जानना जरूरी है: रुरु की मृत पत्नी कैसे हुई पुनर्जीवित, संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी
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विस्तार
महर्षि भृगु के पौत्र प्रमति ने घृताची नाम की अप्सरा से एक पुत्र उत्पन्न किया। उसका नाम रुरु था। इसी तरह गंधर्वराज विश्वावसु और अप्सरा मेनका की भी एक पुत्री हुई। परंतु मेनका, कन्या के जन्म के बाद उसे स्थूलकेश मुनि के आश्रम के पास छोड़कर चली गई। स्थूलकेश कन्या को अपने आश्रम में ले आए और उसका पालन-पोषण करने लगे। बालिका बुद्धि, रूप और उत्तम गुणों से सुशोभित थी। वह संसार की समस्त प्रमदाओं (सुंदर स्त्रियों) में श्रेष्ठ दिखती थी, इसलिए स्थूलकेश ने उसका नाम ‘प्रमद्वरा’ रख दिया। एक दिन संयोग से, प्रमतिनंदन रुरु ने प्रमद्वरा को महर्षि स्थूलकेश के आश्रम में देखा। उसे देखते ही रुरु मंत्रमुग्ध हो गया, तो प्रमति ने स्थूलकेश से रुरु के लिए प्रमद्वरा का हाथ मांगा। स्थूलकेश विवाह के लिए तैयार हो गए। आगामी उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में विवाह होना निश्चित हो गया।
विवाह से कुछ ही समय पहले प्रमद्वरा अपनी सखियों के साथ वन में घूम रही थी कि तभी मार्ग में एक सांप बैठा था। प्रमद्वरा ने ध्यान नहीं दिया और उसका पैर सर्प के ऊपर पड़ गया। सर्प ने प्रमद्वरा को डस लिया और वह उसी क्षण मूर्छित होकर गिर पड़ी। उसके शरीर का रंग उड़ गया और कुछ ही देर में प्रमद्वरा की मृत्यु हो गई। उसके बंधु-बांधव उसे मृत देखकर विलाप करने लगे। आश्रम में हाहाकार मच गया। उसे जीवित देखकर सब जितने प्रसन्न होते थे, उसकी मृत देह उतना ही कष्ट दे रही थी।
प्रमद्वरा का मुख शांत और विकार रहित था। ऐसा लगता था, मानो वह उठकर अभी बोलने लगेगी। सर्प-विष के प्रभाव से चेतना-शून्य हो चुकी प्रमद्वरा को स्थूलकेश के अतिरिक्त अन्य तपस्वियों ने देखा, जिनमें महाजानु, कुशिक, शंखमेखल, उद्दालक, कठ, श्वैत, भारद्वाज, कौणकुत्स्य, आर्टिषेण, गौतम आदि भी सम्मिलित थे। वे सब प्रमद्वरा को प्राणशून्य देखकर रोने लगे। रुरु भी प्रमद्वरा के शव पर विलाप कर रहा था। फिर वह सहसा उठा और एक समीपवर्ती वन में जाकर जोर-जोर से रोने लगा।
रुरु, करुण स्वर में बोला, हाय! मेरी प्रमद्वरा, मुझे व बांध्ावों को शोकाकुल करके भूमि पर निष्प्राण पड़ी है। इससे बड़ा दुख और क्या होगा?
‘यदि मैंने दान दिया हो, तपस्या की हो अथवा गुरुजनों की भलीभांति आराधना की हो, तो उसके पुण्य से मेरी प्रमद्वरा जीवित हो जाए! यदि मैंने जन्म से लेकर अब तक मन और इंदि्रयों पर संयम रखा हो और ब्रह्मचर्य का दृढ़तापूर्वक पालन किया हो, तो मेरी प्रमद्वरा अभी जी उठे! यदि पापी असुरों का नाश करने वाले, इंद्रियों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण में मेरी अविचल भक्ति हो, तो यह कल्याणी प्रमद्वरा तुरंत जी उठे!’ इस तरह जब रुरु विलाप कर रहा था, तो एक देवदूत उसके पास आया और बोला, धर्मात्मा रुरु! तुम दुख से व्याकुल हो, परंतु जिस मनुष्य की आयु समाप्त हो जाती है, उसे फिर जीवन नहीं मिल सकता। अतः तुम शोक मत करो। परंतु इस विषय में देवताओं ने एक उपाय निश्चित किया है। यदि उसे करना चाहो, तो तुम प्रमद्वरा को फिर से पा सकते हो।
रुरु बोला, हे देवदूत! देवताओं ने कौन-सा उपाय निश्चित किया है? मुझे भी बताइए। मैं वही करूंगा, जिससे मेरी प्रमद्वरा मुझे वापस मिल जाए। देवदूत ने कहा, रुरु! उस कन्या को पुनर्जीवन देने के लिए तुम्हें अपनी आधी आयु देनी पड़ेगी। यदि तुम ऐसा कर सको, तो प्रमद्वरा जी उठेगी। यह सुनकर रुरु तनिक भी नहीं घबराया। वह बोला, मैं प्रमद्वरा को अपनी आधी आयु देता हूं।
रुरु के ऐसा कहते ही गंधर्वराज विश्वावसु और देवदूत, दोनों सत्पुरुषम धर्मराज के पास गए और बोले, ‘हे धर्मराज! रुरु की पत्नी प्रमद्वरा की सर्पदंश से मृत्यु हो गई थी। रुरु अपनी पत्नी को पुनर्जीवित करने के लिए अपनी आधी आयु देने को तैयार हो गया है। अत: रुरु की आधी आयु प्रमद्वरा को देकर उसे जीवित कर दीजिए!’ तब धर्मराज ने कहा, ‘मैं वचन देता हूं कि रुरु की पत्नी प्रमद्वरा रुरु की आधी आयु प्राप्त करके जीवित हो उठेगी।’ उधर धर्मराज ने वचन दिया और इधर प्रमद्वरा पुनर्जीवित होकर ऐसे उठ बैठी, मानो गहरी नींद से जागी हो। इस अद्भुत घटना के बाद प्रमति और स्थूलकेश ने नियत मुहूर्त पर रुरु और प्रमद्वरा का विवाह करा दिया।