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हिंदी को उसका हक चाहिए
Updated Mon, 20 May 2013 03:26 PM IST
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यह महज एक संयोग ही है कि एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय ने राजभाषा हिंदी को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, दूसरी तरफ न्यायपालिका और प्रशासन में भारतीय भाषाओं को लागू करने की मांग को लेकर राजधानी दिल्ली में दो बड़े धरने चल रहे हैं।
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कांग्रेस मुख्यालय के बाहर पिछले पांच महीनों से श्याम रुद्र पाठक शीर्ष अदालत में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने को लेकर धरने पर बैठे हैं, तो पुष्पेंद्र सिंह चौहान और अन्य लोग जंतर-मंतर पर सर्वोच्च न्यायालय और यूपीएससी में भारतीय भाषाओं को लागू करने की मांग को लेकर धरना दिए हुए हैं।
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ये लोग भारतीय भाषाओं को उनका हक दिलाने के लिए अतीत में भी लड़ाई लड़ चुके हैं। लेकिन इस बार की लड़ाई सचमुच कठिन है, क्योंकि अदालतों में भारतीय भाषाओं को लागू करने को लेकर हमारा संविधान भी चुप है। जाहिर है, इसके लिए हमारी संसद को भी आगे आना होगा।
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इस संदर्भ में अत्यंत सकारात्मक सूचना यह है कि इन्हीं दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसे मामले को संज्ञान में लेते हुए हिंदी के पक्ष में फैसला दिया, जिसका बड़े पैमाने पर सरकारी दफ्तरों में हनन होता रहा है। मामला यह है कि भारतीय नौसेना के एक कर्मचारी मिथिलेश कुमार सिंह के खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई चल रही थी। सिंह ने मांग की कि उन्हें कार्रवाई से संबंधित कागजात हिंदी में दिए जाएं। लेकिन कार्यालय ने ऐसा नहीं किया। सिंह ने भी आगे की कार्रवाई में सहयोग नहीं दिया।
यह कोई नई बात नहीं है। अमूमन हर विभाग के हर दफ्तर में ऐसा होता रहा है। हिंदीभाषी इलाकों में भी कार्रवाई अंग्रेजी में होती है। कर्मचारी भी प्रताड़ित होने के भय से उसे हिंदी में करवाने की मांग नहीं करते। न सरकारी दफ्तर और अदालतें इस मामले में राजभाषा का साथ देती हैं। मिथिलेश कुमार सिंह केंद्रीय कर्मचारियों के प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के पास भी गए और मुंबई उच्च न्यायालय में भी। लेकिन दोनों ही जगहों से उन्हें दुत्कार मिली।
यह इसलिए नहीं हुआ कि कानून उनके पक्ष में नहीं था। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि पहले हमारी अदालतों ने राजभाषा से संबंधित कानूनों पर कभी गौर ही नहीं फरमाया। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एचएल दत्तू और न्यायमूर्ति जेएस केहर ने पहली बार राजभाषा से संबंधित कानूनों को खंगाला और उन्हें व्यावहारिक कानून के दायरे में रखकर समझा।
अभी तक हम इन कानूनों को नखदंतहीन मानते आए हैं, क्योंकि संविधान में पर्याप्त स्थान पाने और राजभाषा अधिनियम, नियम, संकल्प और तरह-तरह के आदेशों के बावजूद आज भी लोग इन्हें सिर्फ सूक्ति वाक्यों की तरह ही लेते हैं।
यह तथ्य है कि सरकारी कामकाज में हिंदी को लागू करने को लेकर कोई भी गंभीर नहीं है। हिंदी दिवस पर हर साल रस्म अदायगी होती है। हर दफ्तर, शहर, विभाग, मुख्यालय, मंत्रालय और संसद हर जगह हिंदी कार्यान्वयन समितियां बनी हुई हैं। यह प्रक्रिया 1976 में राजभाषा नियम बनने के बाद शुरू हुई, लेकिन इससे भी कोई गुणात्मक सुधार नहीं आ पाया। हिंदी अनुवादकों और अफसरों की भर्ती तो हो गई, लेकिन हिंदी में मौलिक लेखन नहीं बढ़ पाया।
जहां तक हिंदी को राजभाषा के रूप में लागू करने का सवाल है, तो उसकी प्रगति एक कदम आगे, दो कदम पीछे वाली रही है। संविधान के अनुच्छेद 343 में स्पष्ट व्यवस्था होने के बावजूद व्यावहारिक स्तर पर हिंदी आज तक अंग्रेजी की सौतेली बहन ही बनी हुई है।
1963 में राजभाषा अधिनियम बना, लेकिन साथ ही, दक्षिण भारत में हिंदी-विरोधी दंगे करवा दिए गए। नतीजतन 1967 में इसमें कुछ संशोधन करने पड़े। उसके बाद तो हिंदी की स्थिति और भी कमजोर हो गई।
कहा गया कि अंग्रेजी का प्रयोग तब तक जारी रहेगा, जब तक अंग्रेजी भाषा का प्रयोग समाप्त कर देने के लिए ऐसे सभी राज्यों के विधानमंडलों द्वारा संकल्प पारित नहीं कर दिए जाते, जिन्होंने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, और जब तक पूर्वोक्त संकल्पों पर विचार कर लेने के पश्चात ऐसी समाप्ति के लिए संसद के हर एक सदन द्वारा संकल्प पारित नहीं कर दिया जाता।
यानी पहले सभी राज्य हां करें, फिर संसद के दोनों सदन हां कहें, तब जाकर हिंदी पूर्ण राजभाषा हो पाएगी। कोई भी अहिंदी भाषी राज्य ऐसा क्यों करेगा? इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान हिंदी प्रेमियों के आग्रह पर राजभाषा नियम बनाए थे। शुक्र है कि आपातकाल में नियम बन गया, वरना यह भी संभव नहीं था।
बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय ने जिस नियम को आधार बनाकर मिथिलेश कुमार सिंह को न्याय दिलाया है, वह यही नियम है, जिसमें 1967 के संशोधित अधिनियम के तहत राजभाषा के रूप में हिंदी को लागू करने में कुछ सख्ती बरतने की बात कही गई है। यानी हमारे पास कानून मौजूद है, लेकिन कभी किसी ने उन्हें कानून की नजर से नहीं देखा।
हर महीने-तीन महीने में हिंदी कार्यान्वयन की रिपोर्ट राजभाषा विभाग को भेजी जाती है, जिसमें ऐसा झूठा दावा किया जाता है कि 90 प्रतिशत काम हिंदी में हो रहा है। संसदीय समिति भी दौरे तो बहुत करती है, लेकिन सांसदों की दिलचस्पी हिंदी को लागू करवाने में कम, उपहार बटोरने में ज्यादा होती है। इसलिए हिंदी को कार्यालयों में लागू करने का अनुष्ठान महज एक प्रहसन बनकर रह गया था।
ऐसे में शीर्ष अदालत का यह हस्तक्षेप सरकारी कामकाज में हिंदी को लागू करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। अदालत का थोड़ा-सा भी भय नौकरशाही को हो, तो वह राजभाषा कानूनों की अवहेलना नहीं करेगी।