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निपाह से कैसे निपटें
पत्रलेखा चटर्जी, वरिष्ठ पत्रकार
Updated Sun, 03 Jun 2018 06:41 PM IST
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निपाह वायरस
देश में एक नई चीज चर्चा में है। यह राजनीति से संबंधित नहीं है, जो हमारे यहां पारंपरिक रूप से सुर्खियां बटोरती है। आजकल एक नया शब्द चर्चा में है : निपाह। निपाह वायरस जानवरों के जरिये इंसानों में फैलता है। वैश्विक स्तर पर देखें, तो साठ फीसदी संक्रमित बीमारियां जानवरों से इंसानों में फैलती हैं। तथ्य यह है कि जो केरल पूरे देश में अपनी सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्य सेवा के लिए जाना जाता है, निपाह वायरस का कहर वहीं टूटा है। केरल इस वायरस का पहली बार सामना कर रहा है।
इस वायरस का नाम निपाह मलयेशिया के उस गांव काम्पुंग सुंगई निपाह के नाम पर पड़ा है, जहां से इसकी शुरुआत हुई। जहां तक ज्ञात है, इस वायरस से 1990 के दशक के उत्तरार्ध में मलयेशिया और सिंगापुर में पहली बार कुछ मौतें हुईं। उसके बाद पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसका नाम सुना गया।
पिछले एक पखवाड़े में निपाह वायरस ने केरल के कोझिकोड और मल्लपुरम जिलों में 16 जानें ली हैं। फिलहाल इस वायरस का कोई टीका नहीं है। केरल में इस त्रासदी की सबसे मर्मांतक कहानी लिनी पुत्तुजेरी की थी, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। दो बच्चों की मां पुत्तु एक नर्स थी और कोझिकोड जिले के एक अस्पताल में निपाह वायरस से पीड़ित मरीजों की देखभाल कर रही थी। वहां वह खुद इस वायरस से संक्रमित हो गई। जब पुत्तु समझ गई कि वह नहीं बचने वाली, तो उसने अपने पति को एक मार्मिक चिट्ठी लिखी, जिसमें उसने दोनों छोटे बच्चों का ठीक से देखभाल करने का अनुरोध किया था। इस चिट्ठी ने एक मरणासन्न पत्नी की पीड़ा ही सामने नहीं रखी, बल्कि जानवरों से मनुष्यों में फैलती बीमारी की भीषणता से भी हमारा साक्षात्कार कराया, जो भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है।
केंद्र सरकार का कहना है कि केरल में निपाह वायरस का फैलना एक स्थानीय समस्या है। केरल जिस तत्परता से इसका मुकाबला कर रहा है, हालांकि उसकी तारीफ भी हो रही है। लेकिन संकट के इस समय में आत्मसंतुष्टि के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। खुद राज्य सरकार निपाह से निपटने की तमाम कोशिशें कर रही है। उसने सावधानी बरतते हुए कई कदम उठाए हैं। जैसे, उसने अग्रिम सूचना तक कोझिकोड और मल्लपुरम जिलों में होने वाली तमाम बैठकें रद्द कर दी हैं। निपाह वायरस की चपेट में आए कुछ नर्सों और डॉक्टरों को छुट्टी पर भेज दिया गया है। कई परीक्षाएं भी रद्द कर दी गई हैं।
केरल में निपाह वायरस के फैलने की क्या वजह रही? अभी तक हमारे पास इसका कोई सटीक उत्तर नहीं है, और इस बारे में पड़ताल चल रही है। फलों का रस चूसने वाले चमगादड़ निपाह वायरस के प्राकृतिक वाहक हैं। लेकिन मलयेशिया में सूअर इस वायरस के वाहक होते हैं। केरल में इस वायरस के कहर ने मनुष्य से मनुष्य के संक्रमित होने के बड़े खतरे के बारे में बताया है। दरअसल पशुओं के जरिये फैलने वाली बीमारी के बढ़ने का कारण जलवायु परिवर्तन और जंगलों का विनाश भी है, जिससे पशुओं के भोजन की उपलब्धता में कमी आ रही है, जिससे वे शहरी इलाकों के नजदीक आते जा रहे हैं।
केरल की स्वास्थ्य वैसे भी बेहतरीन है, अगर यह वायरस उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में फैले, तो नुकसान की सिर्फ कल्पना की जा सकती है। हालांकि केरल के उप जिला अस्पतालों में, जहां इस वायरस से पीड़ित लोगों का शुरुआती इलाज चला, न केवल मरीजों का बोझ ज्यादा है, बल्कि वे अस्पताल इस वायरस को और फैलने से रोक भी नहीं पाए। हालांकि अब वहां निपाह से निपटने की हरसंभव कोशिशें हो रही हैं।
