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यह सुस्ती कैसे दूर होगी

जयंतीलाल भंडारी Updated Mon, 05 Jun 2017 06:21 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
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इन दिनों देश के आर्थिक एवं वित्तीय परिदृश्य से संबंधित प्रकाशित हो रही रिपोर्ट्स के मद्देनजर देश और दुनिया के अर्थशास्त्री यह कहते दिखाई दे रहे हैं कि भारत के समक्ष अपनी आर्थिक चाल सुधारने और विकास दर को बढ़ाने की चुनौती है। वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच ने भारत की रेटिंग बीबीबी ऋणात्मक पर अपरिवर्तित रखी है। कमजोर वित्तीय स्थिति तथा कठिन कारोबारी माहौल को देखते हुए एजेंसी ने सरकारी रेटिंग को अपरिवर्तित रखा है। विश्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए विकास दर को 7.6 फीसदी से घटाकर 7.2 फीसदी कर दिया है। विश्व बैंक ने नोटबंदी को एक कारक माना है और निवेश माहौल सुधरने में अधिक समय लगने का हवाला देते हुए जीडीपी का अनुमान घटाया है। हालांकि उसने यह भी कहा है कि अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है और इस साल जुलाई से जीएसटी लागू होने के बाद इसमें और मजबूती आएगी। 
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हाल ही में जारी किए गए केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के आंकड़ों में चौथी तिमाही में विकास दर 6.1 फीसदी आंकी गई और पूरे वर्ष के लिए इसके 7.1 फीसदी रहने का अनुमान है। दरअसल पिछले वर्ष आठ नवंबर को एक हजार रुपये और पांच सौ रुपये के पुराने नोटों को विमुद्रीकृत करने से बाजार में मांग में जो गिरावट आई उसका सर्वाधिक असर जनवरी से मार्च के बीच की तिमाही में पड़ा था। इसी वजह से भारत तेज रफ्तार वाली अर्थव्यवस्था भी नहीं रहा।

इसमें दो मत नहीं कि वर्ष 2016-17 की शुरुआत से ही वैश्विक सुस्ती से अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना शुरू हो गया था। लेकिन नवंबर, 2016 से मार्च 2017 के बीच तीन बड़ी आर्थिक चुनौतियों ने अर्थव्यवस्था को अधिक प्रभावित किया है। ये हैं, रोजगार, निर्यात और उद्योग-कारोबार में निजी निवेश की भारी कमी। हाल ही में विश्व आर्थिक मंच द्वारा प्रकाशित ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में कहा गया है कि रोजगार पैदा करने की सीमित क्षमता का परिदृश्य भारत के लिए गंभीर चुनौती है। देश में रोजगार नहीं बढ़ने के कई कारण रहे हैं। सेवा क्षेत्र के तहत कई क्षेत्रों में नौकरियों की बढ़ोतरी का अनुपात समान नहीं रहा है। कई सेवाओं और आईटी सेक्टर में टेक्नोलॉजी, ऑटोमेशन के कारण रोजगार घटे हैं।

विनिर्माण और कृषि जैसे अधिक रोजगार देने वाले क्षेत्र पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर सके हैं। जहां तक निर्यात क्षेत्र की बात है, तो वर्ष 2014-15 में 310 अरब डॉलर का निर्यात किया गया था, जोकि घटकर पिछले वर्ष 269 अरब डॉलर रह गया। निर्यात क्षेत्र की चुनौती इसलिए और बढ़ेगी क्योंकि विश्व व्यापार संगठन के नियमों के मुताबिक वर्ष 2018 तक भारत को निर्यात की सब्सिडी देना बंद करना होगा। 

निश्चित रूप से जीएसटी को पारित करवाना मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि है। जीएसटी के कारण देश में टैक्स व्यवस्था सकल हो जाएगी। देश में बैंकिंग तंत्र में करीब सात लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्ज (एनपीए) के मद्देनजर बैंकिंग नियमन अधिनियम में संशोधन का अध्यादेश भी इस सरकार की उपलब्धि है।

पिछले वर्ष प्रत्यक्ष विदेश निवेश के मामले में भी अच्छी स्थिति दिखाई दी। हाल ही में प्रकाशित अंकटाड की रिपोर्ट बताती है कि एफडीआई के मोर्चे पर भारत का प्रदर्शन बेहतर हुआ है। इस सबके बावजूद विकास दर की सुस्ती सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे परिदृश्य में क्या रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती करेगा ताकि निवेश में सुधार हो?

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