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कैसे बदलें पुरुषों की सोच

Sun, 08 Mar 2020 05:50 PM IST
Raman Singh क्षमा शर्मा
क्षमा शर्मा Published by: Raman Singh Updated Sun, 08 Mar 2020 05:50 PM IST
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How to change men's thinking
क्षमा शर्मा - फोटो : a

निर्भया के दोषियों को जल्दी ही फांसी हो जाने की उम्मीद है। उनके सारे कानूनी विकल्प समाप्त हो गए हैं। ये चारों युवा अगर साधारण जीवन जीते, तो क्या इस गति को प्राप्त होते? इनके किए की सजा इनके घरवालों को भी मिल रही है। बहुत से देशों में दुष्कर्म साबित होने पर फांसी दी जाती है। अपने यहां भी बारह साल की बच्चियों के साथ ऐसा करने पर फांसी देने का कानून हाल ही में पारित किया गया है। लेकिन क्या फांसी देने भर से इस समस्या का हल हो सकता है! क्या लोग वाकई कानून से इतना डरते हैं कि अपराध करना छोड़ देते हैं? अनुभव कहता है कि नहीं। निर्भया के साथ जिस तरह दरिंदगी की गई थी, उसके बाद हुए आंदोलन में यही मांग तो हुई थी कि ऐसा कठोर कानून बने कि अपराधी डरें। आनन-फानन में नया दुष्कर्म कानून बनाया भी गया, लेकिन अपराध रुके नहीं। कानून से इन अपराधियों को नहीं बदला जा सकता, तो कैसे बदला जा सकता है?


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निर्भया के प्रति हुए अपराध के तुरंत बाद एक शोध छात्रा मधुमिता पांडेय ने तिहाड़ जेल में 142 ऐसे लोगों से बात की थी, जिन पर बलात्कार के आरोप लगे थे। तब वह एंजिला रस्किन विश्वविद्यालय, कैंब्रिज में शोध कर रही थीं। अब वह इंग्लैंड की शेफील्ड यूनिवर्सिटी में अपराध विज्ञान पढ़ाती हैं। हाल ही में उनका इंटरव्यू छपा है। उन्होंने पाया कि फांसी का डर लोगों को बलात्कार जैसे जघन्य अपराध से विरत नहीं करता। इन लोगों से बातचीत करके वह देखना चाहती थीं कि क्या ये लोग हमारे समाज से अलग होते हैं। मधुमिता को शुरू में इन लोगों से बातचीत करने में डर लग रहा था। लेकिन बातचीत के बाद उन्हें इन लोगों के लिए दुख हुआ। मधुमिता कहती हैं कि बलात्कार से इतनी शर्म जुड़ी है कि ये लोग उससे बचना चाहते हैं। इसलिए अपने अपराध को कभी स्वीकार भी नहीं करते। इन्हें यह भी नहीं लगता कि इन्होंने कुछ गलत किया है। मधुमिता के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर अपनी मां को बहुत चाहते हैं। ऐसे में, इनके द्वारा इस तरह के अपराध को अंजाम देना आश्चर्यजनक ही है।

सोचने की बात यही है कि इन पुरुषों की सोच को कैसे बदला जाए। कैसे उन्हें समझाया जाए कि औरतों के प्रति अपराध करके वे अपने पुरुषत्व को साबित नहीं कर रहे हैं, क्योंकि अपराध से कभी किसी को जीता नहीं जा सकता। किसी के प्रति अपराध अक्सर बदला लेने के लिए किया जाता है। लेकिन उन महिलाओं, बच्चियों से कैसा बदला,  जिन्हें आप जानते तक नहीं! सिर्फ स्त्री का शरीर ही अगर उसके खिलाफ अपराध का कारण है, तो यही कहना होगा कि इसी शरीर पर अपनी ताकत का इस्तेमाल करने के लिए बलात्कार जैसे अपराध होते हैं। अक्सर ऐसे अपराधियों की तुलना पशुओं से की जाती है। लेकिन क्या किसी पशु को आपने ऐसा अपराध करते देखा है? वे मोर की तरह नाचते या नर कोयल की तरह गाकर अपनी मादाओं को आकर्षित करते पाए जाते हैं, अपराध करके नहीं। मधुमिता इन अपराधियों को सुधारने के पक्ष में हैं, क्योंकि दुनिया भर में ऐसे कोई सुबूत नहीं पाए गए हैं कि अपराधी को फांसी देने से अपराध रुक जाते हैं।

तो फिर क्या किया जाए? एक अकेली स्त्री के खिलाफ अपराध, तो होते ही है, लेकिन इन दिनों तो ऐसा महसूस होता है कि परिवार के साथ भी कोई स्त्री हो, तो भी कई बार उसके प्रति अपराध किया जाता है। इससे कैसे इनसे निपटें? कानून, पुलिस, सरकारें समाजसेवी संस्थाएं मिल-बैठकर साझा प्रयास करें, तो शायद कुछ बात बने।

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