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भाषाई स्वाभिमान की लड़ाई
Updated Fri, 19 Apr 2013 09:17 PM IST
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मौजूदा हालात में जिस तेजी से भारतीय जिंदगी के तमाम क्षणों में उदारीकरण और उसके जरिये आई नई सोच ने अपनी पैठ बनाई है, उसमें भाषाई स्वाभिमान की चर्चा करना ही बेमानी है।
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चूंकि भारतीयता की मौजूदा अवधारणा के बीज आजादी के आंदोलन की कोख में पड़े थे, लिहाजा मध्यवय की ओर बढ़ रही पीढ़ी को भाषाई अस्मिता के सवाल नई पीढ़ी की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभावित और विचलित करते रहे हैं।
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विचलन की इस स्थिति का विस्तार इन दिनों जारी एक भाषाई आंदोलन और उसके प्रति भारतीय भाषाओं के समाज के उदासीनता बोध के चलते कहीं ज्यादा हो रहा है।
हिंदी में पहली बार 1985 में आईआईटी, दिल्ली में बी.टेक की प्रोजेक्ट रिपोर्ट लिख चुके श्याम रुद्र पाठक और उनके दो साथी गीता मिश्र और विनोद कुमार पांडेय चार दिसंबर, 2012 से ही एक महत्वपूर्ण सवाल को लेकर 10, जनपथ के सामने धरने पर बैठे हैं।
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रोजाना उनका धरना सुबह नौ बजे शुरू होता है और शाम को पांच बजे निषेधाज्ञा शुरू होने के बाद पुलिस द्वारा खत्म करा दिया जाता है। इन आंदोलनकारियों की मांग इंसाफ के दरवाजे पर जूझते लोगों को उनकी अपनी जुबान में इंसाफ मुहैया कराना है।
संविधान के अनुच्छेद, 348 के खंड ख में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कामकाज की भाषा सिर्फ अंग्रेजी होगी। संविधान निर्माताओं के समक्ष जरूर कोई मजबूरी रही होगी।
अन्यथा जिन लोगों ने 14 सितंबर, 1949 को हिंदी को अपनी राजभाषा के तौर पर स्वीकार किया, वे उपरी अदालतों में कामकाज की भाषा के तौर पर अंग्रेजी में कामकाज को मान्यता क्यों देते। हो सकता है कि तब न्यायमूर्तियों में भारतीय भाषा और हिंदी के ज्ञान की कमी संविधान निर्माताओं की मजबूरी की वजह रहा हो।
लेकिन जिस देश में गांव-गांव तक कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे अंग्रेजी स्कूलों के बावजूद अगर सिर्फ तीन फीसदी लोग ही ठीक से अंग्रेजी बोल पाते हों, वहां उपरी अदालतों में अंग्रेजी में कामकाज का औचित्य नहीं है।
आंदोलनकारियों की सोनिया गांधी से सिर्फ यही मांग है कि उच्च न्यायपालिका में भारतीय भाषाओं में कामकाज कराने को लेकर संविधान में संशोधन हो।
अपने देश में हिंदी को लेकर भले ही भाषायी बोध इतना आक्रामक न हो, लेकिन स्थानीय भाषाओं के समर्थक और उनकी पूजा करने वाले स्थानीय लोग बेहद आक्रामक हैं।
अगर ऐसा संशोधन होता है, तो कोलकाता उच्च न्यायालय में हिंदी-अंग्रेजी के अलावा बांग्ला और मद्रास उच्च न्यायालय में हिंदी-अंग्रेजी के अलावा तमिल में बहस और सुनवाई हो सकेगी। वैसे राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर पहला उच्च न्यायालय है, जहां कामकाज की भाषा अंग्रेजी के अलावा हिंदी भी है।
उसे हिंदी में कामकाज की अनुमति 14 फरवरी, 1950 को मिली थी। इसी तरह इलाहाबाद और पटना उच्च न्यायालयों में भी हिंदी में कामकाज के लिए अनुमति मांगी गई थी, जिन्हें क्रमश: 1970 और 1972 में अनुमति मिली।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर में हिंदी में कामकाज करने की अनुमति 1971 में मिली थी। लेकिन इसके बाद जैसे इस पर रोक ही लग गई। वर्ष 2010 में तमिलनाडु उच्च न्यायालय में तमिल में, 2002 में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में हिंदी में और 2012 में गुजरात उच्च न्यायालय में गुजराती में काम करने की अनुमति मांगी गई।
लेकिन केंद्रीय गृह और कानून मंत्रालयों ने इनकार कर दिया। छत्तीसगढ़ सरकार की 2002 की मांग पर इनकार 2010 में आया। इसी से पता चलता है कि भाषायी स्वाभिमान को लेकर केंद्र सरकार और उसके रहनुमाओं की सोच क्या है।
सच्चाई यह है कि उच्च न्यायालयों में इंसाफ की आस में गए लोग वकीलों और माननीय न्यायमूर्तियों की अंग्रेजी सुनकर भौंचक रह जाते हैं। फरियादियों को पता ही नहीं होता कि उनके पक्ष को उनका वकील ठीक से रख भी रहा है या नहीं।
अगर उनकी अपनी भाषा में सुनवाई और बहस हो, तो उन्हें पता चले। यह मांग काफी पहले से है, लेकिन धरना-प्रदर्शन पहली बार हो रहा है। ऐसे ही संघर्ष से समाधान निकल कर आएगा। तब तक हमें इंतजार करना होगा।