केरल में निपाह वायरस के इस कहर ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की याद दिला दी है, जहां हर साल जापानी इन्सेफलाइटिस से, जो मच्छरों से फैलता है, बच्चे मरते हैं। वहां यह बीमारी पिछले चार दशक से सक्रिय है, और पिछले साल इस कारण हुई मौतों से पूरे देश का ध्यान गोरखपुर की ओर गया था। इस बार उत्तर प्रदेश सरकार ने इन्सेफलाइटिस के खिलाफ विगत दो अप्रैल से दस्तक अभियान की शुरुआत की।
इसके अंतर्गत सरकारी अफसरों ने जागरूकता फैलाने और समय पर टीकाकरण सुनिश्चित करने के लिए इस बीमारी से प्रभावित 38 जिलों में जाकर काम किया। यह मुहिम 16 अप्रैल को समाप्त हुई। वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने इस अभियान की सफलता पर राज्य सरकार को बधाई भी दी है। लेकिन जैसा कि ज्ञात है, मानसून आने के बाद असल चुनौती होगी, जब इन्सेफलाइटिस का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। यह जरूर है कि टीका कई संक्रामक रोगों के खिलाफ एक कारगर हथियार हैं, पर आज भी कई प्रकार के वायरस के लिए कोई टीका मौजूद नहीं है।
सवाल यह है कि ऐसी परिस्थिति में राज्य को क्या करना चाहिए। ऐसे संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए ठीक तरह से देखभाल और जागरूकता अहम तरीके हो सकते हैं। रोग की जल्द पहचान से जीवन बचाया जा सकता है। संक्रमण की रोकथाम और नियंत्रण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जरूरी यह है कि रोगी को सामान्य लोगों से अलग रखा जाए। यहां तक कि उन लोगों से भी, जो रोगी की देखभाल, दवा-पानी, परीक्षण आदि करते हैं। रोगियों के चलने-फिरने को भी कम किया जाना चाहिए। यह संक्रमण को फैलने से रोकने में मदद करेगा। इसके अलावा भी इसकी रोकथाम के कई उपाय हैं, जैसे नियमित हाथ धोना, संक्रमण वाले किसी भी व्यक्ति से दूर रखना। और साथ ही उन जानवरों के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष संपर्क से बचना, जो संक्रमण फैलाने का काम करते हैं।
निपाह वायरस से लड़ने (पहचान, निदान और टीकाकरण) के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल ही में एक टास्क फोर्स बनाई है। हालांकि, जब तक यह उपलब्ध न हो जाए, तब तक, भारत में खतरे को टालने और संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए निगरानी, जागरूकता और रोकथाम सबसे प्रभावी तरीके होंगे।
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इस वायरस का नाम निपाह मलयेशिया के उस गांव काम्पुंग सुंगई निपाह के नाम पर पड़ा है, जहां से इसकी शुरुआत हुई। जहां तक ज्ञात है, इस वायरस से 1990 के दशक के उत्तरार्ध में मलयेशिया और सिंगापुर में पहली बार कुछ मौतें हुईं। उसके बाद पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसका नाम सुना गया।
पिछले एक पखवाड़े में निपाह वायरस ने केरल के कोझिकोड और मल्लपुरम जिलों में 16 जानें ली हैं। फिलहाल इस वायरस का कोई टीका नहीं है। केरल में इस त्रासदी की सबसे मर्मांतक कहानी लिनी पुत्तुजेरी की थी, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। दो बच्चों की मां पुत्तु एक नर्स थी और कोझिकोड जिले के एक अस्पताल में निपाह वायरस से पीड़ित मरीजों की देखभाल कर रही थी। वहां वह खुद इस वायरस से संक्रमित हो गई। जब पुत्तु समझ गई कि वह नहीं बचने वाली, तो उसने अपने पति को एक मार्मिक चिट्ठी लिखी, जिसमें उसने दोनों छोटे बच्चों का ठीक से देखभाल करने का अनुरोध किया था। इस चिट्ठी ने एक मरणासन्न पत्नी की पीड़ा ही सामने नहीं रखी, बल्कि जानवरों से मनुष्यों में फैलती बीमारी की भीषणता से भी हमारा साक्षात्कार कराया, जो भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है।
