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भूस्खलन: दरक रहा है हिमालयी क्षेत्र, पहाड़ी राज्यों में अभूतपूर्व है जलवायु परिवर्तन का स्वरूप
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उत्तराखंड में भूस्खलन (फाइल फोटो)
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अमरउजाला
विस्तार
इस साल हुई भारी बारिश के चलते मनसा देवी की पहाड़ी पहले की अपेक्षा अधिक तेजी से दरक रही है। वर्ष 2013 में आईआईटी, रुड़की द्वारा किए गए सर्वेक्षण से ही यह बात उजागर हो गई थी कि यह पहाड़ी धीरे-धीरे दरक रही है, लेकिन पिछले दस दिनों में हुई बारिश ने इसकी गति तीव्र कर दी है।
केवल मनसा देवी पहाड़ी ही नहीं, बल्कि समूचा हिमालयी क्षेत्र दरक रहा है। इसके बावजूद उत्तराखंड या हिमालय के अन्य क्षेत्रों में जिस प्रकार से अंधाधुंध निर्माण हो रहे हैं, वे चिंताजनक हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस संवेदनशील क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और अधिक विनाश का कारण बनता है। ऐसे में, विकास के लिए होने वाले निर्माण अधिक आपदाओं को न्योता देंगे। अधिकांश लोगों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, अनियोजित शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन ही इसके लिए जिम्मेदार है।
कुछ समय पूर्व उत्तराखंड के रैनी गांव का भूस्खलन सुर्खियों में था। अब जोशीमठ खबरों में है। प्रशासन वहां से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की कवायद कर रहा है और विशेषज्ञ अपनी-अपनी समझ से समस्या के कारणों पर गौर कर रहे हैं।
ग्लोबल वार्मिंग के हद से गुजर जाने के असर के चलते भारत में चरम मौसमी घटनाओं में वृद्धि हर गुजरते साल के साथ नई ऊंचाई छू रही है। फिलहाल भारी बारिश अपना कहर बरपा रही है, जिसके कारण पूरे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अचानक बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं हुई हैं। मनसा देवी में पिछले दस दिनों में छह बार मलबा आने से लगभग 34 घंटे रेलवे ट्रैक बाधित रहा और 118 ट्रेनें प्रभावित हुईं। सब्जी मंडी और विष्णुघाट के नालों से मलबा बहकर आने से वहां की दुकानों में पानी और मिट्टी चली गई, जिससे व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ है। इस बारे में वहां के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने शासन को पत्र भेजा है, क्योंकि इसके आस-पास बारह हजार से अधिक की आबादी बसी है, जो इसके दरकने से खतरे का निशाना बन सकती है।
उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उत्तराखंड पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष 43 लाख पर्यटकों ने चारों धामों की यात्रा की थी। पिछले 30 वर्षों में पर्यटकों की संख्या दस गुना से अधिक हो गई है। उत्तराखंड में पॉलीथीन प्रतिबंधित है। इस पर कानून भी है, लेकिन उसका हिमाचल जैसा सख्ती से पालन नहीं हो पा रहा है।
इसके बारे में भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी के अनुसंधान निदेशक व सहायक एसोसिएट प्रोफसर और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस एवं आईपीसीसी रिपोर्ट के प्रमुख लेखक अंजल प्रकाश के अनुसार, हिमालय के दरकने की समस्या के दो पहलू हैं; पहला है, बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का विकास, जो हिमालय जैसे बहुत ही नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहा है। और दूसरा, जलवायु परिवर्तन, जो इसके प्रभाव को दोगुना से अधिक तेज कर रहा है।
भारत के कुछ पहाड़ी राज्यों में जलवायु परिवर्तन जिस तरह से प्रकट हो रहा है, वह अभूतपूर्व है। इसलिए हमें समझना होगा कि ये बहुत नाजुक क्षेत्र हैं और पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी से गंभीर आपदाएं आएंगी। इसका मतलब है कि एक मजबूत योजना प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। वास्तव में, पूरी योजना जैव-क्षेत्रीय पैमाने पर बनाई जानी चाहिए, जिसमें यह शामिल होना चाहिए कि क्या करना है और क्या नहीं करना है, और इस पर बहुत सख्ती से अमल होना चाहिए। ढांचागत विकास गलत नहीं है, क्योंकि ये पर्यटन की रुचि के स्थान हैं और यहां के लोगों के पास आजीविका के अन्य साधन नहीं हैं। लेकिन यह योजनाबद्ध तरीके से होना चाहिए। पर्यावरणीय और पारिस्थितिक क्षति से जुड़ी लागत की तुलना में जलविद्युत परियोजनाओं में वापसी निवेश लागत बहुत कम है। इसलिए हमें ऊर्जा उत्पादन के अन्य तरीकों की तलाश करनी चाहिए। जोशीमठ इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि हिमालय में क्या नहीं करना चाहिए।