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पंद्रहवीं लोकसभा को कैसे याद करें

Thu, 20 Feb 2014 07:45 PM IST
अवधेश कुमार
अवधेश कुमार Updated Thu, 20 Feb 2014 07:45 PM IST
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How should remember 15th loksabha

यह स्वीकार करने में बहुत कम लोगों को दिक्कत होगी कि पंद्रहवीं लोकसभा ने अपने पांच वर्षों के कार्यकाल में लोकतंत्र के प्रति आस्था रखने वालों को सबसे ज्यादा निराश किया है। वैसे तो इसके पूर्व की दो लोकसभाओं में भी हमने विपक्ष और सरकार के बीच टकराव बढ़ते देखा, सदन में हंगामे और वाक्युद्ध की मर्यादा टूटती देखी, परंतु 15वीं लोकसभा में इसका चरम रूप सामने आया।

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निस्संदेह, यही वह संसद है, जिसने चार दशक से लटका ऐतिहासिक लोकपाल कानून बनाकर प्रधानमंत्री तक को उसकी जांच के दायरे में लाया। इसी के कार्यकाल में सीबीआई को पहले से ज्यादा स्वायत्तता मिली। हालांकि इसके पीछे उच्चतम न्यायालय की फटकार और दबाव की प्रमुख भूमिका थी। इसी लोकसभा में संसद ने महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा पर सबसे सख्त कानून बनाया। खाद्य सुरक्षा कानून, भूमि अधिग्रहण कानून...आदि कई ऐतिहासिक नीतियों व कानूनों का सेहरा इस संसद के सिर जाता है। मगर यही वह लोकसभा है, जिसके कार्यकाल में उच्चतम न्यायालय के फैसले के कारण पहली बार दो सांसदों (एक लोकसभा सदस्य और एक राज्यसभा सदस्य) की सदस्यता भ्रष्टाचार के मामले में सजा के कारण चली गई और वे चुनाव लड़ने के भी अयोग्य हो गए। हालांकि सरकार ने इस फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए अध्यादेश और कानून बनाने का रास्ता अपनाया था, लेकिन पहले विपक्ष के विरोध और बाद में राहुल गांधी द्वारा इसे खारिज किए जाने के कारण ऐसा न हो सका।
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ऐसे और भी कई ऐतिहासिक कार्य और घटनाएं इस लोकसभा के कार्यकाल में घटित हुईं। किंतु कुल मिलाकर इस लोकसभा और इसके दौरान राज्यसभा यानी पूरी संसद की छवि सुधरने के बजाय ज्यादा कलंकित हुई। तेलंगाना विधेयक को लेकर सांसदों के बीच हुई तीखी तकरार और मिर्च स्प्रे ने संसदीय इतिहास में काले धब्बे का ऐसा अध्याय जोड़ा, जिसे याद करते ही सिर शर्म से झुक जाएगा। यह विपक्ष से ज्यादा कांग्रेस के सदस्यों और मंत्रियों के बीच हुआ। वह दिन भी आया जब तेलांगना विधेयक पारित कराने के लिए लोकसभा में आपातकाल जैसी स्थिति पैदा की गई। सारे दरवाजे बंद, टीवी प्रसारण बंद, कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के चारों ओर दीवार बनाए खड़े कांग्रेस के मंत्री व सांसद, चारों ओर सुरक्षाकर्मियों की फौज। चूंकि यह घटित हो गया और हमने देखा, अन्यथा यह स्थिति कल्पना से परे थी कि विधेयक पारित कराने के लिए संसद को छावनी में बदलना पड़ेगा।
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अगर इसके आम प्रदर्शन को देखें, तो इसमें 167 विधेयक पास हुए और कुल 124 विधेयक अटके रह गए। इनमें 70 लोकसभा में ही हैं और 54 राज्यसभा में। इतने ज्यादा विधेयकों का रुकना संसदीय व्यवस्था में असाधारण स्थिति का परिचायक है। संसद में पहला घंटा प्रश्नकाल के लिए निर्धारित होता है। किंतु त्रासदी देखिए कि लोकसभा में केवल 10 प्रतिशत और राज्यसभा में 12 प्रतिशत प्रश्नों के उत्तर ही मौखिक रूप से दिए जा सके। शेष उत्तर लिखित में दिए गए। इसका मतलब हुआ कि लोकसभा में 90 प्रतिशत तथा राज्य सभा में 88 प्रतिशत प्रश्नों पर सांसदों को प्रतिप्रश्न करने का अवसर नहीं मिला।

निस्संदेह, जिस संसद पर देश की नियति बनाने का दायित्व है, वह यदि अपने निर्धारित समय का उपयोग न कर पाए और काम के बजाय लगातार टकराव में समय नष्ट करती रहे, तो माना यही जाएगा कि हमारी संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली कहीं ज्यादा रुग्णता का शिकार है। लेकिन ये अकारण नहीं थे। अगर आप पीछे लौटेंगे, तो पाएंगे कि 2जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल और कोयला खदान आवंटन से जुड़े घोटालों पर कैग की रिपोर्ट पर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव स्वाभाविक ही था।


यह स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं है कि 15वीं लोकसभा के दौरान संसद के दृश्य, प्रदर्शन और उपलब्धियां हमारे लिए एक साथ कई चेतावनियां दे रही हैं। यही संसद है, जिसमें एक दिन राज्यसभा में सभापति को विपक्ष के नेता एवं प्रधानमंत्री, दोनों की कुछ पंक्तियों को रिकॉर्ड से हटाने का आदेश देना पड़ा। 15वीं लोकसभा का समापन ऐसे कई अप्रिय कारनामों के साथ हो रहा है, जिसकी छाया से 16वीं लोकसभा का निकलना कठिन होगा।

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