केंद्र सरकार का कहना है कि केरल में निपाह वायरस का फैलना एक स्थानीय समस्या है। केरल जिस तत्परता से इसका मुकाबला कर रहा है, हालांकि उसकी तारीफ भी हो रही है। लेकिन संकट के इस समय में आत्मसंतुष्टि के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। खुद राज्य सरकार निपाह से निपटने की तमाम कोशिशें कर रही है। उसने सावधानी बरतते हुए कई कदम उठाए हैं। जैसे, उसने अग्रिम सूचना तक कोझिकोड और मल्लपुरम जिलों में होने वाली तमाम बैठकें रद्द कर दी हैं। निपाह वायरस की चपेट में आए कुछ नर्सों और डॉक्टरों को छुट्टी पर भेज दिया गया है। कई परीक्षाएं भी रद्द कर दी गई हैं।
केरल में निपाह वायरस के फैलने की क्या वजह रही? अभी तक हमारे पास इसका कोई सटीक उत्तर नहीं है, और इस बारे में पड़ताल चल रही है। फलों का रस चूसने वाले चमगादड़ निपाह वायरस के प्राकृतिक वाहक हैं। लेकिन मलयेशिया में सूअर इस वायरस के वाहक होते हैं। केरल में इस वायरस के कहर ने मनुष्य से मनुष्य के संक्रमित होने के बड़े खतरे के बारे में बताया है। दरअसल पशुओं के जरिये फैलने वाली बीमारी के बढ़ने का कारण जलवायु परिवर्तन और जंगलों का विनाश भी है, जिससे पशुओं के भोजन की उपलब्धता में कमी आ रही है, जिससे वे शहरी इलाकों के नजदीक आते जा रहे हैं।
केरल की स्वास्थ्य वैसे भी बेहतरीन है, अगर यह वायरस उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में फैले, तो नुकसान की सिर्फ कल्पना की जा सकती है। हालांकि केरल के उप जिला अस्पतालों में, जहां इस वायरस से पीड़ित लोगों का शुरुआती इलाज चला, न केवल मरीजों का बोझ ज्यादा है, बल्कि वे अस्पताल इस वायरस को और फैलने से रोक भी नहीं पाए। हालांकि अब वहां निपाह से निपटने की हरसंभव कोशिशें हो रही हैं।
केरल में निपाह वायरस के इस कहर ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की याद दिला दी है, जहां हर साल जापानी इन्सेफलाइटिस से, जो मच्छरों से फैलता है, बच्चे मरते हैं। वहां यह बीमारी पिछले चार दशक से सक्रिय है, और पिछले साल इस कारण हुई मौतों से पूरे देश का ध्यान गोरखपुर की ओर गया था। इस बार उत्तर प्रदेश सरकार ने इन्सेफलाइटिस के खिलाफ विगत दो अप्रैल से दस्तक अभियान की शुरुआत की।
इसके अंतर्गत सरकारी अफसरों ने जागरूकता फैलाने और समय पर टीकाकरण सुनिश्चित करने के लिए इस बीमारी से प्रभावित 38 जिलों में जाकर काम किया। यह मुहिम 16 अप्रैल को समाप्त हुई। वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने इस अभियान की सफलता पर राज्य सरकार को बधाई भी दी है। लेकिन जैसा कि ज्ञात है, मानसून आने के बाद असल चुनौती होगी, जब इन्सेफलाइटिस का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। यह जरूर है कि टीका कई संक्रामक रोगों के खिलाफ एक कारगर हथियार हैं, पर आज भी कई प्रकार के वायरस के लिए कोई टीका मौजूद नहीं है।
सवाल यह है कि ऐसी परिस्थिति में राज्य को क्या करना चाहिए। ऐसे संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए ठीक तरह से देखभाल और जागरूकता अहम तरीके हो सकते हैं। रोग की जल्द पहचान से जीवन बचाया जा सकता है। संक्रमण की रोकथाम और नियंत्रण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जरूरी यह है कि रोगी को सामान्य लोगों से अलग रखा जाए। यहां तक कि उन लोगों से भी, जो रोगी की देखभाल, दवा-पानी, परीक्षण आदि करते हैं। रोगियों के चलने-फिरने को भी कम किया जाना चाहिए। यह संक्रमण को फैलने से रोकने में मदद करेगा। इसके अलावा भी इसकी रोकथाम के कई उपाय हैं, जैसे नियमित हाथ धोना, संक्रमण वाले किसी भी व्यक्ति से दूर रखना। और साथ ही उन जानवरों के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष संपर्क से बचना, जो संक्रमण फैलाने का काम करते हैं।
निपाह वायरस से लड़ने (पहचान, निदान और टीकाकरण) के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल ही में एक टास्क फोर्स बनाई है। हालांकि, जब तक यह उपलब्ध न हो जाए, तब तक, भारत में खतरे को टालने और संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए निगरानी, जागरूकता और रोकथाम सबसे प्रभावी तरीके होंगे।