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पाकिस्तान में सरकार की एक और शर्मिंदगी, बता रही हैं मरिआना बाबर

Fri, 11 Sep 2020 12:50 PM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 11 Sep 2020 12:50 PM IST
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how Imran khan govt shamed in pakistan again
पाकिस्तान

पाकिस्तान के नामचीन खोजी पत्रकार अहमद नूरानी ने जब आईएसआई के पूर्व महानिदेशक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल असीम सलीम बाजवा की संपत्ति पर दस्तावेजी सबूतों के साथ एक स्टोरी पोस्ट की, तो यह किसी बम धमाके से कम नहीं थी। इससे जुड़े ब्योरे नूरानी द्वारा शुरू की गई फैक्टर फोकस वेबसाइट पर मौजूद हैं। नूरानी के रिटायर होने के बाद प्रधानमंत्री इमरान खान ने उन्हें सूचना एवं प्रसारण के लिए अपने सहायक के साथ-साथ चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) प्राधिकरण का मुखिया बनाया था। 


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नूरानी की कहानी ने मुल्क को हैरान कर दिया, क्योंकि विवरणों के जरिये उसमें असीम बाजवा के परिवार की, जिसमें उनकी बीवी, बेटे और भाई शामिल थे, अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात में पित्जा फ्रेंचाइजी के माध्यम से अरबों डॉलर की कमाई और दर्जनों अन्य कंपनियों के बारे में बताया गया है। एक सेवानिवृत्त जनरल के पास इतनी अकूत संपत्ति कैसे हो सकती है? असीम बाजवा ने अपने ऊपर लगे आरोपों को नकारते हुए प्रधानमंत्री के सहायक के पद से इस्तीफा दे दिया, जिसे प्रधानमंत्री ने नामंजूर कर दिया। हकीकत यह है कि प्रधानमंत्री के सहायक के रूप में उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं था, बल्कि सीपीईसी के मुखिया के तौर पर उन पर अरबों डॉलर की देखरेख की जिम्मेदारी थी।

अब तक चीन ने सार्वजनिक रूप से इस पर कुछ नहीं कहा है, लेकिन शायद सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के साथ निजी बातचीत में उन्होंने यह मुद्दा उठाया होगा, जिसने अब सीपीईसी को बेहद विवादास्पद बना दिया है। पाकिस्तानी सेना न सिर्फ खामोश है, बल्कि उसने इस पर कुछ कहने से इन्कार कर दिया है। असीम बाजवा को इसका जवाब देना है कि जब वह पाक सेना में ऊंचे पदों पर थे, तब उनका साम्राज्य बहुत तेजी से क्यों बढ़ रहा था। दूसरा सवाल यह है कि क्या सेना को उसके वित्तीय साम्राज्य के बारे में पता था और क्या अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी इस घोटाले में शामिल थे।

इस बीच अहमद नूरानी ने, जिन्हें उनकी विस्फोटक कहानियों के लिए कुछ साल पहले सुरक्षा प्रतिष्ठान ने अगवा कर प्रताड़ित किया था, विदेश में शरण ले रखी है। मानो यही काफी न हो, कुछ समय बाद पाकिस्तान के सिक्योरिटीज ऐंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसीपी) में संयुक्त निदेशक साजिद गोंदल गायब हो गए और उनकी कार सड़क पर खड़ी पाई गई। एसईसीपी में सीपीईसी और अन्य मुद्दों के विवरण थे। हालांकि वे सार्वजनिक थे, लेकिन सुरक्षा प्रतिष्ठान को संदेह है कि गोंदल ने बाजवा के बारे में अहमद नूरानी को जानकारी दी होगी। अचानक सोशल मीडिया पर गोंदल को बरामद किए जाने की मांग होने लगी। 

इस्लामाबाद उच्च न्यायालय, जहां गोंदल के परिवार ने उनके अगवा किए का मामला दर्ज किया था, के मुख्य न्यायाधीश ने इसे गंभीरता से लिया और प्रधानमंत्री को गोंदल की वापसी तुरंत सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। उसके बाद उनकी रिहाई हुई। गोंदल की रिहाई सोशल मीडिया की ताकत का सिर्फ एक उदाहरण है। कुछ हफ्ते पहले एक दूसरे खोजी पत्रकार मतिउल्लाह जान को भी सुरक्षा एजेंसियों ने अगवा कर लिया था, लेकिन सोशल मीडिया पर एकजुट होकर आवाज उठाने के बाद उन्हें रिहा किया गया। इंटरनेशनल कमेटी ऑफ ज्यूरिस्ट्स (आईसीजे) ने एक बयान में अफसोस जताते हुए कहा कि अगर हजारों नहीं, तो सैकड़ों लोग पाकिस्तान सरकार की मिलीभगत से या तो सीधे गिरफ्तार होते हैं या उन्हें अगवा कर लिया जाता है।

इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशन (आईएसपीआर) ने, जो मीडिया को सैन्य हितों की खबरों और सूचनाओं का समन्वय और प्रसारण करता है, चूंकि अहमद नूरानी द्वारा लगाए गए आरोपों पर मीडिया को कोई भी कवरेज करने से मना किया था, इसलिए मीडिया चुप था। लेकिन जब जनरल असीम बाजवा ने इस पर ट्विटर पर प्रतिक्रिया दी, तो इसे सुर्खियों में छापने का निर्देश दिया गया। बाजवा के भ्रष्टाचार का मामला ऐसा इकलौता मामला नहीं है, इस प्रतिष्ठान में कई और ऐसे लोग हैं, जिन्होंने देश से बाहर संपत्ति बनाई है, फिर भी वे आजाद हैं। देशभक्ति के प्रचार और मुल्क के खिलाफ दुश्मनों की साजिश की दलील देकर ऐसे लोग छुट्टा घूम रहे हैं। आज जो भी असीम बाजवा की आलोचना करता है, उसे तुरंत 'देशद्रोही' और 'रॉ का एजेंट' करार दिया जाता है। 

साल 2018 में नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो ने पूर्व सैन्य तानाशाह परवेज मुशर्रफ और उनकी पत्नी को अरबों डॉलर के भ्रष्टाचार की जांच में तलब किया, और उन्हें यह बताने के लिए कहा कि उन्होंने 10 महंगी संपत्तियां कैसे खरीदीं। लेकिन मुशर्रफ को उसके लिए कोई सजा तो नहीं ही मिली, संविधान को कमजोर करने के जुर्म में विशेष अदालत द्वारा उन्हें दी गई फांसी की सजा को एक दूसरी अदालत ने पलट दिया। अब तक सिर्फ पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के फरहतुल्लाह बाबर के अलावा मरियम नवाज ने बाजवा के भ्रष्टाचार पर टिप्पणी की है। मरियम ने कहा कि एक व्यक्ति की जवाबदेही की मांग से सीपीईसी पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, लिहाजा असीम बाजवा को अपने खिलाफ लगे आरोपों का सामना करना चाहिए। 

अंग्रेजी अखबार डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा है, हालांकि इस विवाद को इतनी आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता, बल्कि इमरान खान की प्रतिक्रिया ने इसे और हवा दी है। संपादकीय में कहा गया है कि यह अब राजनीतिक पार्टी का दायित्व है कि वह इस आरोप का खंडन करे और अपना नाम साफ करे, क्योंकि इसी पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं पर पहले भी कई मौकों पर मजबूत हथकंडों का सहारा लेने का आरोप है। अखबार कहता है कि प्रधानमंत्री को जांच के लिए एक संयुक्त जांच दल गठित करना चाहिए और इन आरोपों को साफ करना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जनरल असीम बाजवा को एक जवाबदेही अदालत के सामने पेश होना चाहिए, क्योंकि जवाबदेही सभी के लिए समान होनी चाहिए। कानून की सर्वोच्चता और संविधान को बनाए रखने के लिए यह जरूरी भी है।

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