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अमेरिका में हिंदी की धमक
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उमेश चतुर्वेदी
मातृभाषा, अपनी माटी और अपने लोगों की अहमियत तब ज्यादा समझ में आती है, जब हम उससे दूर होते हैं। अपनी माटी से दूर परायों के बीच निजी स्मृतियां और रिश्ते हूक की तरह याद आते हैं। ऐसे माहौल में सुकून अपनी बोली-बानी में अभिव्यक्ति के साथ ही अपना खान-पान, अपनी परंपराएं देती हैं। लेकिन परदेसी माटी पर अपनी बोली-बानी के इस्तेमाल और अपनी परंपराओं में जीने का साहस तब आता है, जब अपने जैसे लोगों की संख्या बढ़ती है। कहना न होगा कि अमेरिकी धरती पर हिंदी की बढ़ती पहुंच के पीछे भी यही मनोविज्ञान काम कर रहा है। अमेरिका की धरती पर हिंदी बोलने वालों की संख्या बढ़कर आठ लाख 63 हजार हो जाना सामान्य बात नहीं है।
अमेरिकी जनगणना ब्यूरो ने साल 2017 के लिए जो अमेरिकी कम्युनिटी सर्वे रिपोर्ट जारी की है, उसके मुताबिक, अमेरिका की कुल जनसंख्या यानी 30.5 करोड़ लोगों में से करीब 21.8 फीसदी लोग अपने घरों, आपसी सामुदायिक व्यवहार और दूसरे कार्यों के लिए अंग्रेजी की बजाय दूसरी भाषाओं का प्रयोग करते हैं। इसमें भारतीय मूल के लोगों की बड़ी संख्या है। इन भारतीयों में सबसे बड़ी संख्या हिंदी वालों की है। दूसरे नंबर पर गुजराती और उसके बाद तेलुगूभाषी हैं। अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के मुताबिक, अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के अमेरिकी लोगों में से 26 लाख 10 हजार भारतीय ऐसे हैं, जिनका जन्म भारत में हुआ है। इसके अलावा भारी संख्या उन लोगों की भी है, जिनके माता-पिता में से किसी एक या दोनों का जन्म भारत में हुआ है।
भारत में भले ही विकासवाद, आधुनिकतावाद और एलीटनेस का पर्याय अंग्रेजी हो, लेकिन अमेरिका में यही अंग्रेजी रोजी-रोजगार देने के बावजूद भारतीय मूल के लोगों के लिए बोझिल भी हो जाती है। इसलिए वे अपनी भाषाओं का आपसी बातचीत में इस्तेमाल करने लगते हैं।
इस रिपोर्ट के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि आने वाले दिनों में अमेरिकी धरती पर भी हिंदी, गुजराती, तेलुगू, तमिल या बांग्ला के फूल उसी तरह छा जाएंगे, जैसे माॅरीशस, फिजी, गुयाना जैसी भारतीय मूल के लोगों से भरी-पड़ी जगहों पर छा गए हैं। जहां की बोली-बानी और व्यवहार में भारतीयता की धमक ज्यादा है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका आज दुनिया का दादा है, उसकी अगुआई में बनने वाली सामरिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों का दुनियाभर में असर होता है।
भारतीय लोगों की एक खासियत है कि दुनिया में चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियों में वे क्यों नहीं गए, उन्होंने वहां मध्यकालीन अंग्रेज, स्पेनिश या फ्रेंच मूल के लोगों की तरह राजनीतिक वर्चस्व कायम करने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसी देश की माटी में खुद की परंपराओं और भाषा को खुद की इकाई में बचाए रखते हुए खुद को समाहित कर दिया। आज कनाडा, ब्रिटेन या अमेरिका जैसे देशों में भारतीय मूल के लोग अगर राजनीतिक तौर पर अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, तो उसके पीछे लोकतांत्रिक मूल्य और परंपराएं हैं, वर्चस्ववादी धारणा नहीं।
