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उम्मीद तो शेख हसीना से ही है

Sat, 13 May 2017 11:13 AM IST
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Updated Sat, 13 May 2017 11:13 AM IST
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Hope is only from Sheikh Hasina
तस्लीमा नसरीन

शेख हसीना ने मेरी किताबों पर प्रतिबंध लगाया। बहुत साल हुए, उन्होंने बांग्लादेश में मेरे प्रवेश की कोशिशों को अन्यायपूर्वक बाधित किया। इसके बावजूद बांग्लादेश में अगर किसी का समर्थन करना हो, तो मैं शेख हसीना का समर्थन करती हूं। अगर मुझे वहां की किसी राजनीतिक पार्टी के पक्ष में खड़ा होना हो, तो मैं अवामी लीग के पक्ष में ही खड़ी होती हूं। इसका कारण यह है कि बांग्लादेश में शेख हसीना और अवामी लीग को छोड़कर कोई व्यक्तित्व या राजनीतिक दल ऐसा नहीं है, जिस पर थोड़ी-सी भी आस्था जताई जाए। शेख हसीना ने मेरे साथ कितना भी अन्याय क्यों न किया हो, मेरा मानना है कि बांग्लादेश के सोलह करोड़ लोगों के साथ वह अन्याय नहीं कर सकतीं।

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मेरा यह भी भरोसा है कि बांग्लादेश की समाज व्यवस्था लगातार जिस तरह अस्वस्थ हो रही है, उसे स्वस्थ करने का बीड़ा वह देर-सबेर उठाएंगी। मेरा यह भी मानना है कि देश की बेहतरी के लिए अगर अपनी कुर्बानी देनी पड़ी, तो यह काम भी सिर्फ हसीना ही कर सकती हैं। वह प्रगतिशील लोगों के वोट पाकर सत्ता में आई हैं। उन्होंने बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान हत्याकांड में न्याय दिलाया है। देश की अर्थव्यवस्था को वह पटरी पर ले आई हैं। देशद्रोही युद्ध अपराधियों को भी उन्होंने सजा दिलवाई है। धार्मिक कट्टरपंथियों ने ग्रेनेड से हमला कर उनकी जान लेने की कोशिश की थी। लेकिन सौभाग्य से वह बच गईं। अच्छी बात यह है कि उसके बाद डरकर राजनीति उन्होंने छोड़ नहीं दी।
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अलबत्ता इन्हीं शेख हसीना ने पिछले दिनों नारी-विरोधी, घनघोर अंधविश्वासी कट्टरवादियों के एक समूह को प्रधानमंत्री आवास, गणभवन, में आमंत्रित कर जिस तरह सम्मानित किया, वह देखकर मैं चौंक गई। मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। कट्टरवादियों के साथ मंच साझा करना और किसी को शोभा देता हो, शेख हसीना को शोभा नहीं देता। मैं यह नहीं मान सकती कि शेख हसीना अपने मित्रों और शत्रुओं में फर्क नहीं कर पातीं। फिर बांग्लादेश के ये कट्टरवादी इतने भी मामूली नहीं हैं कि हसीना उन्हें वश में कर लेंगी। उल्टे ये कट्टरवादी ही कहीं शेख हसीना को अपनी जाल में न फंसा डालें। अगर हसीना यह समझ रही हैं कि ये कट्टरवादी उन्हें वोट देकर जिताएंगे, तो वह गलत समझ रही हैं। शेख मुजीबुर रहमान ने अपने शत्रुओं को मित्र समझने की गलती की थी। क्या हसीना भी वही गलती करने जा रही हैं? मैं सच कहती हूं, उनके लिए मुझे चिंता हो रही है। हाल के दौर में धर्मांध लोगों ने पूरे बांग्लादेश में प्रगतिशीलों को चुन-चुनकर जिस तरह निशाना बनाया है, उस तरह वे कहीं शेख हसीना को भी निशाना न बना लें।
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शेख हसीना कट्टरवादियों से समझौता करते हुए किसी भी हद तक क्यों न चली जाएं, वे कट्टरवादी अपनी पिछड़ी सोच से थोड़ा भी पीछे नहीं हटेंगे। वे शेख हसीना जैसी एक महिला के सत्ता के शिखर पर होने के शुरू से ही विरोधी हैं। बल्कि प्रधानमंत्री से अपनी नजदीकी का वे लोग अब फायदा भी उठाने लगे हैं। बांग्लादेश में सर्वोच्च न्यायालय के परिसर में न्याय की देवी की जो मूर्ति लगी है, उसे हटाने की मांग करते हुए हिफाजत-ए-इस्लाम नाम के एक संगठन ने हाल के दौर में कई बार प्रदर्शन किए हैं। अब खुद शेख हसीना ही कह रही हैं कि उन्हें भी यह मूर्ति पसंद नहीं। हसीना समझ नहीं रहीं कि एक मूर्ति पर छेनी-हथौड़ा चला नहीं कि पूरे देश में इस तरह की शिल्पकारी या तो ध्वस्त कर दी जाएगी या उन पर कालिख पोत दी जाएगी। कट्टरवादियों को बदलना तो दूर, खुद हसीना उनके रंग में रंगी जा रही हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि मदरसे में पढ़े कुछ लोग विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर चुकी एक विदुषी महिला को मात दे रहे हैं। क्या शेख हसीना को इन प्रगति-विरोधी लोगों के सामने हथियार डाल देने चाहिए? ऐसी ताकतों के खिलाफ तनकर खड़े होने के कारण ही तो देश के लोगों ने उन्हे प्रधानमंत्री बनाया। ऐसी शेख हसीना को आज अपने मित्रों को पहचान पाने में मुश्किल क्यों हो रही है?

