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संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में पिछड़ता हिंदी माध्यम

Mon, 24 Aug 2020 08:12 PM IST
Narpat Dan Baarhath नरपत दान बारहठ
Updated Mon, 24 Aug 2020 08:12 PM IST
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Hindi medium trailing in UPSC
हिंदी दिवस - फोटो : सोशल मीडिया

हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग ने पीसीएस परीक्षा, 2019 का अंतिम परिणाम जारी किया है। हर साल की तरह इस बार भी हिंदी माध्यम से सफल अभ्यर्थियों की संख्या नाममात्र ही है। कुल 829 में से लगभग 15 अभ्यर्थी हिंदी माध्यम से चयनित हुए हैं। पिछले करीब आठ साल से यूपीएससी में हिंदी माध्यम के अभ्यर्थी पिछड़ रहे है।


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इसके लिए यूपीएससी की नीति को जिम्मेदार ठहराया जाता है। पर यह एकमात्र कारण नहीं है। दरअसल 2013 में जब यूपीएससी मुख्य परीक्षा के सिलेबस में आमूलचूल परिवर्तन किया गया था, तभी से हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों की संख्या कम होने लगी है।

वर्ष 2013 में हिंदी माध्यम के अभ्यर्थी 17 प्रतिशत थे, जो कम होकर 2014 में 2.11 प्रतिशत, 2015 में 4.28 फीसदी, 2016 में 3.45 प्रतिशत, 2017 में 4.06 प्रतिशत, 2018 में 2.16 प्रतिशत और 2019 में करीब दो प्रतिशत रह गया।
लालबहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि वर्ष 2018 में 370 आईएएस प्रशिक्षार्थियों में से सिर्फ आठ अभ्यर्थियों का माध्यम हिंदी रहा।

यूपीएससी में हिंदी माध्यम के पिछड़ने के कई कारण हैं। दरअसल 2013 से पहले की परीक्षा पद्धति में दो वैकल्पिक विषय होते थे, जिनकी हिस्सेदारी 60 फीसदी (1200/2000 अंक) की थी और सामान्य अध्ययन की भूमिका सिर्फ 30 प्रतिशत (600/2000 अंक) थी। सामान्य अध्ययन में हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों को पिछले करीब 20-22 साल में कभी अंग्रेजी माध्यम की तुलना में बराबर या अधिक अंक नहीं मिले हैं।

दोनों माध्यमों में सामान्य अध्ययन के सर्वोच्च अंकों की तुलना करेंगे, तो पाएंगे कि अंग्रेजी माध्यम का टॉपर हिंदी माध्यम के टॉपर की तुलना में ऊपर ही रहा है। इस नुकसान की भरपाई हिंदी माध्यम के उम्मीदवार अपने वैकल्पिक विषयों, निबंध आदि के माध्यम से करते रहे हैं।

वर्ष 2013 से सामान्य अध्ययन का वजन बढ़कर लगभग 57 प्रतिशत (1000/1750) हो गया है, जबकि वैकल्पिक विषय (जो कि अब दो के बजाय एक रह गया है) का वजन घटकर सिर्फ 29 फीसदी (500/1750) रह गया है। हिंदी माध्यम के पिछड़ने का दूसरा कारण यह है कि सामान्य अध्ययन के लिए अंग्रेजी की वेबसाइट और अंग्रेजी जर्नल की स्तरीय सामग्री उपलब्ध है, जबकि हिंदी माध्यम के लिए नाममात्र की स्तरीय सामग्री उपलब्ध है भी, तो वह निजी कोचिंग संस्थानों द्वारा ही दी जा रही है।

मॉडल उत्तरों का सिर्फ अंग्रेजी भाषा में होना भी एक अवरोध है। प्रश्नों का अंग्रेजी से हिंदी में दुरूह रूपांतरण भी एक कारण है। कुछ परीक्षकों का हिंदी व भारतीय भाषाओं के प्रति अस्वस्थ नजरिया तो मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार है ही। मूल प्रश्नपत्र अंग्रेजी में तैयार किया जाता है, फिर उसका तकनीकी रूप से हिंदी रूपांतरण किया जाता है, जिससे ऐसे हिंदी शब्द सामने आते हैं, जिनके अर्थ और प्रश्न की प्रकृति समझ से बाहर होती हैं।

फिर हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों को उसी प्रश्न को अंग्रेजी में समझने का प्रयास करना पड़ता है, जिससे वक्त बर्बाद होता है। यूपीएससी की हिंदी शब्दावली पर एक नजर डालें, तो कई अनोखे शब्द सामने आते हैं, जैसे सब्सिडी के लिए साहाय्य, दीमक की जगह बरुथी, अर्थ आवर की जगह पृथ्वीकाल, वैश्वीकरण की जगह विश्व व्यापीकरण, आधारभूत की जगह अधःशायी, संकल्पना की जगह संप्रत्यीकरण, इंसर्जेंट्स के लिए उपप्लवियों, बोनाफाइड मिस्टेक के लिए सद्भाविक भूल, सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए दीर्घोपयोगी विकास, फार्मास्युटिकल कंपनी के लिए भैषजिक कंपनी आदि। अनुवाद में स्टील प्लांट 'लोहे का पेड़' हो जाता है! होना यह चाहिए कि मूल प्रश्नपत्र हिंदी में बने, फिर उसका अंग्रेजी अनुवाद हो।

हालांकि हिंदी पढ़ने का स्तर भी कमजोर हो रहा है। उत्तर प्रदेश के हाई स्कूल और इंटर की परीक्षा में करीब आठ लाख परीक्षार्थी हिंदी में फेल हो गए। यही विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठेंगे, तो दिक्कत आएगी ही। बहरहाल यूपीएससी में हिंदी माध्यम की विफलता के मुद्दे पर सरकार, यूपीएससी और परीक्षार्थियों को सामूहिक रूप से चर्चा कर हल निकालना चाहिए, ताकि भविष्य में हिंदी की समृद्धि का रास्ता अवरुद्ध न हो।

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