वैसे हिंदी को लेकर अमेरिकी भारतीय समुदाय पहले से ही सचेत और कार्यशील है। यहां मंदिरों और भारतीयों के सामुदायिक केंद्रों में रविवार और दूसरी छुट्टियों के दिन हिंदी पढ़ाई और सिखाई जाती है। यहां के येल, न्यूयॉर्क और विनकांसन विश्वविद्यालयों में पहले से ही हिंदी की पढ़ाई हो रही है। इन विश्वविद्यालयों में छात्रों की तादाद भी हर साल बढ़ती जा रही है। अंकल सैम की धरती पर बढ़ती अपनी हिंदी की यह विनम्र धमक उम्मीद जताती है कि आने वाले दिनों में वह और नए कीर्तिमान गढ़ सकती है।
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अमेरिकी जनगणना ब्यूरो ने साल 2017 के लिए जो अमेरिकी कम्युनिटी सर्वे रिपोर्ट जारी की है, उसके मुताबिक, अमेरिका की कुल जनसंख्या यानी 30.5 करोड़ लोगों में से करीब 21.8 फीसदी लोग अपने घरों, आपसी सामुदायिक व्यवहार और दूसरे कार्यों के लिए अंग्रेजी की बजाय दूसरी भाषाओं का प्रयोग करते हैं। इसमें भारतीय मूल के लोगों की बड़ी संख्या है। इन भारतीयों में सबसे बड़ी संख्या हिंदी वालों की है। दूसरे नंबर पर गुजराती और उसके बाद तेलुगूभाषी हैं। अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के मुताबिक, अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के अमेरिकी लोगों में से 26 लाख 10 हजार भारतीय ऐसे हैं, जिनका जन्म भारत में हुआ है। इसके अलावा भारी संख्या उन लोगों की भी है, जिनके माता-पिता में से किसी एक या दोनों का जन्म भारत में हुआ है।
भारत में भले ही विकासवाद, आधुनिकतावाद और एलीटनेस का पर्याय अंग्रेजी हो, लेकिन अमेरिका में यही अंग्रेजी रोजी-रोजगार देने के बावजूद भारतीय मूल के लोगों के लिए बोझिल भी हो जाती है। इसलिए वे अपनी भाषाओं का आपसी बातचीत में इस्तेमाल करने लगते हैं।
इस रिपोर्ट के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि आने वाले दिनों में अमेरिकी धरती पर भी हिंदी, गुजराती, तेलुगू, तमिल या बांग्ला के फूल उसी तरह छा जाएंगे, जैसे माॅरीशस, फिजी, गुयाना जैसी भारतीय मूल के लोगों से भरी-पड़ी जगहों पर छा गए हैं। जहां की बोली-बानी और व्यवहार में भारतीयता की धमक ज्यादा है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका आज दुनिया का दादा है, उसकी अगुआई में बनने वाली सामरिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों का दुनियाभर में असर होता है।
भारतीय लोगों की एक खासियत है कि दुनिया में चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियों में वे क्यों नहीं गए, उन्होंने वहां मध्यकालीन अंग्रेज, स्पेनिश या फ्रेंच मूल के लोगों की तरह राजनीतिक वर्चस्व कायम करने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसी देश की माटी में खुद की परंपराओं और भाषा को खुद की इकाई में बचाए रखते हुए खुद को समाहित कर दिया। आज कनाडा, ब्रिटेन या अमेरिका जैसे देशों में भारतीय मूल के लोग अगर राजनीतिक तौर पर अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, तो उसके पीछे लोकतांत्रिक मूल्य और परंपराएं हैं, वर्चस्ववादी धारणा नहीं।
वैसे हिंदी को लेकर अमेरिकी भारतीय समुदाय पहले से ही सचेत और कार्यशील है। यहां मंदिरों और भारतीयों के सामुदायिक केंद्रों में रविवार और दूसरी छुट्टियों के दिन हिंदी पढ़ाई और सिखाई जाती है। यहां के येल, न्यूयॉर्क और विनकांसन विश्वविद्यालयों में पहले से ही हिंदी की पढ़ाई हो रही है। इन विश्वविद्यालयों में छात्रों की तादाद भी हर साल बढ़ती जा रही है। अंकल सैम की धरती पर बढ़ती अपनी हिंदी की यह विनम्र धमक उम्मीद जताती है कि आने वाले दिनों में वह और नए कीर्तिमान गढ़ सकती है।