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विफल पड़ोसी से कैसे निपटें

Tue, 07 Oct 2014 07:40 PM IST
अजय साहनी
अजय साहनी Updated Tue, 07 Oct 2014 07:40 PM IST
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how to cope with failed neighbour

भारत और पाकिस्तान की सीमा रेखा पर हाल में हुई गोलाबारी की वजह से एक बार फिर दोनों देशों के बीच तनाव बेशक गहरा गया हो, मगर इसमें ज्यादा अचंभे वाली कोई बात नहीं है। दरअसल वर्ष का यह समय पाकिस्तान के लिए घुसपैठ का अंतिम मौका होता है, क्योंकि एक बार बर्फ गिरनी शुरू होने के बाद भारत में घुसपैठ करना मुश्किल हो जाता है। वैसे अगर आंकड़ों के लिहाज से भी देखें, तो पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष ऐसी वारदातें कम हुई हैं। हां, यह फर्क जरूर है कि हर बार जहां सैनिक ज्यादा मारे जाते हैं, इस बार नागरिकों की मौतें ज्यादा हुई हैं। सीजफायर के उल्लंघन की आड़ में घुसपैठ को अंजाम देना पाकिस्तान का पुराना रवैया रहा है।

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दरअसल पाकिस्तान की ओर से जब भी ऐसी कोई घटना होती है, हमारे यहां तीखी प्रतिक्रियाएं और अटकलें शुरू हो जाती हैं। सभी को समझना चाहिए कि कुछ प्रक्रियाएं लगातार चलती रहती हैं। फिर चाहे वे राजनीतिक वार्ताएं हों, या आतंकवादी हलचलें। दिक्कत तब पैदा होती है, जब ये प्रक्रियाएं एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश करने लगती हैं। यह एक लड़ाई चल रही है, और ऐसी लड़ाइयों में हर गोली के बाद सवाल नहीं पूछा जाता। इन मामलों में ईद या दीपावली कोई मायने नहीं रखते। पाकिस्तान की सेना को जब भी मौका मिलता है, वह ऐसी ही हरकतें करती है, ताकि सेना की स्थानीय टुकड़ियों का ध्यान बंटाकर घुसपैठियों को भारत में दाखिल कराया जा सके। इसमें वजह ढूंढने की जरूरत नहीं है।
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वे कश्मीर के मुद्दे को लगातार उछालना चाहते हैं, दुश्मनी को बरकरार रखना चाहते हैं, और जब भी मौका मिले, भारत को हरसंभव नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। पिछले तमाम वर्षों से यही पाकिस्तान का दीर्घकालीन प्रोजेक्ट बना हुआ है। भारत को लेकर उसकी सोच एक घटना के जरिये समझी जा सकती है। एक बार परवेज मुशर्रफ से पूछा गया कि अगर कश्मीर का मुद्दा खत्म हो जाए, तो क्या भारत और पाकिस्तान की दुश्मनी खत्म हो जाएगी। उनका जवाब था, 'कभी नहीं'।
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अब अमेरिका भी पाकिस्तान की असलियत समझने लगा है। पाकिस्तान की फौज कभी नहीं चाहेगी कि भारत के साथ उसकी सुलह हो। यह बुनियादी लड़ाई है, जिसका दीर्घकालिक समाधान ढूंढना होगा। सिर्फ वार्ताओं और समझौतों से कुछ हाथ नहीं आने वाला। पिछले छियासठ वर्षों से पाकिस्तान के खिलाफ भारत रक्षात्मक नीति अपनाए हुए है। यदि भारत से तुलना करें, तो पाकिस्तान तकरीबन आठ गुना छोटा देश है। फिर भी उसकी तमाम हरकतों को हम नजरअंदाज करते रहें, तो यह कहां तक सही है!

पाकिस्तान के संदर्भ में हमारी नीति ही गलत रही है। दरअसल नीति क्षमता से ही परिभाषित होती है। सच तो यह है कि पाकिस्तान हमें नुकसान पहुंचाता जाता है, फिर भी हम कुछ नहीं करते, क्योंकि हमारे पास क्षमता नहीं है। जैसा पाकिस्तान हमारे साथ करता है, वैसा ही व्यवहार हम चीन के साथ करें, तो क्या चीन इतना धैर्य दिखाएगा!

पाकिस्तान को लेकर हमारे पास विकल्प ही नहीं होते। हम या तो बात करेंगे, या उसकी हरकतों पर नाराजगी जताते हुए बातचीत बंद कर देते हैं। तीसरा कोई विकल्प ही नहीं है हमारे पास। तीसरा विकल्प ताकत बढ़ाने से आएगा। जब पाकिस्तान को एहसास होने लगेगा कि हममें उसे नुकसान पहुंचाने की क्षमता है, तभी उसके दिमाग ठिकाने आएंगे।
नरेंद्र मोदी वैश्विक समुदाय के सामने भारत की छवि बदल सकते हैं, मगर असलियत तो धीरे-धीरे ही बदलेगी।

पाकिस्तान की किसी हरकत पर प्रतिक्रिया देते वक्त उन्हें त्रिसूत्रीय नीति अपनानी चाहिए। पहला, पाकिस्तान को उसकी भाषा में ही जवाब दिया जाए। मतलब जितना नुकसान वह करे, प्रत्यक्ष तौर पर उसे भी उतना ही नुकसान पहुंचाया जाए। दूसरा, पाकिस्तान से ऐसे सभी ताल्लुकात खत्म करने चाहिए, जिनसे उसे फायदा पहुंचता हो। उसे किसी भी स्तर पर मदद देने की कोई जरूरत नहीं है। उन रास्तों को ढूंढा जाए, जहां से उसे नुकसान पहुंचाया जा सकता है। और सबसे महत्वपूर्ण तीसरी बात, पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर अंकुश लगाने की लगातार कोशिश की जाए।

दरअसल भारत के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। भारत को अमेरिका और दुनिया के तमाम देशों को समझाना चाहिए कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए बड़ा खतरा हैं। भारत को एक वैश्विक जनादेश के निर्माण की कोशिश करनी चाहिए। व्यापारिक रिश्तों को सुधारने या नवाज शरीफ से बात करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला।

सवाल उठ सकता है कि एक परमाणु संपन्न और विफल पड़ोसी राष्ट्र के साथ ऐसा बर्ताव क्या भारत के लिए नुकसानदायक साबित नहीं होगा? मगर इसके सिवाय हमारे पास रास्ता क्या है? हमें समझना होगा कि उम्मीद बेशक हम 'सबसे बेहतर' की करें, मगर सुरक्षा की तैयारियां 'सबसे खराब स्थिति' को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए। जिस तेजी के साथ पाकिस्तान के हालात बिगड़ रहे हैं, उसे देखते हुए अगर आने वाले कुछ वर्षों में उसकी हालत इराक या सीरिया जैसी हो गई, या इस्लामिक स्टेट का प्रभाव वहां बढ़ने लगा, तो हम क्या करेंगे।


ध्यान रहे, पाकिस्तानी फौज जिहादी फौज है। यदि पाकिस्तान की स्थिति बिगड़ी, तो न नवाज कुछ कर पाएंगे, और न हम। अगर अब हमने खुद से यह सवाल नहीं पूछा, तो देर होने की पूरी आशंका है। भारत को अपनी तैयारियों के लिए कमर कस लेनी चाहिए। हमें रूस, इजरायल और अमेरिका जैसे देशों को अपने भरोसे में रखना होगा। पाकिस्तान ध्वस्त हो रहा है, हमारी चिंता केवल अपनी सुरक्षा को बनाए रखने की होनी चाहिए।

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