फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   How to become a farming profit deal

खेती लाभ का सौदा कैसे बने

Sun, 30 Apr 2017 05:28 PM IST
वरुण गांधी
वरुण गांधी Updated Sun, 30 Apr 2017 05:28 PM IST
विज्ञापन
 How to become a farming profit deal
वरुण गांधी

वर्ष 1865 में जब अमेरिकी गृहयुद्ध खत्म हुआ और अमेरिका में कपास का उत्पादन फिर से शुरू हुआ, तो भारतीय कपास की मांग घट गई। बॉम्बे प्रेसिडेंसी में कपास की खेती करने वाले किसानों की संख्या घट गई। साहूकारों द्वारा किसानों को कर्ज देने से इन्कार करने या ज्यादा सूद वसूलने के कारण विवादों की संख्या बढ़ गई। इससे पूरे देश में दंगे फैल गए और 1875 में पुणे के निकट सुपा गांव में डक्कन विद्रोह हुआ। नाराज किसानों ने साहूकारों पर हमले कर दिए और उनके घरों में आग लगा दी। इस विद्रोह ने 30 से ज्यादा गांवों को प्रभावित किया। बॉम्बे प्रेसिडेंसी ने 1878 में डक्कन दंगा आयोग का गठन किया, जिसकी रिपोर्ट में कहा गया कि किसानों के भोजन और अन्य छोटी-छोटी जरूरतों, जैसे बीज, बैल आदि का समय-समय पर सरकार द्वारा निरंतर आकलन किया जाना चाहिए। इसमें किसानों की ऋणग्रस्तता को खत्म करने के लिए कैद, घर बेचकर ऋण वसूली, देनदारों से भारी रकम जुटाने के लिए अदालती प्रक्रिया खत्म करने जैसे प्रावधानों की सिफारिश की गई। लेकिन ऐसा लगता है कि हमारे देश में किसानों की स्थिति बिल्कुल नहीं बदली है।

विज्ञापन


स्वतंत्र भारत में किसान हितैषी योजनाएं नई बात नहीं है। 1989 में जनता दल सरकार ने ऋणमाफी की योजना शुरू की, जिसके तहत दस हजार रुपये तक के कर्ज माफ कर दिए गए। वर्ष 1992 तक 4.4 करोड़ किसानों को कर्ज माफी का लाभ पहुंचाया गया, जिससे सरकार पर छह हजार करोड़ रुपये का बोझ पड़ा। वर्ष 2008 में कृषि ऋणमाफी और ऋण राहत योजना से 3.69 करोड़ लघु एवं सीमांत किसानों के साथ 59 लाख से ज्यादा बड़े किसानों को लाभान्वित किया गया।
विज्ञापन


इसी तरह के कदम राज्य स्तर पर भी उठाए गए। हाल ही में तमिलनाडु ने लघु एवं सीमांत किसानों के कर्ज माफ किया है, जबकि बीते दिनों सत्ता से बेदखल हुई उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने राज्य कोऑपरेटिव बैंक से 50,000 करोड़ रुपये के ऋण माफ किए। इसी तरह उत्तर प्रदेश की नई सरकार द्वारा जरूरतमंद किसानों की कर्ज माफी स्वागतयोग्य है। पर यह पर्याप्त नहीं है-ऐसी कर्जमाफी पूरे देश के लघु एवं सीमांत किसानों को मिलनी चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन


