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कब तक टिकेगा सपा-बसपा गठबंधन
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अखिलेश-मायावती
लोकसभा चुनाव 2019 से पहले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) का औपचारिक गठबंधन मायावती की केंद्र एवं राज्य में अकेले चुनाव लड़ने की अब तक की रणनीति से उल्लेखनीय प्रस्थान है। यह सच है कि बाबरी विध्वंस के बाद 1993 में बसपा ने दुर्जेय भाजपा को हराने के लिए सपा से हाथ मिलाया था और कुछ साल बाद 1996 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के साथ चुनावी समझौता किया था। लेकिन इन सभी चुनाव पूर्व गठबंधन को पार्टी संस्थापक कांशीराम ने अंजाम दिया था और मायावती को बातचीत से अलग रखा था।
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वास्तव में जबसे बहनजी ने बसपा की कमान संभाली है, तबसे वह ऐसे गठबंधन को बसपा और उसके मिशन के लिए नुकसानदेह मानती रही हैं। तथ्य यह है कि इसे उन्होंने पिछले दो दशकों में कई बार दोहराया है कि बसपा ने ऐसे चुनावी गठबंधन में बड़ा समय गंवा दिया है, क्योंकि उन्होंने तो अपने मतदाताओं के वोट साझेदार दलों को सफलतापूर्वक हस्तांतिरत किया, मगर सहयोगी पार्टियां ऐसा करने में विफल रहीं। बसपा सुप्रीमो यह भी महसूस करती हैं कि अपने अनुसुचित जाति समुदाय के अलावा अन्य सामाजिक समूहों तक पहुंचने के लिए उन्होंने बेहतर काम किया, जैसा कि उन्होंने अतीत में दूसरे राजनीतिक दलों के साथ गठजोड़ करने के बजाय ब्राह्मणों, कुछ पिछड़ी जातियों और मुसलमानों के साथ किया।
इसलिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि मायावती ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सपा के साथ गठबंधन की घोषणा करते हुए कहा कि वह न केवल आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा को हराने के लिए तैयार हैं, बल्कि यह गठबंधन तीन साल बाद होने वाले राज्य विधानसभा और उससे आगे भी जारी रहेगा। इसका तत्काल प्रभाव यह हुआ कि सपा-बसपा गठबंधन ने आश्चर्यजनक रूप से न केवल सुर्खियां बटोरीं। देश के सर्वाधिक आबादी वाले और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य के दो क्षेत्रीय क्षत्रपों के बड़े दीर्घकालिक निहितार्थों को जांचना भी महत्वपूर्ण है, जिन्होंने अपनी पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता खत्म कर हाथ मिलाया है।
वर्ष 2007 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में नाटकीय जीत के बाद मायावती पूर्ण बहुमत वाली सरकार की मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन पिछले एक दशक से एक के बाद एक चुनावों में लगातार हार ने उन्हें चुनावी रणनीति में बदलाव के लिए प्रेरित किया। 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद उनकी लोकप्रियता घटने की शुरुआत हुई, जब कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल करके प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा को धूमिल कर दिया, उसके दो वर्ष बाद युवा अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी के पुनरुत्थान ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। हाल के वर्षों में मिली हार ने बसपा को पूरी तरह से कुचल दिया, 2014 के राष्ट्रीय चुनाव में तो मोदी लहर में बसपा का पूरी तरह से सफाया ही हो गया और 2017 के चुनाव के बाद राज्य विधानसभा में बसपा की मौजूदगी नाममात्र रह गई।
