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नजरिया: राष्ट्रवादियों के लिए इतिहास और हिंदुत्ववादी व्याख्याकारों का आधार

Sun, 07 May 2023 07:01 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 07 May 2023 07:01 AM IST
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सार
हिंदुत्व के इतिहास की मूलभूत आलोचना इस आधार पर की जा सकती है कि यह इतिहास लेखन के शिल्प के मामले में बहुत दुर्बल है। हिंदु्त्व के इतिहासकार मूलत: प्रसिद्ध, ताकतवर और प्रभावशाली लोगों को फोकस करते हैं और संदर्भ या बारीकियों में गए बगैर उन्हें अच्छा या बुरा बता देते हैं।
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history of hinduism and hindutva historians Indian Council of Historical Research
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

विगत नवंबर में नई दिल्ली में अपने एक भाषण में गृहमंत्री अमित शाह ने विद्वानों से कहा था कि वे 'इतिहास को सही और गौरवशाली तरीके से पेश करें।' उन्होंने 150 साल तक देश के किसी भी हिस्से में शासन कर चुके राजवंशों और आजादी के लिए लड़ने वाले 300 प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में शोध करने के लिए कहा था। (https://www.ndtv.com/india-news/rewrite-history-centre-will-support-amit-shah-to-historians-3551034) गृहमंत्री के आह्वान पर सबसे पहले अमल करने वाली भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) थी, जो केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित और निर्देशित संस्था है। द प्रिंट में फरवरी अंत में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, तीन सप्ताह के रिकॉर्ड समय के भीतर परिषद ने नई दिल्ली में 'ग्लोरी ऑफ मेडाइवल इंडिया : मेनिफेस्टेशन ऑफ द अनएक्सप्लोर्ड इंडियन डाइनेस्टीज एट्थ-एटीन्थ सेंचुरीज' नाम से एक प्रदर्शनी आयोजित की। उस प्रदर्शनी में जिन राजवंशों का जिक्र था, वे थे-चोल, काकतिया, मराठा और विजयनगर साम्राज्य के शासक। इसमें किसी मुस्लिम शासक या साम्राज्य का जिक्र न होना आश्चर्यजनक नहीं था।



सरकारी निकाय होने के कारण आईसीएचआर ने हमेशा ही सत्ताधारी पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की है। जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, तब यह संस्था वामपंथी राष्ट्रवादियों के गुट द्वारा चालित थी, जो इतिहास की मार्क्सवादी व्याख्या को वरीयता देते थे। इस सरकार के समर्थक अतीत की उस प्रवृत्ति के जरिये आईसीएचआर के मौजूदा पक्षपात का औचित्य ठहराते हैं।


बेशक इसे झुठलाया नहीं जा सकता, लेकिन तब बेहतरीन मार्क्सवादी इतिहासकारों को इतिहास लेखन से जोड़ा जाता था, और उसमें भी प्राथमिक स्रोतों की गहरी छानबीन की जाती थी, जिसका दक्षिणपंथियों द्वारा मौजूदा इतिहास लेखन या पुनर्लेखन में गहरा अभाव है। इसके अलावा, हमारे बेहतरीन इतिहासकारों ने शायद ही कभी आईसीएचआर की आड़ ली थी। वे विश्वविद्यालयों से जुड़े थे, जहां वे शोध छात्रों को दिशानिर्देश देते थे और अपनी किताबें व लेख लिखते थे, जिनका दायरा बहुत विस्तृत होता था, जिनमें प्राथमिक स्रोतों का व्यापकता से इस्तेमाल होता था, और जो शायद ही कभी पार्टी या राजनीतिक एजेंडे से चालित होता था। उन इतिहासों के लेखक विद्वान थे। उनमें से कुछ मार्क्सवादी थे, पर ज्यादातर नहीं थे।

लेकिन आज जब प्राचीन भारत की बात आती है, तब हिंदुत्व अपने इतिहासकारों से भारत को इस तरह दिखाने की बात कहता है, जैसे तब देश दर्शन, भाषा, साहित्य, शासन कला, चिकित्सा, खगोलविज्ञान आदि में दुनिया में अग्रणी और खासकर अमेरिका और यूरोप से आगे था। सुदूर अतीत में सर्वश्रेष्ठता की यह परिकल्पित सोच दरअसल अपने सांस्कृतिक गौरव को बल देने के उद्देश्य से प्रेरित है, और इसका एक उद्देश्य यह बताना भी है कि भारत जल्दी ही फिर से विश्व का नेतृत्व करेगा। जब मध्यकाल की बात आती है, तब हिंदुत्व अपने इतिहासकारों को मुस्लिम शासकों को दुष्ट और विश्वासघाती के रूप में पेश करने तथा हिंदू शासकों की भद्र तथा धार्मिक छवि दिखाने के लिए कहता है।

