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भ्रष्टाचार से कैसे मुक्त हो नौकरशाही

Thu, 04 Mar 2021 05:52 AM IST
शिवदान सिंह शिवदान सिंह
शिवदान सिंह Published by: शिवदान सिंह Updated Thu, 04 Mar 2021 05:52 AM IST
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How bureaucracy should be free from corruption
Corruption

लोकतंत्र में व्यवस्था और शासन तंत्र को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी कार्यपालिका की होती है, जिसमें जनप्रतिनिधि नीति निर्धारण करते हैं और उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी नौकरशाही की होती है। इस प्रकार नौकरशाही कार्यपालिका का मुख्य हिस्सा है। अक्सर कार्यपालिका द्वारा जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य न करने के कारण सरकारें बदल जाती हैं, परंतु कार्यपालिका को चलाने वाली नौकरशाही वही रहती है। इसको देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 के सिविल सेवा दिवस पर नौकरशाहों को अपने संबोधन में कहा था, इस समय देशवासियों के हृदय में नौकरशाहों के प्रति कोई भावना नहीं है। देशवासियों के हृदय भाव शून्य होकर उदासीन हो गए हैं। यह प्रधानमंत्री द्वारा नौकरशाही के कार्यकलापों का आकलन करके एक प्रकार से प्रमाण पत्र देने जैसा था। उन्होंने कहा था कि नौकरशाही में सीनियर-जूनियर का बहुत बड़ा अंतर कायम है, जिससे वरिष्ठ नौकरशाह न तो अपने मातहत और न ही जनता की बात सुनना चाहते हैं और यह दासता की सबसे बड़ी निशानी है। एक प्रकार से नौकरशाही में मध्यकाल की सामंतशाही नजर आती है। फर्क यह है कि शोषण का तरीका बदल गया है और इसमें भ्रष्टाचार की भूमिका केंद्रीय हो गई है।


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हाल ही में उत्तर प्रदेश के कौशांबी में डीएम रहे एक अधिकारी के भ्रष्टाचार की खबर सुर्खियों में थी, जिसमें बताया गया था कि अपने कार्यकाल में उन्होंने बड़ी रिश्वत लेकर गैरकानूनी ढंग से गलत लोगों को खनन पट्टे आवंटित किए थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसकी सीबीआई जांच के आदेश दिए। सीबीआई के छापे में संबंधित अधिकारी के ठिकानों से करोड़ों के जेवरात और अनेक संपत्तियों के दस्तावेज तथा बड़ी मात्रा में नकदी बरामद हुई। इसी तरह से जयपुर में हाईवे निर्माण कंपनी से 38 लाख की रिश्वत लेते एक आईपीएस अधिकारी को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने रंगे हाथों पकड़ा था। नौकरशाहों को भ्रष्टाचार मुक्त रखने के उद्देश्य से उन्हें हर साल अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा सरकार को सौंपना होता है। परंतु देखने में आया है कि इस नियम की अनदेखी होती है।

आखिर नौकरशाही का ऐसा स्वरूप क्यों है? इसका उत्तर है, अंग्रेजों द्वारा लागू सिविल सर्विस कोड,1919 तथा पुलिस ऐक्ट, 1861 को उसी रूप में अपनाया जाना। नौकरशाहों को भय मुक्त करने के लिए उन्हें अंग्रेजी शासन की तरफ से कानूनी सुरक्षा भी प्राप्त थी। सरदार पटेल ने 1947 में यह सोचकर इसे अपना लिया कि यदि अंग्रेज इंग्लैंड में बैठकर भी देश का शासन सफलतापूर्वक 200 साल तक चला सके, तो ये कानून स्वतंत्र भारत में भी उतना ही सफल होंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और नौकरशाही उसी ढर्रे पर चलती रही। हमारे संविधान का अनुच्छेद 311 भी देश की नौकरशाही को सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अनुसार, किसी भी अधिकारी के सेवाकाल में उसके द्वारा किए हुए कार्यों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने के लिए संबंधित राज्य या केंद्रीय सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य है। इसका दुरुपयोग करते हुए नौकरशाहों की कार्यप्रणाली सामंतों जैसी बन गई।

यदि सरकार वास्तव में कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और स्वच्छता लानी चाहती है, तो उसे नौकरशाही की चयन प्रक्रिया में बदलाव लाना होगा। नौकरशाहों को उनके कार्यों और उत्तरदायित्व के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 311 में भी बदलाव करने होंगे। ध्यान रहे, सैन्य कर्मियों को संविधान से इस प्रकार की कोई सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। इसलिए यदि किसी सैन्य अधिकारी के कर्तव्य के निर्वहन या दुश्मन के सामने किसी प्रकार की कायरता पूर्ण कार्यवाही नजर आती है, तो उसके विरुद्ध बिना किसी रुकावट के कानूनी कार्रवाई के प्रावधान हैं। सिविल सर्विस कोड, 1919 और पुलिस ऐक्ट, 1861 को अतिशीघ्र बदल कर उसे लोकतांत्रिक भावनाओं के अनुरूप बनाना चाहिए, जिससे देश की नौकरशाही और पुलिस जनता के प्रति अपनी जवाबदेही महसूस कर सके। 

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