फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   How Prime Ministers Decide is serious research book by Neerja Chowdhury

चर्चा: एक गंभीर शोध ग्रंथ है नीरजा चौधरी की पुस्तक- प्रधानमंत्री कैसे फैसले लेते हैं

Sun, 03 Sep 2023 06:54 AM IST
Anand Kumar आनंद कुमार
Updated Sun, 03 Sep 2023 06:54 AM IST
विज्ञापन
सार
नीरजा चौधरी की उल्लेखनीय किताब - चालीस बरस की पत्रकारिता के अनुभवों के आधार पर छह प्रधानमंत्रियों के फ़ैसलों की अंदरुनी कहानियों के पीछे की कहानियां...
 
loader
How Prime Ministers Decide is serious research book by Neerja Chowdhury
How Prime Ministers Decide - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

हर किताब एक निश्चित भाषा में लिखी और छापी जाती है। लेकिन कुछ किताबें ऐसी भी होती हैं, जिनका हर भाषा में उपलब्ध होने की जरूरत लगती है। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी की अंग्रेजी में एक दिलचस्प किताब का आठ अगस्त को दिल्ली में लोकार्पण किया गया, जिसको हिंदी पाठकों को भी पढ़ने का मौका मिलना चाहिए। इसकी विषय वस्तु, इसकी प्रासंगिकता और इसकी प्रामाणिकता - तीनों ही आधार पर हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड एक जरूरी पुस्तक है। नीरजा चौधरी ने अपने चालीस बरस की पत्रकारिता के अनुभवों और संपर्कों के आधार पर छह अध्यायों में स्वाधीन भारत के छह प्रधानमंत्रियों के कुछ ऐतिहासिक फैसलों की अंदरूनी कहानियों का पर्दाफाश किया है। इसकी भूमिका और अंतिम अंश ने इस बेमिसाल कोशिश को अलग तेवर दिया है। इनसे पंडित जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी भी नीरजा की निगरानी के दायरे में आ गए हैं।



नीरजा चौधरी की पत्रकारिता में न फतवा रहा न विलाप। वह ऐसी पत्रकार रहीं, जिसका सत्ता संसार में बड़े-छोटे सबसे घनिष्ठ संबंध था और वो लगातार बना रहा। इस किताब में भी यही रंग निखरा है -

कबीरा खड़ा बाज़ार में
मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती
ना काहू से बैर।

लेकिन इस गुण के बावजूद, उन्होंने किसी भी प्रधानमंत्री के मूल्यांकन से परहेज़ नहीं किया है। इसलिए अगर इंदिरा गांधी की कहानी में उनका साम-दाम-दंड-भेद से सत्ता में 1980 में वापसी सबसे उल्लेखनीय सच दिखा, तो राजीव राज में सांप्रदायिकता का जड़ें जमाना, सबसे भारी भूल लगी। इसके समानांतर विश्वनाथ प्रताप सिंह दूरगामी निर्णयों के लिए और नरसिंह राव आत्मघाती निर्णय के लिए चिन्हित किए गए हैं। एक ने सिर्फ तात्कालिक चुनौतियां पहचानी, तो दूसरे की आंखों में सिर्फ दीर्घकालिक सरोकार थे। इस अनूठी किताब में अटल बिहारी वाजपेयी का बम विस्फोट का निर्णय बेमेल दिखता है और मनमोहन सिंह का अमेरिका के साथ पारमाणविक ऊर्जा समझौता अप्रत्याशित हिम्मत के उदाहरण के रूप में गिना गया है।

ढेर सारे स्रोत और अनेकों टिप्पणियां इस रचना को एक जानकार पत्रकार की नोटबुक की बजाय एक गंभीर शोध ग्रंथ के जैसे पढ़े जाने की मांग करती हैं। लेकिन इसमें एक प्रवाह है जो बिना पूरी किताब को पढ़े आपको चैन नहीं लेने देगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed