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कैसे लगेगा पोर्नोग्राफी पर अंकुश
Updated Fri, 26 Apr 2013 11:31 PM IST
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बीती 16 दिसंबर की दिल्ली गैंगरेप घटना के बाद महिलाओं की हिफाजत के मुददे पर सरकार की देश-विदेश में जो किरकिरी हुई, उसे देखते हुए उसने आनन-फानन में अध्यादेश जारी कर दिया, और अब गुड़िया दुष्कर्म हादसे से हांफती सरकार इंटरनेट पोर्न साइट्स पर पाबंदी लगाने का विचार कर रही है।
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जिस तेजी से आज सूचना तकनीक नेटवर्क और नई प्रौद्योगिकियों का विस्तार हो रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि सरकार के लिए कानून के जरिये इस समस्या पर काबू पाना आसान नहीं होगा।
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गुड़िया से दुष्कर्म करने का गुनाह कुबूल करने वाले मनोज ने पुलिस को बताया कि उसने बच्ची के साथ यह घिनौनी हरकत करने से पहले अपने दोस्त के साथ मोबाइल पर अश्लील फिल्म देखी थी।
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अश्लील फिल्म और दुष्कर्म/यौन हिंसा का संबंध वाला पहलू इसलिए बहसतलब है, क्योंकि अश्लील वेबसाइट और सामग्री महिलाओं के प्रति हिंसा का एक बहुत बड़ा कारण माना जा रहा है। यह बात दीगर है कि ऐसे अपराधों की इस पहलू से जुड़ी देश भर की खबरें अक्सर आम जनता तक नहीं पहुंचतीं।
मगर इंटरनेट के जरिये अश्लील फिल्म देखकर महिलाओं के साथ दुष्कर्म और उन पर यौनिक हमले करने वाली वारदातों को गंभीरता से लेते हुए हाल में सर्वोच्च अदालत ने केंद्र से जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने 15 अप्रैल को यह निर्देश अश्लील वेबसाइटों को अवरुद्ध करने और इन पर पाबंदी के लिए दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया है।
इस याचिका में कई सर्वेक्षणों के हवालों से बताया गया है कि ग्लोबल इंटरनेट ट्रैफिक का 30 प्रतिशत हिस्सा पोर्नोग्राफी है और सूचना तकनीक अधिनियम की धाराएं इस संकट से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
साइबर अपराध शाखा और खुफिया विभाग की जांच टीम ने सरकार को सौंपी रिपोर्ट में बताया है कि इंटरनेट के जरिये 60 प्रतिशत तक अश्लील वेबसाइट देखी जाती है। यानी इंटरनेट एक तरफ सूचना, संवाद और ज्ञान का असीम भंडार है, तो पोर्नोग्राफी साइट्स का ज्वालामुखी भी।
बेशक अपने देश में पोर्नोग्राफी और महिलाओं पर यौनिक हमलों के संबंध पर कोई बड़ा सर्वेक्षण नहीं हुआ है, मगर ऐसी छिटपुट रपटें एक बहुत बड़ा संकेत हैं। दिल्ली पुलिस के सूत्र भी मानते हैं कि बीते तीन वर्षों में उनके पास ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें अपराधियों ने खुलासा किया कि उन्होंने बलात्कार से पहले पोर्न फिल्में देखी थीं।
इस संदर्भ में जापान का जिक्र किया जा सकता है। वहां 1980 के मध्य तक यौन अपराधों सहित सभी अपराधों में गिरावट दर्ज की गई, परंतु इसके बाद जैसे-जैसे पोर्नोग्राफी तक पहुंच बढ़ती गई, वैसे-वैसे यौन हिंसा के अपराधों का ग्राफ बढ़ता गया। ऐसे जुर्म के शक में पकड़े गए 50 फीसद किशोरों ने स्वीकार किया कि अपराध से पहले देखी गई पोर्न वीडियो के बाद वे भी वैसा ही करना चाहते थे।
गांवों में रहने वाली कई महिलाएं बेशक खुलकर इस तकलीफ का इजहार न करें, लेकिन अंतरंग बातचीत में वे साझा करती हैं कि सूचना तकनीक के विस्तार के इस बहसतलब पहलू ने उन पर क्या-क्या सितम ढाए हैं। पिछले 12 वर्षों में फोन पोर्न क्लिप की लोकप्रियता बढ़ी है, जो इस तथ्य की तस्दीक करती हैं कि अश्लीलता पर नकेल कसने के लिए बनाए गए कानून कारगर साबित नहीं हुए हैं।
दिल्ली में ही सरकार की नाक तले कई ऐसे इलाके हैं, जहां ऐसी सीडी बेची जाती हैं। ग्राहक अधिकतर 14-22 आयु वर्ग के होते हैं। अब केंद्र सरकार पोर्न साइट्स पर पाबंदी लगाने के विकल्प को खंगालने को मजबूर हुई है। करीब 546 साइट्स को प्रतिबंधित करने के लिए चिह्नित किया जा चुका है। देखना यह है कि कानूनों को बहुत जल्दी अप्रासंगिक बनाने वाले इस तकनीकी युग में सरकार महिलाओं को यौन अपराधों से मुक्ति दिलाने वाली चुनौती से कैसे निपटती है।
वैसे कानूनी फतवों की अपनी सीमाएं होती हैं। पोर्न साइट्स पर पाबंदी लगाने की बहस को आगे बढ़ाने या किसी दबाव में अंतिम फैसला लेने से पहले इस पर भी विचार करना होगा कि इसके बरक्स बलात्कार कानून व यौन हिंसा संबंधी अन्य कानूनी सुधारों की मांग कहीं बौनी न पड़ जाए।