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कितने शिक्षित हों मंत्री

Mon, 02 Jun 2014 07:31 PM IST
subrat mukherjee सुब्रत मुखर्जी
Updated Mon, 02 Jun 2014 07:31 PM IST
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How much education need for minister

भारत में जब किसी कैबिनेट मंत्री की योग्यता और शैक्षिक पृष्ठभूमि की बात होती है, तो हम इंग्लैंड और अमेरिका में प्रचलित परंपराओं में निहित फर्क की अनदेखी करने की भूल कर बैठते हैं। वेस्टमिंस्टर मॉडल्ा इंग्लैंड से प्रचलित हुई लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था है। आज दुनिया के तमाम देश अपने-अपने बदलावों के साथ इस मॉडल को अपनाए हुए हैं। इसमें सामूहिक उत्तरदायित्व के तहत कैबिनेट की तीन भूमिकाएं होती हैं। पहली, बेहतर ढंग से प्रशिक्षित और कार्यकुशल सिविल सर्विस के साथ तालमेल बनाए रखना। दूसरी, संसदीय समितियों के जरिये संसद के प्रति जवाबदेही निभाना और उसे सूचनाएं पहुंचाना। और तीसरी, चुनावी राजनीति के साथ व्यापकता से जुड़े रहना। दूसरी ओर, अमेरिका में कैबिनेट एक संविधानेतर निकाय होता है, जिसके सदस्य राष्ट्रपित विशेषज्ञता के आधार पर चुनते हैं, और वे सदस्य राष्ट्रपति के प्रति ही जवाबदेह होते हैं।


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वेस्टमिंस्टर मॉडल की सबसे खास बात यह है कि पूरी व्यवस्था की बागडोर एक अकुशल व्यक्ति के हाथ में होती है, और विशेषज्ञता से जुड़ी सारी मदद उसे सिविल सर्विस ही मुहैया कराती है। जब बात सिविल सेवा की हो, तो सामान्यज्ञ और विशेषज्ञ के बीच की बहस का उल्लेख स्वाभाविक है। इस संदर्भ में भारत का उल्लेख दिलचस्प होगा, जहां आज 50 प्रतिशत से भी ज्यादा सचिव गैर-आईएएस हैं। कैबिनेट का उद्देश्य है कि वह लोगों की नब्ज पहचाने और एक सामान्य समझ के आधार पर जरूरतों और संसाधनों के बीच सामंजस्य बिठाने वाली नीतियों का निर्देशन करे, और सत्तारूढ़ पार्टी के घोषणापत्र को लागू करे। संसदीय परंपरा में यह एक बेहद स्पष्ट रिवाज है कि समग्र तौर पर पूरे तंत्र पर नजर रखने की जिम्मेदारी कैबिनेट पर, और विभिन्न सरकारी विभागों के नीति-क्रियान्वयन से जुड़े दिन-प्रतिदिन का काम निपटाने का दारोमदार स्थायी सिविल सेवकों पर होता है। वैसे भी, लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने वाली एक अच्छी दलीय व्यवस्था की निशानी होती है कि वह राजनीतिक दखलंदाजी और विषयनिष्ठता को कम करते हुए नीतिगत निरंतरता सुनिश्चित करे।

ऐसे व्यापक तंत्र में मंत्री की व्यक्तिगत योग्यता और विशेषज्ञता पर बहस का कोई खास मतलब नहीं है। जैसा कि फरीद जकारिया लिखते हैं कि सरकारी स्तर पर होने वाले ज्यादातर फैसलों के तकनीकी निहतार्थ होते हैं, और इनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका सांकेतिक ही होती है। उदाहरण के लिए, रक्षा, परमाणु ऊर्जा या पर्यावरण जैसे मामलों से जुड़ा मंत्री शायद ही इन सबकी तकनीकी जटिलताओं से वाकिफ होता हो। और इसी वजह से इन मामलों में उसे विशेषज्ञों की सलाह की खास जरूरत होती है। ऐसे तकनीकी मामलों में जब भी फैसले लेने होते हैं, तब मंत्री अपने तकनीकी सलाहकारों के परामर्श पर निर्भर रहते हैं। वह सलाहों के बिना कोई ठोस फैसले लेने में शायद ही सक्षम होते हैं।

ऐसे में, मानव संसाधन मंत्री की शैक्षणिक योग्यता पर हाल में उठा विवाद खेदजनक और निहित उद्देश्यों से प्रेरित लगता है, क्योंकि यह शासन की उस लोकतांत्रिक प्रणाली की बुनियाद को ही चुनौती देता प्रतीत होता है, जिसे साफ तौर पर दो पक्षों यानी समग्र नीति निर्माण और विशेषज्ञों द्वारा इसके व्यापक क्रियान्वयन में बांटा गया है। दरअसल यह प्रणाली लोगों की संतुष्टि पर टिकी होती है, और तभी पाई जा सकती है, जब मतदाताओं की इच्छाओं का सही ढंग से ख्याल रखा जाए। मसलन, वाजिब दाम पर गुणवत्तापरक शिक्षा की व्यवस्था कर विद्यार्थियों की उम्मीदें पूरी करना, योग्यता को पर्याप्त सम्मान मिले, यह सुनिश्चित करना, ताकि लोगों का व्यवस्था पर भरोसा बना रहे, और सीखने का उचित माहौल, स्वच्छता, शौचालय, शिक्षकों व विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति बनी रहने की व्यवस्था करना ही मानव संसाधन विकास मंत्री की प्रमुख जिम्मेदारियां हैं।

इन जिम्मेदारियों को निभाने के लिए यह जरूरी नहीं कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नेतृत्व कोई प्रतिष्ठित शिक्षाविद या तकनीकी योग्यता से नवाजा गया कोई शख्स करे। इसकी वजह यह है कि वेस्टमिंस्टर मॉडल्ा में ये जिम्मेदारियां मंत्री, सिविल सेवक और विशेषज्ञों के तालमेल से ही निभाई जाती हैं, और इस मॉडल के मुताबिक, नीति निर्माण कैबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी होता है। जाहिर है, इन जिम्मेदारियों को संभालने के लिए विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं है। हां, जरूरी यह है कि जो भी फैसले लिए जाएं, वे सामान्य समझ (कॉमन सेंस) पर आधारित हों।

स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने खुद पारंपरिक शिक्षा ही पाई थी। मगर वह विज्ञान की शिक्षा के प्रसार और आईआईटी जैसे संस्थानों की स्थापना को लेकर खासे उत्साहित थे। के कामराज का ही उदाहरण लीजिए। उन्होंने कभी औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की। इसके बावजूद उन्होंने तमिलनाडु के पूरे शिक्षा तंत्र का कायाकल्प कर दिया, जो उनके पूर्ववर्ती सी. राजगोपालाचारी अपने विभेदकारी नजरिये की वजह से नहीं कर सके थे। यहां प्लेटो और अरस्तू का उल्लेख करना दिलचस्प होगा। प्लेटो का यह मानना था कि एक राजा में दार्शनिक ज्ञान होना बेहद जरूरी है। प्लेटो के उलट अरस्तू यह मानते थे कि शासक के लिए थोथे ज्ञान के बजाय अनुभवपरक बुद्धिमत्ता कहीं ज्यादा जरूरी है।

(राजनीति शास्त्र और लोक प्रशासन के पाठ्यक्रम के विकास से संबंधित यूजीसी कमिटी के नोडल अधिकारी)

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