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हिंदी पत्रकारिता दिवस: सत्य, साहस और समाचार... 199 साल पहले बनी योजना की झलक आज भी दिखती है
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हिंदी पत्रकारिता दिवस (सांकेतिक)
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अमर उजाला प्रिंट / मेटा एआई
विस्तार
हिंदी के पहले समाचार पत्र उदंत मार्तंड की प्रकाशन तिथि 30 मई नई पीढ़ी को भारतीय पत्रकारिता की ऐतिहासिक मिशनरी परंपरा से रूबरू कराती है। उस वक्त आज की तरह संचार के अनेक माध्यम नहीं थे। छापाखानों का आविष्कार मीडिया की ‘मैजिक मल्टीप्लायर’ भूमिका का आधार बना। 1780 में भारत के पहले अंग्रेजी अखबार हिक्कीज बंगाल गजट का प्रकाशन हिंदी के जज्बाती संचारकों के लिए चुनौती था, जिसे स्वीकार कर आज ही के दिन 1826 में कलकत्ता (अब कोलकाता) से उदंत मार्तंड की शुरुआत हुई।
यह वर्ष हिंदी पत्रकारिता का द्विशताब्दी वर्ष है। दो सदी पहले पत्रकारिता के उद्देश्य कुछ और थे। आज ‘फेक न्यूज’ के तूफानी दौर में ‘सत्य समाचार’ के लिए समर्पित हिंदी के पहले समाचार पत्र उदंत मार्तंड की स्मृतियां और इसका योगदान प्रेरणास्रोत है। ‘सत्य’ को पत्रकारिता की आत्मा मानने वाले मिशनरी पत्रकार-संपादक पंडित युगल किशोर शुक्ल ने अपने बलबूते हिंदी का प्रथम समाचार पत्र प्रकाशित कर हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी। यह दिवस पत्रकारिता का ‘संकल्प पर्व’ है।
कलकत्ता की कोलूटोला-आमड़ातल्ला की गली से उदंत मार्तंड के रूप में शुरू हुई हिंदी पत्रकारिता आज हिंदी में समाचार, विचार और प्रचार-विज्ञापन का माध्यम सिर्फ छापाखाने से निकलने वाले अखबारों-पत्रिकाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि टेलीविजन, रेडियो और सोशल मीडिया तक फैल चुकी है। 30 मई, 1826 से 11 दिसंबर, 1827 तक कुल 79 अंक प्रकाशित होकर भले ही उदंत मार्तंड अपनी यात्रा आगे जारी न रख सका हो, पर 199 साल पहले शुक्ल जी ने अखबार प्रकाशन की जो आदर्श योजना बनाई, उसकी झलक आज भी हिंदी समाचार पत्रों में देखने को मिलती है। हिंदी पत्रकारिता उनके योगदान की सदैव ऋणी रहेगी।
उन्होंने स्पष्ट मत व्यक्त किया, ‘अंग्रेजी, फारसी और बंगला भाषा के पत्र तो निकलते हैं, लेकिन हिंदी का कोई भी स्वतंत्र पत्र नहीं निकलता, यह िचंतनीय है।’ हिंदी का प्रथम समाचार पत्र प्रकाशित करने के पीछे शुक्ल जी का संकल्प और उद्देश्य था-‘हिंदी भाषी अपनी निज भाषा में ही सत्य समाचार पढ़कर उसका आनंद लें।’ वस्तुतः उदंत मार्तंड का अर्थ है-समाचार सूर्य। यह पत्र समाचार रूपी सूर्य था, जिसके प्रकाशन का उद्देश्य पाठकों को सूचनाओं और समाचारों के प्रकाश से युक्त करना रहा। शुरू से ही इसके दो संकल्प स्पष्ट थे, ‘सत्य समाचार’ और ‘साहस’। ‘सत्य को समाचारों की आत्मा मानने के संकल्प के साथ उदंत मार्तंड का प्रकाशन शुरू हुआ।
इतिहास साक्षी है कि अखबार के संपादन और प्रकाशन में जोखिम हमेशा रहा है। हिंदी के इस प्रथम पत्र में भी बाजार भाव तथा अन्य आर्थिक समाचारों को पूरा महत्व दिया गया था। हर मंगलवार को प्रकाशित उदंत मार्तंड में व्यापारिक जहाजों के आने-जाने की सूचनाएं भी प्रकाशित होती थीं। समाचार और विचार भी पूरे तथ्य और इनकी सत्यता के प्रमाण सहित प्रकाशित किए जाते थे। उदंत मार्तंड के प्रकाशन पर्व का यह दिवस हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली अतीत और वर्तमान के स्मरण तथा आत्मनिरीक्षण का अवसर है।
‘फेक न्यूज’ जैसे भंवर में फंसे और भटकते पत्रकारिता के जहाज को आज भी उदंत मार्तंड के आदर्श ‘सत्य समाचार’ की ओर बढ़ने का रास्ता दिखाते हैं। विद्वान, मनीषी चाणक्य की यह मान्यता ‘जब चारों ओर अंधकार हो और कुछ साफ दिखाई न पड़े, तो ‘गुरु, शिक्षक की ओर देखो, रास्ता अवश्य मिलेगा’, मीडिया और पत्रकारिता के लिए बिल्कुल सटीक है। मीडिया या पत्रकारिता, पत्रकार और संपादक की ऐतिहासिक भूमिका, कार्य और उद्देश्य में आए तेजी से बदलाव ने संपूर्ण विश्व की पत्रकारिता, उसके मूल उद्देश्यों तथा पत्रकार-संपादक की भूमिका के समक्ष अनेक ज्वलंत प्रश्न उपस्थित किए हैं।
साख को बट्टा लगाने के लिए पत्रकारिता की आड़ में बाजार में आज कई असामाजिक तत्व सक्रिय हैं। विश्वसनीयता, जो पत्रकारिता की मूलभूत पूंजी है, के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं। एक दौर था, जब पत्रकारिता या मीडियाकर्म और मीडियाकर्मी का कोई भी कार्य ‘पेड’ नहीं था। अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले जज्बाती लोग पहले पत्रकारिता में आते थे। उदंत मार्तंड के वक्त की चुनौतियां अलग थीं और आज की बिल्कुल अलग हैं, लेकिन पत्रकारिता के आदर्श तब भी समाज हित थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। ऐसी अनेक चुनौतियों के बावजूद भारतीय पत्रकारिता, खासकर हिंदी पत्रकारिता की भूमिका समाज में कमजोर नहीं हुई है।