इस दौरान बहनजी की सोशल इंजीनियंरिंग की पहल भी बुरी तरह विफल साबित हुई। सामाजिक पिरामिड में सबसे नीचे अनुसूचित जाति और सबसे शीर्ष पर ब्राह्मणों के बीच उनके साहसिक गठजोड़ ने उन्हें 2007 में सत्ता दिलाई, लेकिन कुछ ही वर्षों बाद यह नाजुक गठजोड़ बुरी तरह बिखर गया। उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में सपा से मुस्लिम अल्पसंख्यक वोटों को अलग करने का राजनीतिक दांव भी विफल हो गया। पिछले विधानसभा चुनाव में सपा ने अपने मुस्लिम वोटों के क्षरण को रोकने के लिए जल्दबाजी में कांग्रेस के साथ गठजोड़ किया, जिसके कारण अल्पसंख्यक मतों को लेकर सपा और बसपा की प्रतिस्पर्धा ने भाजपा को ही हिंदू मतों को अपने पक्ष में ध्रुवीकृत करने में मदद की और भाजपा ने भारी जीत हासिल की।
जाहिर है, अपना अस्तित्व बचाने के लिए मायावती ने रणनीति में बदलाव किया है। पिछले वर्ष पहली बार उन्होंने चुनाव पूर्व गठबंधन किया था, पर उत्तर प्रदेश से बाहर, कर्नाटक में जेडीएस और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के साथ। मगर इसमें बहुत सफलता नहीं मिली, क्योंकि कर्नाटक में बसपा मात्र एक सीट जीत पाई और कुछेक सीट ही छत्तीसगढ़ में। हालांकि सपा के साथ गठबंधन ज्यादा मजबूत होगा और चुनाव में सफलता की संभावना भी ज्यादा है। पिछले एक दशक की विफलताओं के बावजूद उत्तर प्रदेश में मायावती का अपना व्यापक जनाधार और संगठन है।
जमीनी रिपोर्टें बताती हैं कि बसपा और सपा के कार्यकर्ता व्यापक रूप से मिल-जुलकर काम कर रहे हैं, क्योंकि अनुसूचित जाति, यादव और मुस्लिम इस गठबंधन को सफल बनाने के लिए उत्सुक हैं, क्योंकि उन सबको योगी आदित्यनाथ की सरकार से साझा खतरा है, जिसका रुझान उच्च जातियों, खासकर अपने ठाकुर समुदाय के प्रति है। अनुसूचित जाति के एक प्रमुख कार्यकर्ता ने बताया कि यह गठबंधन इसलिए काम करेगा, क्योंकि यह शीर्ष स्तर पर सिर्फ बहनजी और अखिलेश के ऊपर निर्भर नहीं है, बल्कि यह अनुसूचित जाति, यादव, मुस्लिमों के साथ-साथ कई अन्य सामाजिक वर्गों की निराशा से प्रेरित है, जो नई दिल्ली और लखनऊ, दोनों जगह भाजपा के शासन से छुटकारा पाना चाहते हैं। हालांकि मायावती और अखिलेश के बीच बढ़ती सांठगांठ, जो संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी दिखी, भी इस गठजोड़ का एक महत्वपूर्ण कारक है, जो पूर्व में दोनों दलों के बीच इतनी कटुता के बावजूद इस गठजोड़ को होने से नहीं रोक पाया। एक बड़ा अंतर यह है कि अपने पिता मुलायम सिंह यादव, जो मायावती से घृणा करते हैं, के विपरीत अखिलेश ने पिछले कुछ महीनों से परिश्रमपूर्वक मायावती को मनाया है।
हालांकि सपा और बसपा के रिश्ते में उतार-चढ़ाव होना तय है, पर दो कारण हैं, जिसके चलते यह लोकसभा चुनाव के आगे भी चलेगा। पहला तो यह कि बसपा और सपा के पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक तब तक साथ बने रहेंगे, जब तक राज्य स्तर पर योगी आदित्यनाथ का खतर बना रहेगा। दूसरी बात, अगर वास्तव में राष्ट्रीय स्तर पर गैर-भाजपा गठबंधन की सरकार बनती है और मायावती को महत्वपूर्ण पद हासिल होता है, तो वह पार्टी के किसी अनुसूचित जाति के प्रतिद्वंद्वी नेता के बजाय उत्तर प्रदेश में अखिलेश को रखने का विकल्प चुन सकती हैं।