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सुरंग से निकलने की उम्मीद
शंकर अय्यर
Updated Mon, 31 Dec 2012 11:20 PM IST
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संकट के आने पर पुराने लोग यह दिलासा देते हैं कि बुरा वक्त गुजर जाएगा। और इसी उम्मीद ने संकट के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था को भी सहारा दिया है। लेकिन क्या इसका कुछ नतीजा निकल पाया है? यह जरूर कहा जा सकता है कि शासन की हालत को देखते हुए नतीजे जितने बुरे हो सकते थे, अभी उतने नहीं हुए हैं।
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अर्थव्यवस्था के प्रति सरकार के रुख के आधार पर 2012 को तीन खंडों में बांटा जा सकता है। 2012 के पहले छह महीने तक सरकार खंडन की मुद्रा में थी और मंदी के लिए वैश्विक कारकों को उत्तरदायी ठहरा रही थी। जून के बाद से अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने दबाव बनाना शुरू किया।
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स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने सरकार से साफ तौर पर कहा कि वह रेटिंग का फिर से परीक्षण करेगी। इससे हालात को लेकर स्वीकार्यता तो बढ़ी, मगर नतीजा कुछ नहीं निकला। अगस्त में पी. चिदंबरम के वित्त मंत्री बनने के बाद सितंबर में इस मोर्चे पर कुछ तेजी जरूर दिखाई दी। लेकिन अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए जिस बदलाव की जरूरत है, वह होना अभी बाकी है।
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अर्थव्यवस्था एक गहरी और अंधेरी सुरंग में फंसी हुई है। हालांकि सरकार ने विमानन और खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और नए बैंकिंग कानून के जरिये अपने इरादे साफ कर दिए हैं। लेकिन लंबी अवधि के सुधार के ये उपाय पर्याप्त नहीं। अर्थव्यवस्था के मूल घटक अभी भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर राजनीतिक अनिर्णय के चलते बाधित हैं।
महंगाई लगातार समस्या बनी हुई है, ब्याज दरें ऊंची हैं और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में आठ प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि की संभावना वाले भारत में यह महज पांच प्रतिशत के आसपास है। दरअसल, अर्थव्यवस्था की मूल समस्या सरकारी वित्त का खराब प्रबंधन है। पिछले वर्ष जहां सरकार ने 1,600 करोड़ रुपये प्रतिदिन उधार लिए थे, वहीं इस वर्ष अक्टूबर के अंत तक सरकारी उधार लगभग 2,000 करोड़ रुपये प्रतिदिन पहुंच चुका था।
सरकारी वित्त की स्थिति पर केलकर समिति ने अपनी रिपोर्ट की शुरुआत ही इस घोषणा के साथ की कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक गंभीर राजकोषीय संकट के कगार पर खड़ी है। समिति के अनुसार, अगर जरूरी सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो राजकोषीय घाटे के 6.1 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है और वर्तमान में 4.2 प्रतिशत वाले चालू खाता घाटे की हालत और ज्यादा बदतर हो सकती है। समिति ने उदासीनता रखने वाले परंपरावादी रुख के खिलाफ आगाह करते हुए कहा है कि धीमी वृद्धि के नतीजे अकुशलता, अन्यायपूर्णता और राजनीतिक अस्थिरता के तौर पर सामने आ सकते हैं।
इन हालात को कुछ तथ्यों के जरिये समझा जा सकता है। वर्तमान में 15 अरब डॉलर प्रति माह के साथ भारत का चालू खाता घाटा लगभग चार प्रतिशत है, जो अब तक का सर्वाधिक होने के साथ ब्रिक देशों में सबसे बदतर भी है। इसका नतीजा रुपये के मूल्य में दिखाई देने लगा है। 2012 के 110 व्यापार दिवसों में व्यापार प्रति डॉलर 55 रुपये पर हुआ है।
यह कहना आसान है कि मंदी 2008 के संकट का नतीजा है, लेकिन सचाई यह है कि इसके संकेत तो 2007 की अंतिम तिमाही में ही मिलने लगे थे। यह नीतिगत जड़ता की मेहरबानी से हुआ, जो बाद में नीतिगत विकलांगता बन गई। लगभग दो लाख करोड़ से भी ज्यादा रुपयों की परियोजनाएं भूमि और सरकारी मंजूरी के इंतजार में अटकी हुई हैं।
कोयले और तेल की जरूरतें पूरी न हो पाने के कारण 18,000 मेगावाट से भी ज्यादा की शक्ति परियोजनाएं बाधित हैं। इसका निहितार्थ यह है कि 50,000 करोड़ से भी ज्यादा रुपयों के बैंक फंड फंसे हुए हैं और जिनके गैर-निष्पादनीय संपत्ति (एनपीए) बन जाने का खतरा है। गत जनवरी में प्रधानमंत्री कार्यालय ने बड़े जोर-शोर से इन चुनौतियों से निपटने का दावा किया था, लेकिन यह अब तक हो नहीं सका है।
हालांकि उम्मीदें अभी भी कायम हैं। लगभग आधे वर्ष तक लड़खड़ाने के बाद सितंबर में सेंसेक्स 18,000 के ऊपर पहुंच गया। इसके लिए विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) के अंतर्प्रवाह का आभार मानना चाहिए। इससे सरकार विनिवेश को बढ़ाने, घाटे में कमी लाने और ब्याज दरों में त्वरित कटौती, जिससे उपभोग में इजाफा हो, में समर्थ हो सकेगी।
दरअसल, सुरंग के अंत में प्रकाश दिख रहा है, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि सरकार आवश्यक कदम उठाए। चुनाव वर्ष होने और संभवतः सरकार का अंतिम बजट होने के नाते उस पर लोकप्रियता को कायम रखने का दबाव भी होगा। सरकार की ओर से भी कुछ हलचल दिख रही है। कंपनी कानून पारित हो चुका है और इसकी पूरी संभावना है कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम भी अगले सत्र में सदन के पटल पर रखा जाए। निवेश पर नई समिति (प्रस्तावित राष्ट्रीय निवेश बोर्ड का हल्का विकल्प) भी सरकार पर दबाव बनाएगी।
व्यापार वर्ग का मिजाज भी धीरे-धीरे उदासीनता से आशावाद की सतर्क मुद्रा की ओर बढ़ रहा है। नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त ने एकबार कहा था, ‘हालात आज जैसे हैं, यह इसका प्रमाण है कि वे कल वैसे नहीं रहेंगे।’ लेकिन भारत के संदर्भ में आइजक न्यूटन का यह कथन वाजिब लगता है कि यहां हालात तब तक निष्क्रिय बने रहते हैं, जब तक उन पर कोई बाहरी दबाव न पड़े। सरकार पर रेटिंग में बदलाव और नरेंद्र मोदी की जीत और शासन के उनके मॉडल की प्रतिस्पर्द्धी छवि का दबाव उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकता है। और जैसा कि लखनऊ में कहा जाता है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है।