और जब आधुनिक काल की बात आती है, तब हिंदुत्व अपने इतिहासकारों को आजादी के आंदोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भूमिका खत्म कर देने के लिए कहता है। व्यक्तित्वों के मामले में यह गांधी और नेहरू को कमजोर व दुविधाग्रस्त तथा सावरकर एवं बोस को नायकोचित तथा अटल व्यक्तित्व का बताने के लिए कहता है।

हिंदुत्व द्वारा लिखा गया इतिहास असंगति और त्रुटियों से भरा है। भारत को 'लोकतंत्र की जननी' बताने के साथ-साथ उन प्राचीन या मध्यकालीन राज्यों की महानता का बखान नहीं किया जा सकता, जिन्होंने राजाओं के दैवीय अधिकार बरकरार रखे। जब देश भर में कहीं भी 150 साल तक शासन करने वाले राजतंत्रों का गुणगान करना है, तो फिर कांग्रेस की उसकी वंशवादी राजनीति के लिए आलोचना नहीं की जा सकती। ऐसे ही, बोस और गांधी को कठोर प्रतिद्वंद्वियों की तरह दिखाना अतीत के उस दौर की अनदेखी करना है, जब वे एक साथ थे। और जब उनके राजनीतिक रास्ते अलग हुए, तब भी गांधी के प्रति बोस का सम्मान बरकरार था। उन्होंने उन्हें राष्ट्रपिता कहा, और अपने लड़ाका ब्रिगेड्स के नाम उन्होंने गांधी, नेहरू और मौलाना आजाद के नाम पर रखे।

हिंदुत्व के इतिहास की मूलभूत आलोचना इस आधार पर की जा सकती है कि यह इतिहास लेखन के शिल्प के मामले में बहुत दुर्बल है। हिंदु्त्व के इतिहासकार मूलत: प्रसिद्ध, ताकतवर और प्रभावशाली लोगों को फोकस करते हैं और संदर्भ या बारीकियों में गए बगैर उन्हें अच्छा या बुरा बता देते हैं। हमें इसका पता नहीं चलता कि इन ऐतिहासिक किरदारों के मानवीय रिश्ते कैसे थे, इन पर किस तरह का सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव पड़ा, इनके फैसलों का मनोवैज्ञानिक आधार क्या था, उन्हें किस तरह के समझौते करने पड़े और उन्होंने कैसी विरासतें छोड़ीं।

आखिरकार इतिहास प्रसिद्ध या शक्तिशाली लोगों के जीवन और कार्य के अलावा भी बहुत कुछ है। हाल के दशकों में-भारत में और भारत से बाहर भी-इतिहासकारों ने इतिहास के अनेक पहलुओं का उत्खनन किया है, उन्होंने सामान्य लोगों का भी इतिहास लिखा है, और जिनमें युद्ध में जीत या हार के बजाय दूसरी घटनाओं का भी वर्णन है। यह सामान्य जनों का इतिहास है, जिसमें किसानों, कामगारों, कलाकारों, आदिवासियों और हाशिये के लोगों के जीवन और संघर्ष की कहानियां हैं। ऐसे ही, महिलाओं का इतिहास है, जिसमें वह आधी आबादी केंद्र में है, जिसके साथ प्राय: भेदभाव होता आया है, और जो पुरुषवर्चस्ववादी विमर्श में लंबे समय तक अदृश्य ही रही। या पर्यावरणीय इतिहास पर विचार कीजिए, जिसमें यह बताया गया है कि प्रकृति और प्राकृतिक दबावों का मनुष्य पर कैसा असर पड़ा।

विभिन्न क्षेत्रों के ऐतिहासिक अध्ययन की यह सूची उदाहरण के लिए दी गई है, यह संपूर्ण नहीं है। इसके बावजूद इससे मानव जीवन और अनुभवों की व्यापकता का पता चलता है, जिसकी हिंदुत्व इतिहास अनदेखी करता है, लेकिन अतीत के बारे में जानने के इच्छुक शिक्षित भारतीय जिनके बारे में जानना चाहेंगे। किसी भी तरह की विचारधारा के प्रति रुचि न रखने वाले पेशेवर इतिहासकारों ने इन विषयों पर खूब लिखा है। वे इतिहासकार इंडियन इकोनॉमिक ऐंड सोशल हिस्ट्री रिव्यू (आईईएसएचआर) जैसे जर्नल में छपते रहे हैं, जिसकी ख्याति स्वर्गीय प्रोफेसर धर्मा कुमार के कारण थी, जिन्होंने करीब तीन दशकों तक इसका संपादन किया था। प्रोफेसर कुमार एक उदारवादी थीं, जिन्होंने वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधाराओं को आत्मसात किया था, हालांकि मार्क्सवादी उनसे नफरत करते थे।

जाहिर है, इतिहासकार मानव अनुभवों से जुड़े सभी आयामों का अध्ययन करते हैं। लेकिन हिंदुत्व के इतिहासकारों की इसमें तनिक भी रुचि नहीं। हिंदू 'सभ्यता' और हिंदू 'नायकों' के उत्खनन के जरिये ही वे अपनी वैचारिकता का पोषण करते हैं।  

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