भारत की 12.1 करोड़ कृषि संपत्तियां 9.9 करोड़ लघु एवं सीमांत किसानों के पास हैं, जिनकी भूमि में हिस्सेदारी 44 फीसदी और किसानों की आबादी में हिस्सेदारी 87 फीसदी है। विभिन्न फसलों के साथ ये किसान सब्जियों का 70 फीसदी और अनाज का 52 फीसदी उत्पादन करते हैं। कृषि पैटर्न में बदलाव के मद्देनजर नए बीजों का इस्तेमाल बढ़ने से किसानों को बीजों की बढ़ती कीमतों से भी जूझना पड़ रहा है। अरहर की कीमत जहां  2004 में 27 रुपये प्रति किलोग्राम थी, वह 2013 में वह तीन गुना बढ़कर 73 रुपये हो गई। कपास की कीमत में पांच गुना की वृद्धि हुई। इसी तरह फसल की बर्बादी के कारण मक्के की कीमत बीस रुपये से बढ़कर  99 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। धान, सोयाबीन और गन्ने जैसी प्रमुख फसलों की कीमत में भारी उछाल देखी गई। पुराने जमाने में किसान विरासत के रूप में अपनी संतानों को लंबे समय तक के लिए बीज सौंपते थे, जो अब अतीत की बात है। ऊर्वरकों की कीमतों में भी वृद्धि हुई है। मानव श्रम की कीमत बढ़ी है। बैलों को किराये पर लेने की कीमत भी बढ़ी है। कीटनाशकों के जरिये फसलों के संरक्षण की कीमत भी बढ़ गई है।

हमारे किसान अपनी फसलों का बाजार मूल्य नहीं जान पाते। 1972 में कोलकाता में कराए गए एक अध्ययन में पाया गया कि एक संतरे का जितना मूल्य उपभोक्ता चुकाता है, उसका मात्र दो फीसदी ही किसानों तक पहुंचता है, बाकी सारा पैसा बाजार तंत्र हड़प जाता है। अधिक मजबूत नियामक वातावरण में, जहां मंडियां बहुत कम हैं, किसानों की फसलों की कीमतों में बहुत कम वृद्धि होती है। खेती के उपकरणों का किराया सस्ता बनाने के लिए मशीनीकरण को अपनाना होगा। भारत की कृषि उपकरण नीति को फिर से तैयार किया जाना चाहिए। साथ ही, मेक इन इंडिया के तहत खेती के उपकरणों और औजारों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, जिनका अभी आयात किया जाता है। सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाली कंपनियों को कृषि क्षेत्र में क्षमता निर्माण पहल और कौशल विकास के लिए निवेश करने को प्रोत्साहित किया जा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को कृषि उपकरणों और औजारों के लिए मानक स्थापित करना चाहिए। मशीनरी क्षेत्र में क्रेडिट ऑउटफ्लो को मजबूत बनाने के लिए एक क्रेडिट गारंटी फंड तैयार किया जाना चाहिए।

हमारी कृषि नीति को एकीकृत कीट प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए, जिसके तहत कीटों से निपटने के लिए जैविक, रासायनिक, मैकेनिकल एवं भौतिक साधनों का संयुक्त रूप से इस्तेमाल किया जाता है। केन्या ने 'पुश-पुल प्रणाली' शुरू की है, जिसमें किसान मक्के के साथ फलियों की खेती करते हैं और खेत की सीमाओं पर विभिन्न प्रकार के घास लगाए जाते हैं। यह प्रणाली काफी असरकारी साबित हुई है, क्योंकि फलियां प्राकृतिक रसायन का निष्कासन करती हैं, जिससे कीट दूर रहते हैं, घास हिंसक कीटों को अपनी प्राकृतिक गंध से अपनी तरफ खींच लेती है।

भारत के आर्थिक पंडित किसानों को दी जाने वाली आर्थिक रियायत की आलोचना और उद्योग को आर्थिक राहत दिए जाने की वकालत करते हैं। रिजर्व बैंक के मुताबिक, वर्ष  2000 से 2013 के बीच एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कॉरपोरेट कर्ज माफ किए गए, जिनमें  95 फीसदी बड़े ऋण थे। भारत में गैर निष्पादित संपत्ति (एनपीए) की समस्या किसानों को कर्ज देने के कारण नहीं है, बल्कि 50 फीसदी से ज्यादा एनपीए मध्यम एवं बड़े उद्यमों के कारण है।


देश के आतंरिक इलाकों की यात्रा के दौरान मैंने पाया कि लंबे समय से किसानों के साथ अनाथ बच्चों की तरह व्यवहार हो रहा है। सुधारात्मक कदम उठाए बिना हमारे किसानों का भविष्य अनिश्चित बना रहेगा। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed