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कितना कारगर होगा विकास का मुद्दा
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मतदान
इन दिनों देश में लोकसभा चुनाव की चर्चा सबकी जुबान पर है। लेकिन आने वाले दिनों में जब देश के 90 करोड़ मतदाता मतदान केंद्र पर अपने मताधिकार का प्रयोग करने जाएंगे, तो उनके जेहन में क्या होगा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण राष्ट्रीय सुरक्षा की धुन पर केंद्रित रहे हैं। वह खुद एवं उनकी पार्टी के अन्य नेता आगे भी एक मजबूत देश के लिए एक मजबूत सरकार का राग अलापते रहेंगे। लेकिन आपको यह महसूस करने के लिए कोई राजनीतिक पंडित बनने की जरूरत नहीं है कि इस बार चुनाव में उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम के मतदाताओं को एकजुट करने वाला कोई एक मुद्दा नहीं है।
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कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जो देश के कुछ हिस्सों में हावी रहेंगे, तो देश के शेष अन्य हिस्सों में उनकी कोई खास चर्चा नहीं होगी। कोई नहीं जानता कि आखिरकार क्या होगा, इसलिए मैं किसी भी तरह की भविष्यवाणी करने के खेल में नहीं पड़ूंगी। इसके बजाय, मैं अपनी हाल की हरियाणा राज्य के कुछ इलाकों की यात्रा से संबंधित संस्मरण आपके साथ साझा करना चाहती हूं।
पिछले हफ्ते मैं मेवात गई, जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हरियाणा का एक जिला है। दो साल पहले इसका नाम बदलकर नूह कर दिया गया है। नीति आयोग के 101 सबसे पिछड़े जिलों की सूची में नूह सबसे निचले पायदान पर है। इन पिछड़े जिलों को अब आकांक्षी जिला कहा जाने लगा है। दिल्ली से मात्र ढाई घंटे का सफर करके आप नूह जा सकते हैं और यह मॉल, मल्टीप्लेक्स तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शहर गुरुग्राम से सीमाएं साझा करता है। मुस्लिम बहुल नूह गुरुग्राम लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, जिसका प्रतिनिधित्व इस समय भाजपा के राव इंद्रजीत सिंह कर रहे हैं।
क्या नूह में विकास हुआ है? जैसा कि हर मामले में इस ध्रुवीकृत समय में हो रहा है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रश्न किससे पूछा जा रहा है। कुछ चीजें वाकई नूह में बदली हैं। वर्ष 2016 में हरियाणा के मुख्यमंत्री द्वारा एक आकर्षक बस स्टैंड का उद्घाटन किया गया था। यह एक सुलभ शौचालय और रात्रि विश्रामालय से सुसज्जित है, जहां पचास रुपये देकर आप रात गुजार सकते हैं। रात्रि विश्रामालय की देखभाल करने वाला खुलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करता रहा था और वह मानता है कि वह न केवल मजबूत नेता हैं, जिन्होंने पाकिस्तान को सबक सिखा दिया, बल्कि वह विकास के भी 'मसीहा' हैं।
मैंने उससे नूह के ग्रामीण इलाके के पिछड़े तबकों और मुस्लिम आबादी की भावनाओं के बारे में पूछा, जो निरंतर गरीबी और निराशा में घिरे रहे हैं। उस युवक ने मजाक उड़ाते हुए कहा, जिस किसी के पास नौकरी नहीं है, वह आलसी है। उसने यह भी स्वीकार किया कि उसकी किसी भी मुस्लिम परिवार के साथ बातचीत नहीं है, लेकिन उसकी धारणाएं दृढ़ थीं और वे बदलने वाली नहीं थीं।
मैं कई और गांवों से गुजरी। नूह अब भी बहुत पिछड़ा है। कई लोग, जो मुझे मिले, उन्हें किसी भी राज्य या केंद्र सरकार के विकास कार्यक्रमों का लाभ नहीं मिला था। अपनी यात्रा के दौरान पुरुषों के मुकाबले महिलाओं और लड़कियों से ज्यादा मिली। उन्होंने मुझे बताया कि पुरुष लोग नूह के बाहर ड्राइवर के रूप में काम करते हैं।
राष्ट्रीय मीडिया जिसे 'राष्ट्रीय मुद्दा' बताता है, उस पर बात करने वाला कोई भी व्यक्ति मुझे ग्रामीण नूह में नहीं मिला। उनका जीवन एक चरम संघर्ष है, उनकी बातें पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता की गंभीर कमी जैसे स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित थीं। वहां का पानी अत्यधिक खारा है, जो पीने और सिंचाई, दोनों के लायक नहीं है।
नूह के एक बड़े गांव अदबार में मैं एक सरकारी स्कूल की दसवीं की छात्रा आयशा से मिली। उसके घर में शौचालय है, लेकिन उसका परिवार स्वच्छ भारत अभियान का लाभार्थी नहीं है। उन्होंने अपने पैसे से घर में शौचालय बनवाया है। आयशा के परिवार को नल से पानी की सुविधा उपलब्ध नहीं है। चौदह वर्ष की आयशा ने स्कूल जाने के लिए कठिन संघर्ष किया है। दरअसल उसे दूर से पानी लाना पड़ता था। ऐसे में या तो वह स्कूल जा सकती थी या फिर घर के लिए पानी ला सकती थी। आखिरकार उसकी हमउम्र बहन सायना ने स्कूल छोड़ दिया और वह बहुत दूर कुओं से सिर पर मटके में ढोकर पानी लेकर आती है।
अदबार गांव में चारों तरफ गाय के गोबर से बने उपले दिखाई देते हैं। लगता है, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, जिसके तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को रसोई गैस का कनेक्शन दिया जाता है, का लाभ यहां हर किसी को नहीं मिला है। लेकिन निराशा और हताशा के बीच उम्मीद की किरणें भी थीं। नूह शहर में मैं दो युवा मुस्लिम महिलाओं से मिली, जो शोधकर्ता के रूप में काम करती हैं। उनमें से एक मोटरसाइकिल पर सवार थी। दोनों पहली बार वोट देने वाली हैं, दोनों ने पढ़ाई करने और काम करने के लिए सामाजिक बाधाओं का मुकाबला किया है। हनीफा नाम की कॉलेज छात्रा ने मुझे बताया कि उसे जो मानदेय मिलता है, उससे छोटे भाइयों को पढ़ाने में उसे मदद मिली है।
पिछले हफ्ते मैं करनाल की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग एक से भी गुजरी और सोनीपत में एक महंगे रेस्तरां पर रुकी। उस रेस्तरां का प्रबंधक प्रधानमंत्री मोदी का कट्टर समर्थक था और वही पंक्तियां दोहरा रहा था, जो भाजपा समर्थकों के बीच आम है-'पिछले सत्तर वर्षों में कुछ नहीं हुआ। प्रधानमंत्री मोदी के बहुत से काम अधूरे हैं और उन्हें सत्ता में फिर वापसी करनी चाहिए।' मैंने उससे हाईवे टूरिज्म में हरियाणा की अग्रणी भूमिका के बारे में पूछा, जो दशकों पहले शुरू हुआ था और जिससे उसके जैसे रेस्तरां और ढाबा वाले लाभान्वित हुए। इस पर उसका जवाब था, 'वह तो मजबूरी में किया होगा, उनके पास कोई विकल्प नहीं था।'
क्या आने वाले चुनाव में विकास एक मुद्दा होगा? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछते हैं और इस बात पर भी कि आप हाईवे पर हैं या नीचे उतरकर गांव की गंदी पगडंडियों पर चल रहे हैं।