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हिंसा के साये में कैसी बातचीत
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इमरान एवं मोदी
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के बहाने भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच मुलाकात की उम्मीद तीन दिन पहले तक दोनों देशों की राष्ट्रीय मीडिया की सबसे अहम खबर थी। लेकिन शुक्रवार शाम को जैसे ही भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से स्पष्ट किया गया कि फिलहाल भारत ऐसी किसी भी बैठक का हिस्सा नहीं बनेगा, वैसे ही दोनों देशों के बीच बातचीत दोबारा शुरू होने की उम्मीदें धराशायी हो गईं।
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भारत ने यह कहकर प्रस्तावित बैठक से खुद को पीछे हटा लिया कि जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन पुलिसकर्मियों को निशाना बना रहे हैं और उनकी हत्या कर रहे हैं, और ऐसी स्थिति में पाकिस्तान से किसी तरह की बातचीत नहीं हो सकती। नई दिल्ली ने कश्मीर में मारे गए कश्मीरी आतंकवादी बुरहान वानी की तारीफ में पाकिस्तान की ओर से डाक टिकट जारी करने का भी मामला उठाया है। निश्चित तौर पर पाकिस्तान की ये गतिविधियां उकसाने वाली हैं। उत्साहजनक और एक नए माहौल में जब सही दिशा में शांति की पहल हो, तब ऐसे काम किसी भी अच्छे उद्देश्यों के खिलाफ जाते हैं। इस्लामाबाद बार-बार यही बात न समझने की भूल करता है।
कुछ वक्त पहले ही पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम की कुर्सी पर बैठने वाले इमरान खान के प्रति भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रवैया सकारात्मक नजर आ रहा था। इसकी शुरुआत मोदी की उस 'हार्दिक बधाई' के बाद हुई, जो उन्होंने पूर्व क्रिकेटर को प्रधानमंत्री बनने के बाद दी थी। प्रधानमंत्री बनते ही इमरान खान ने भारत के साथ अपने व्यापारिक संबंध को आगे ले जाने पर जोर दिया और भारत से बातचीत करने की इच्छा जाहिर की थी।
कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा हिंसा फैलाने के बावजूद भारत ने न्यूयॉर्क में एक मेज पर आने का फैसला लगभग कर ही लिया था। लेकिन रिश्तों के नाजुक लम्हों को संभाल न पाने की पाकिस्तानी कमजोरी एक बार फिर आड़े आ गई। भारत द्वारा वार्ता रद्द होने के कारण गिनाए जाने को पाकिस्तान ने मानने से इन्कार करते हुए कहा कि भारत सरकार 2019 में होने वाले चुनावों के चलते ऐसे फैसले ले रही है, जबकि ऐसा है नहीं। पाकिस्तान से बातचीत की पहल को भारत में हर किसी ने हाथों-हाथ लिया था। मगर यह भी है कि रिश्तों की बेहतरी की कीमत वह नहीं हो सकती, जो कश्मीर में पाकिस्तान की ओर से हो रहा है। भारत ने अगर फिलहाल बातचीत न करने का फैसला किया है, तो उसके पीछे वक्त की संजीदगी देखते हुए रिश्ते और बदतर न होने की सोच हो सकती है। वैसे तो यह वक्त बातचीत के लिए मुनासिब नहीं है, मगर जो आज नहीं हो सका, पूरी उम्मीद है, कल जरूर होगा!
सीमापार आतंकवाद समेत कई ऐसे मसले हैं, जिनका दोनों देशों के रिश्तों पर सीधा असर पड़ता है। हालांकि किसी भी स्थिति में बातचीत जारी रखना कभी घाटे का सौदा नहीं होता, लेकिन कहा नहीं जा सकता कि मौजूदा तनातनी भरे माहौल में इस वार्ता से कोई फायदा भी मिलता या नहीं।
पीछे हटकर दोनों मुल्कों को कूटनीतिक स्तर पर दोबारा सोचने की जरूरत है कि वे कौन-सी न्यूनतम जरूरतें हैं, जिनसे वार्ता का माहौल बनाया जा सकता है। यह काम जितनी जल्दी समाप्त होगा, दोनों मुल्कों समेत समूचे दक्षिण एशिया के लिए बेहतर होगा। सार्क के भविष्य पर मंडरा रहे खतरों के बादल भारत-पाक रिश्तों की नर्माहट से ही छंटेंगे।
ताजा वाकये के बाद इमरान खान ने ट्वीट करके जिस तरह से प्रतिक्रिया दी है, उससे उनकी राजनीतिक अनुभवहीनता का ही पता चलता है। इमरान खान ने भारतीय रवैये को अहंकारी बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। इमरान के वरिष्ठ सलाहकारों को उन्हें बताना चाहिए कि उनके ऐसे बचकाने बयान से निकट भविष्य में भी दोनों देशों के बीच की उम्मीदें क्षीण हो जाएंगीं। पाकिस्तान की सेना के साथ उनके रिश्ते भले जो भी हों, इमरान खान को पता होना चाहिए कि वह अपने देश के प्रधानमंत्री भी हैं और उन्हीं का चेहरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की नुमांइदगी करता है। इमरान का रुख देखकर पाकिस्तान के दोहरे रवैये का भी अंदाजा लगता है, जिसकी कथनी और करनी में फर्क है।
हाल के दिनों में करतारपुर साहिब का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया गया। दोनों देशों के तल्ख रिश्तों की वजह से धार्मिक श्रद्धालुओं की आवाजाही पर भी खासा असर पड़ता है। भारतीय राजनेता नवजोत सिंह सिद्धू की पाकिस्तान यात्रा के बाद उनकी ओर से कहा गया कि पाकिस्तान ने इस मसले पर सकारात्मक रुख दिखाया है। ताजा तनातनी के बावजूद पाकिस्तान के सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने भी शनिवार को कहा है कि दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच होने वाली वार्ता का रद्द होना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन पाकिस्तान सिख श्रद्धालुओं के लिए सीमा खोलने के लिए तैयार है, ताकि वे करतारपुर स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब के दर्शन कर सकें।
इतिहास गवाह है कि दोनों पड़ोसियों के बीच के रिश्ते इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि मुल्कों की बागडोर किनके हाथों में है। हालांकि पाकिस्तान के बारे में स्पष्ट है कि वहां प्रधानमंत्री कोई भी हो, भारत से संबंधित सभी फैसले वहां की सेना लेती है। बावजूद इसके शांति की तलाश में भारत ने न जाने कितनी बार पाकिस्तान के खोखले लोकतंत्र पर भरोसा किया है। इसे इससे ही समझा जा सकता है कि हिंदुस्तान कारगिल के गुनाहगार सैन्य तानाशाह मुशर्रफ से भी बातचीत करने से पीछे नहीं हटा।
उम्मीद तो यही करनी चाहिए कि नए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे और वक्त के साथ हिंदुस्तान की आपत्तियों पर ध्यान देते हुए रिश्ते बेहतर करने की ओर कदम बढ़ाएंगे। और कश्मीरी आतंकवादियों का महिमा मंडन करने की भूल दोहराने से बचेंगे।