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इतिहास : तिरंगे ने राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधा, सम्मान और गर्व की भावना का 'अमृत काल'
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तिरंगा
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सोशल मीडिया
विस्तार
आदि से वर्तमान तक ध्वज पताका या झंडे का इतिहास मिलता रहा है। चाहे वह धर्मग्रंथ हों या सिंधु घाटी व राखीगढ़ी सभ्यता की खुदाई से मिले अवशेष हों। इनमें झंडे का रूप, आकार और इतिहास मिलता रहा है। झंडे का वर्णन संजय ने महाभारत के शांति पर्व और द्रोण पर्व में किया, जिसमें कौरव-पांडव दोनों सेनाओं के ध्वजों का उल्लेख मिलता है। साथ ही अर्जुन के रथ पर ध्वज के साथ हमेशा विराजमान हनुमान जी साक्षात उदाहरण हैं।
युग कोई भी रहा हो, ध्वज के साक्षात प्रमाण हमें मिलते रहे हैं। उदाहरण के रूप में सतयुग में ब्रह्मा जी की हंस ध्वजा, त्रेता युग में भगवान राम की सूर्य ध्वजा, द्वापर युग में श्रीकृष्ण की गरुड़ ध्वजा या फिर कलयुग में जगन्नाथ मंदिर पुरी में हवा के विपरीत दिशा में रहस्यमय तरीके से लहरता पतित पावन ध्वज। वर्तमान में भी किसी धार्मिक अनुष्ठान का प्रारंभ ध्वजा स्थापना के साथ ही होता है, क्योंकि ध्वज किसी भी कार्य के मंगल, विजय और निर्विघ्न संपन्नता का प्रतीक है और उस धर्म या संस्था की पहचान भी है।
एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है। तिरंगा दुनिया में हमारी विरासत, परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर की पहचान है। देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 से 15 अगस्त, 2022 तक जन भागीदारी से, ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के माध्यम से 20 करोड़ परिवारों में तिरंगा फहराने का सपना देखा है। तिरंगा पिछले 75 वर्षों से हर देशवासी को एक सूत्र में बांधता आया है।
ऐसे में हर भारतीय के मन में तिरंगे के प्रति सम्मान और गर्व की भावना दृढ़ होती है। 1921 में महात्मा गांधी का एक लेख यंग इंडिया पत्रिका में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने कहा, 'एक ऐसा राष्ट्रीय ध्वज बनना चाहिए, जिसके लिए सभी धर्मों के लोग अपनी जान दे सकें।' इस ऐतिहासिक कार्य को आंध्र प्रदेश के महान स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया ने पूरा किया। उन्होंने 30 से ज्यादा देशों के राष्ट्रीय ध्वजों का अध्ययन किया और राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे का निर्माण किया।
22 जुलाई, 1947 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में हुई संविधान सभा की बैठक में तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अंगीकार किया गया। यानी भारत की आजादी के अमृत महोत्सव के साथ ही यह वर्ष ‘तिरंगे का अमृत महोत्सव’ भी है। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा/ झंडा ऊंचा रहे हमारा/ सदा शक्ति बरसाने वाला/ प्रेम सुधा बरसाने वाला/ वीरों को हर्षाने वाला/ मातृभूमि का तन मन सारा/ विजयी विश्व तिरंगा प्यारा... ये पंक्तियां हर भारतीय को उत्साह से भर देती हैं।
