कैसे बचाएंगे भारत को जेहादियों से
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हमारे इस भारत महान में जेहाद शब्द अगर कोई राजनीतिक पंडित लेने की हिम्मत करता है, तो उसके माथे पर सांप्रदायिक होने का बिल्ला चिपका दिया जाता है। मुझे जरा भी संकोच नहीं होता यह कहने में, कि वैश्विक जेहाद का एक नया दौर शुरू हो गया है, जिसका मकसद है अल कायदा को दोबारा जिंदा करना। दस दिन के विदेश दौरे से जिस दिन वापस लौटी पिछले सप्ताह, उस दिन आतंकवादियों ने जम्मू में सुरक्षाकर्मियों के कैंप पर हमला किया। इतना गंभीर था वह हमला कि घंटों तक गोलीबारी चलती रही और राजनीतिक दलों ने बाद में इस पर राजनीति शुरू की। भाजपा के प्रवक्ताओं ने कहना शुरू कर दिया कि प्रधानमंत्री को बातचीत का सिलसिला नहीं शुरू करना चाहिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ, जब तक इस तरह के आतंकवादी हमले बंद नहीं होते।
इस तरह की बातें बेकार हैं, भारत के हित में नहीं हैं। एक तो इसलिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में राजनीति करना देशद्रोह से कम नहीं। दूसरा इसलिए कि यह जेहाद इक्कीसवीं सदी का युद्ध है विश्व भर में, भारत की रणनीति स्पष्ट होनी चाहिए, सोची-समझी होनी चाहिए। पाकिस्तान से बातचीत हमने 26/11 वाले हमले के बाद बंद कर दी थी और ऐसा करने से न राष्ट्र की सुरक्षा मजबूत हुई है और न ही आतंकवादियों के हौसले कम हुए हैं। बातचीत का सिलसिला जारी रहता, तो सीधे सवाल किए जा सकते थे पाकिस्तानी शासकों से। मसलन कि कौन थे वे लोग, जो पाकिस्तान की धरती पर बैठकर अजमल कसाब और उनके साथियों को मोहरों की तरह चला रहे थे मुंबई की बिसात पर? कौन थे वह मेजर साहब, जिसका जिक्र डेविड हेडली ने भी किया, जब इस हमले के बारे में उनसे पूछताछ की गई अमेरिका में? इन सवालों के जवाब मिल गए होते, अगर बातचीत का सिलसिला जारी रखा होता सरकार ने।
दुनिया जानती है कि पाकिस्तान जेहादी आतंकवाद का महत्वपूर्ण केंद्र वर्षों से रहा है। दुनिया यह भी जानती है कि पाक सेना का समर्थन न होता, तो न कश्मीर में जेहादी गुट हमला कर सकते और न ही अफगानिस्तान में तालिबान अमेरिकी सैनिकों का मुकाबला कर पाते एक दशक लंबी लड़ाई में। न ही ओसामा बिन लादेन पनाह ले सकते थे एबटाबाद जैसी छावनी में। जेहाद पाकिस्तान तक सीमित नहीं है अब। विशेषज्ञ मानते हैं कि अफ्रीका अब दक्षिण एशिया से भी बड़ा केंद्र बन गया है जेहादी गुटों का। ऐसा लगता है नैरोबी के मॉल में हुए हमले के बाद कि अल कायदा उसी रणनीति पर अमल करने की कोशिश कर रहा है, जो ओसामा ने तैयार की थी सूडान में शरण लेने के बाद। ओसामा के सूबेदार जवाहिरी ने हाल में एक हुक्मनामा जारी किया था, जिसमें उन्होंने जेहादियों को जेहाद के उसूल दोबारा समझाए थे। यानी अमेरिकी संस्थाओं पर हमला करो, पश्चिमी सभ्यता के केंद्रों को खत्म करो, यहूदियों को निशाना बनाओ और मुस्लिमों को मत मारो।
सो नैरोबी वाले हमले से जो लोग बचकर निकल पाए हैं, उन सबने कहा है कि आतंकवादियों ने मुसलमानों की जानें बख्शी थीं और उनको खास तौर पर निशाना बनाया, जो इस्लाम पर पूछे सवालों के जवाब नहीं दे पाए। एक भारतीय को सिर में गोली मारी गई, जब वह बदनसीब बता नहीं पाया इस्लाम के बारे में। कहना मैं यह चाह रही हूं कि पाकिस्तान से बातचीत करने या न करने से जेहादी हमले रुकने वाले नहीं। जेहाद वैश्विक स्तर पर हो रहा है और भारत खास निशाना है जेहादियों का। पर आज तक सरकार ने जेहादियों को हराने की स्पष्ट रणनीति नहीं बनाई है, क्योंकि हमारे सेक्यूलर राजनेता डरते हैं कि अगर कहीं उनके मुंह से जेहाद शब्द निकल गया, तो मुस्लिम मतदाता नाराज हो जाएंगे।
चुनावों के मौसम में राष्ट्रीय सुरक्षा को ताक पर रखा जा सकता है, लेकिन मुस्लिम मतदाताओं को नाराज नहीं किया जा सकता। जब भी किसी जेहादी को पकड़ा जाता है, मुस्लिम गुट कहना शुरू कर देते हैं कि पुलिस वाले बेकुसूर मुस्लिम युवाओं को पकड़ रहे हैं। सेक्यूलर राजनेता भी हल्ला करना शुरू कर देते हैं और मीडिया में सेक्यूलर राजनीतिक पंडित भी। ऊपर से हल्ला शुरू कर देते हैं मानवाधिकार वाले एनजीओ, जिनको आज तक मानवाधिकारों का हनन सीरिया में नहीं दिखता। ऐसे में कैसे बचाकर रखेंगे हम भारत को जेहादियों से?