कट्टरवादियों ने पाठ्यपुस्तकों के इस्लामीकरण की मांग की। शेख हसीना ने वह मांग मान ली। कट्टरवादी चाहते थे कि मदरसे की डिग्री विश्वविद्यालयों की डिग्रियों के बराबर हो। शेख हसीना ने उनकी वह इच्छा पूरी कर दी। सुप्रीम कोर्ट के परिसर में लगी न्याय की देवी की मूर्ति हटाने की उनकी मांग भी प्रधानमंत्री ने करीब-करीब मान ही ली है। स्वतंत्र सोच रखने वाले ब्लॉगरों की लगतार हत्याओं के दोषी लोगों को दंडित करना तो दूर, उल्टे कई ब्लॉगरों को ही सरकार ने जेल में डाल दिया है! मैं कभी-कभी सहम जाती हूं कि जमात-ए-इस्लामी जिस भाषा में बात करती है, शेख हसीना आज उसी भाषा में क्यों बोल रही हैं। कट्टरवादियों का समर्थन पाने के लिए अगर राष्ट्र के ढांचे को ही ध्वस्त कर दिया जाए, शिक्षा व्यवस्था का सर्वनाश कर दिया जाए, घनघोर सांप्रदायिकता का माहौल बनाया जाए, नारी के समानाधिकार पर रोक लगा दी जाए, धर्मनिरपेक्षता को देश निकाला दे दिया जाए, तो फिर शेख हसीना के सत्ता में रहने का औचित्य ही क्या है? यह काम तो जमात-ए-इस्लामी या हिफाजत-ए-इस्लाम का कोई छोटा-मोटा नेता भी कर सकता है।


इन सबके बावजूद शेख हसीना के प्रति मेरा भरोसा डिगा नहीं है। इकहत्तर के युद्ध अपराधियों को उन्होंने जिस तरह दंडित किया, बंगबंधु के हत्यारों को जिस तरह सजा दिलाई, उसी तरह कभी न कभी वह ब्लॉगरों के हत्यारों को भी न्याय के कठघरे में खड़ा करेंगी। बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्षता का विजय ध्वज एक दिन वही लहराएंगी, बहत्तर के संविधान को भी फिर से वही लागू करेंगी। शेख हसीना को हम बंगबंधु की तरह नहीं खो सकते। उम्मीद करती हूं कि खुद को प्रतिगामी शक्तियों से बचाते हुए देश को बचाने की जिम्मेदारी भी वह बखूबी निभाएंगी।

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