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समुद्र का नाम ‘सागर’ कैसे पड़ा?: क्या है विष यानी गर के साथ जन्म लेने की कहानी
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समुद्र का नाम ‘सागर’ कैसे पड़ा?
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अमर उजाला
विस्तार
इक्ष्वाकु वंश में हरिश्चंद्र नाम के एक महान राजा हुए। उनके पुत्र का नाम रोहित था। वह अत्यंत पराक्रमी और बुद्धिमान था। उसके द्वारा विकसित किया गया नगर रोहितपुर के नाम से विख्यात हुआ। लंबे समय तक राज्य और प्रजा का पालन करने के बाद रोहित वैराग्य लेकर वन चला गया। रोहित का पुत्र हरित था और उसके पुत्र का नाम चंचु था। उसके दो पुत्र हुए-विजय व सुदेव। विजय ने अनेक क्षत्रिय राजाओं को युद्ध में पराजित किया था, इसलिए उसका नाम ‘विजय’ पड़ा। विजय का पुत्र रुरुक था, जो धर्म, राजनीति और अर्थशास्त्र में अत्यंत निपुण था। रुरुक के पुत्र का नाम वृक और वृक के पुत्र का नाम बाहु था।बाहु शुरू में बड़ा प्रतापी था, किंतु धीरे-धीरे वह शिकार, जुआ और अन्य व्यसनों में डूब गया। अवसर का लाभ उठाकर हैहय, तालजंघ और शक जातियों ने राज्य पर आक्रमण कर दिया। साथ में यवन, पारद, कांबोज, पह्लव और खस भी हैहयों की सहायता के लिए आ गए। राजा बाहु, अपनी सेना और राज्य, दोनों खो बैठा। वह अपनी गर्भवती पत्नी के साथ वन में चला गया। दुर्भाग्य से उसकी सौत ने उसे विष दे दिया था। फिर भी उसके गर्भ में पल रहे बालक की मृत्यु नहीं हुई। इस बीच वन में राजा बाहु ने प्राण त्याग दिए। उसकी गर्भवती पत्नी बाहु के साथ सती होना चाहती थी। भृगुवंशी महर्षि और्व आ गए।
उन्होंने बाहु की पत्नी को बताया कि उसके गर्भ में शिशु जीवित है। कुछ समय बाद बाहु की पत्नी ने एक बालक को जन्म दिया, जो ‘गर’ (विष) सहित पैदा हुआ था। अत: उसका नाम पड़ा- सगर।
सगर युवा हुए, तब उन्हें अपने पिता बाहु के राज्य के हरण का पता चला। फिर उन्होंने पिता का प्रतिशोध लेने के लिए सेना सहित हैहयों पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर दिया। इसके बाद सगर ने शक, यवन, कांबोज आदि को भी नष्ट करने का निश्चय किया। भयभीत होकर वे सब महर्षि वशिष्ठ की शरण में गए। गुरु वशिष्ठ की आज्ञा मानकर सगर ने उनका वध नहीं किया, पर उनका धर्म और स्वरूप बदल दिया। उन्होंने शकों के आधे सिर मुंडवा दिए, यवनों के पूरे सिर मुंडवा दिए और पह्लवों की दाढ़ियां बढ़वा दीं। पारदों को खुले बाल रखने का आदेश दिया गया। साथ ही, इन सबको वेदाध्ययन और वैदिक कर्मों से वंचित कर दिया गया।
इसके बाद राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। उन्होंने अनेक देशों के राजाओं को हराकर यज्ञ का घोड़ा छोड़ा। परंतु किसी अज्ञात शक्ति ने उस घोड़े को चुरा लिया और समुद्र के नीचे कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। अश्व के गायब होने से परेशान होकर सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व खोजने का आदेश दिया। सगर के पुत्र पृथ्वी को खोदते हुए समुद्र तक पहुंच गए। वहां उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा। कपिलमुनि समाधि में लीन बैठे थे और पास ही यज्ञ का घोड़ा बंधा था।
सगर के पुत्रों ने बिना विचार किए कपिलमुनि पर चोरी का आरोप लगा दिया। मुनि की समाधि भंग हुई, तो उन्होंने नेत्र खोलकर सगर के पुत्रों की ओर देखा। उनके तेज से सगर के साठ हजार पुत्रों में से चार पुत्र-बर्हकेतु, सुकेतु, धर्मरथ और पंचजन को छोड़कर शेष जलकर भस्म हो गए। तब कपिलमुनि ने वरदान दिया कि इक्ष्वाकुवंश सदा अक्षय रहेगा। यह समुद्र उनके नाम से ‘सागर’ कहलाएगा। इसके बाद समुद्रदेव स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने यज्ञ का घोड़ा राजा सगर को लौटा दिया। इसके बाद सगर ने सौ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण किए। सगर के वंशज राजा भगीरथ के प्रयास से देवनदी गंगा पृथ्वी पर आईं और उनके स्पर्श से सगर के भस्म हुए पुत्रों का उद्धार हुआ।