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टाइम की सूची पर उनका गुस्सा
सुरजीत सिंह
Updated Thu, 11 Dec 2014 07:33 PM IST
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हमारे मित्र सुबह से भुनभुना रहे हैं। उनका गुस्सा गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ का दर्जा दिए जाने के सवाल पर आई नकारात्मक प्रतिक्रियाओं पर नहीं है। उनका गुस्सा प्रधानमंत्री को 'टाइम पर्सन ऑफ द ईयर' की दौड़ से बाहर किए जाने पर भड़का हुआ है।
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वह आते ही मुझसे बोले, बताइए, क्या नोटा-वोटा का इस्तेमाल संभव है?
नोटा-वोटा का तो नहीं है, हां...चाहें तो आप अपने विशुद्ध भारतीय नेताई शैली में जरूर जवाब दे सकते हैं, मैंने कहा।
इस पर पश्चिम की ओर मुंह करते हुए वह बोले, तो लीजिए, मैं टाइम की इस सूची को सिरे से खारिज करता हूं। इसके पीछे विरोधियों का हाथ है।
खारिज करना तो आपका अधिकार भी है और आपके वैचारिक मूल का केंद्रबिंदु भी, पर चुनने का अधिकार उनका है। आप उनकी चयन प्रक्रिया पर उंगली कैसे उठा सकते हैं?
उठाने को तो हम टाइम पर ही सवाल उठा दें। लेकिन यहां तो सरासर बेईमानी है। जो शख्स 16.2 फीसदी वोटों के साथ पहले नंबर पर दौड़ रहा था, उसे अचानक सूची से बाहर कर देना समझ से परे है। हमारे यहां यह सरासर चीटिंग होती है।
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चलिए, मान लीजिए कि यह चीटिंग है। पर इसमें आपने खोया क्या है? कम से कम दौड़ में तो आए, इसी से संतोष कर लीजिए।
कमाल करते हैं आप। आजकल हमें संतोष सिर्फ लिस्ट में आने भर से नहीं होता, हर सूची का टॉप हमारा लक्ष्य है। पता है, गांधीजी के बाद मोदी दूसरे भारतीय व्यक्ति होते, जो यह रुतबा हासिल करते।
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लेकिन भाई साहब, आपकी भी यह कैसी मजबूरी है कि जबर्दस्त वैचारिक मतभेद के बावजूद आपको श्रेष्ठता साबित करने के लिए तुलना से लेकर प्रतिमान चुनने तक सब कुछ के लिए गांधीजी की ओर ही देखना पड़ता है।
इस पर मित्र एकाएक चुप हो गए। लेकिन उनके चेहरे से ऐसा लग रहा था, जैसे विश्व विजय का संदेश लेकर निकले उनके अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को किसी ने रोक लिया हो।