देशभक्ति का जज्बा पैदा कर देती हैं। ये हमारे राष्ट्रीय ध्वज की ताकत भी है और सम्मान भी है। भारत के नेता के रूप में, खिलाड़ी के रूप में और या फिर सरहदों पर खड़े जवान के रूप में, उसके लिए उसकी राष्ट्रीय पहचान तिरंगा होता है। आजादी के बाद भी कितने ही सैनिकों ने इस तिरंगे की खातिर अपना बलिदान दिया है। ‘हर घर तिरंगा’ अभियान शहीदों के प्रति हर भारतवासी की एक सच्ची श्रद्धांजलि है। इससे जन-जन में भारत गौरव और भारत भक्ति का भाव जागृत होगा।
देश के अंतिम छोर पर रहने वाले नागरिक को भी आजादी की 75वीं वर्षगांठ के महोत्सव में भागीदार बनना चाहिए, यही इसका मूल उद्देश्य है। राष्ट्रीय ध्वज को किसी संस्था या सरकार द्वारा मुफ्त में न दिया जाए, क्योंकि तिरंगे के प्रति हर जन के मन में सम्मान, स्वाभिमान और स्वामित्व का भाव जागृत होना अति आवश्यक है। केंद्र सरकार ने देश के सभी 1.6 लाख डाकघरों में भी बिक्री हेतु झंडे की व्यवस्था कराई है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज सरकार के ई-मार्केट मार्केटप्लेस पोर्टल पर भी उपलब्ध है।
भारत सरकार ने ध्वज की आपूर्ति की प्रक्रिया को कारगर बनाने के लिए विभिन्न ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, हितधारकों और स्वयं सहायता समूहों के साथ भी करार किया है। इस अभियान की ऐतिहासिक सफलता के लिए ‘फ्लैग कोड’ में 26 जनवरी, 2002 के बाद परिवर्तन किया गया है। अब मशीन से बना हुआ कपास, ऊन या रेशमी खादी और पॉलिएस्टर से बना तिरंगा भी फहरा सकते हैं। साथ ही, अब 24 घंटे तिरंगा फहराया जा सकता है।
ध्वजारोहण के अलावा इस अभियान में भाग लेने के आभासी तरीके भी हैं। संस्कृति मंत्रालय ने एक वेबसाइट https://harghartirang.com लॉन्च की है, जहां कोई 'झंडा लगा सकता है' और अपनी देशभक्ति का प्रदर्शन करते हुए 'फ्लैग के साथ सेल्फी' भी पोस्ट कर सकता है। केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्य सरकारों और गैर सरकारी संस्थाओं के समन्वय और सहयोग की भावना भी अभिनंदनीय है।
गृहमंत्री अमित शाह ने केंद्र सरकार द्वारा हर प्रकार के सहयोग और समर्थन देने की घोषणा की है। 2 अगस्त यानी आज पिंगली वेंकैया की 146वीं जन्म जयंती भी है। उनके प्रति जन धन्यवाद करते हुए एक ‘राष्ट्रीय ध्वज गीत’ भी जारी होगा। आने वाली पीढ़ियों को हम कैसा भारत देंगे? यह प्रश्न भी हमारे सामने है। निश्चित ही हम चाहेंगे कि हमारी आने वाली पीढ़ी सुखी, समृद्ध, शिक्षित, स्वस्थ और सुरक्षित होनी चाहिए, साथ ही, वह भारत के उच्च जीवन मूल्यों की द्योतक भी बननी चाहिए।
अब वक्त एक नए युग निर्माण का है, जिसकी शुरुआत स्वतंत्र भारत की 75वीं वर्षगांठ पर की जा सकती है। हम ‘अमृत काल’ (अगले 25 वर्ष अर्थात आजादी के 100 वर्ष) में प्रवेश कर रहे हैं। इसलिए 15 अगस्त को तिरंगे के सामने हर नागरिक को नए संकल्प लेने होंगे। वह दृश्य दुनिया को भारत की एकता का संदेश होगा, जब देश के 20 करोड़ परिवार एक साथ नए संकल्पों के साथ अपने-अपने घरों पर तिरंगा फहराएंगे। इसी दृष्टि से भारत अपनी आजादी के सौ वर्ष अर्थात आजादी के 'अमृत काल' की ठोस कार्य योजना भी बना रहा है और अगले पच्चीस वर्षों की दूर दृष्टि से अनेक प्रकार की योजनाओं का क्रियान्वयन भी कर रहा है। (-लेखक केंद्रीय संस्कृति, पर्यटन एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्री हैं।)