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फागुन के दिन आ गए
अशोक संड
Updated Tue, 19 Mar 2013 11:17 PM IST
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टेलीफोन की घंटी बजने पर चोंगा उठाते ही सुनाई पड़ा-कौन बोल रहा है? बोल आप ही रहे हैं, मैं तो सुन रहा हूं-फागुनी असर में जवाब दिया मैंने। सर जी, हम टेलीफोन से सर्वे कर आंकड़े बटोर रहे हैं कि इस होली पर प्रबुद्ध जनता क्या जलाना चाहेगी? स्वर में विनय था उनके। बेकाबू महंगाई से 'दिल जलता है तो जलने दे, आंसू न बहा, फरियाद न कर', अलापती मिडिल क्लास जनता का चूल्हा त्योहारों पर जलता रहे, यही काफी है-मैंने कहा। परिहास छोड़ काइंडली सीरिअस होकर जवाब दें-झुंझलाहट थी उनके स्वर में।
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सच्चाई तो यह है हिरण्यकश्यप भी जलाना चाहता था प्रहलाद को, लेकिन जल गई उनकी बहन। क्या गारंटी है कि जो जलाना चाहे, वह जल ही जाए। बिखरी बेतरतीब जिंदगी, 'अंदर कुछ-बाहर कुछ' सरीखी सियासती सूरतों को देखकर कौन नहीं जल रहा है। रोस्ट हो रही है आत्मा, उस टाइप वाली खोजे नहीं मिलने वाली, जिसे प्रभु ने अजर-अमर बताया था। अनवरत ज्वलनशील मन प्रशांत भाव में रहे, सद्भाव-सत्कर्मों का प्रहलाद बगैर बर्न इंजरी खिलखिलाता रहे, यही कामना आप भी करें श्रीमंत।
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आग, फाग और राग के उत्सव पर क्या जलाना चाहेंगे, वाली जिज्ञासु आत्मा ने पटक दिया फोन। श्रद्धेय सात्विक भाव में ही पूछ रहे होंगे क्या जलाएंगे होली पर, प्रशासन भी अपने तरीके से होली के आस-पास अपील करता है कि बुरी प्रथाओं को जलाएं। हरे-भरे पेड़ न जलाएं, रासायनिक रंगों के बजाय हर्बल होली खेलें। ऐसा हुल्लड़ न करें, जो पड़ोसी को पसंद न हो। पूजा के पहले बुदबुदाए जाने वाले मंत्रों की तरह होती हैं ये अपीलें। बाद में सब कुछ स्वाहा... सूचनाओं का भय त्योहार का मजा ही किरकिरा कर देता है।
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ये उपहारों के आदान-प्रदान और दौलत के प्रदर्शन वाला त्योहार नहीं। मतभेद-मनभेद तज गले लगने वाला त्योहार है। वनस्पति तक बौराय जाते हैं। बुरा न मानो की अग्रिम क्षमा-याचना के साथ ही सारा हुड़दंग माफ। प्रमेय सिद्ध कर रहीं है यश मालवीय की पंक्तियां- फागुन के दिन आ गए/ हंसे खेत खपरैल/एक हंसी में धुल गया/ मन का सारा मैल। सुबह की फूहड़ता शाम को शालीनता में बदल जाती है।
भला हो उन महानुभावों का, जो होली पर जलने-जलाने की सोचते हैं इस कामना के साथ कि अगली होली पर अभाव से पिचके गालों पर गुलाल खिल उठे।