ती आबादी को धर्म और जाति के चश्मे से क्यों देखा जाता है?

राज्यों की नीतिगत विफलताओं का दोष समाज के मत्थे क्यों मढ़ा जाता है? बढ़ती आबादी पर सियासी घमासान क्यों है? क्या आबादी पर काबू के लिए सख्त कानून की दरकार है?बेहतर हो नीति-निर्माता और समाज मिलकर महिला साक्षरता और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों पर जोर दें, ताकि लोग परिवार नियोजन से जुड़े सही फैसले ले सकें और आबादी उपलब्धि साबित हो न कि बोझ!
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