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संरक्षण: विरासत ही हमारी पहचान है... समृद्ध इतिहास और संस्कृति के जीवंत प्रतीक, ये हमारी सतत सभ्यता का प्रमाण

Sat, 27 Jul 2024 06:11 AM IST
ज्योति भास्कर सच्चिदानंद जोशी, अमर उजाला
सच्चिदानंद जोशी, अमर उजाला Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 27 Jul 2024 06:11 AM IST
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सार
विरासत अतीत की कहानी बताने के साथ भविष्य को आकार देती है। यह सामूहिक स्मृति का संग्रह है, जो हमें एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करता है।
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Heritage Conservation need of hour Rich Legacy History Culture and consistent civilisation evidence
असम की धरोहर मोइदम (फाइल) - फोटो : एएनआई

विस्तार

भारत, एक सांस्कृतिक चेतना, महान परंपराओं और समृद्ध विरासत का देश, 42 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों का घर है। इनमें से 34 सांस्कृतिक, सात प्राकृतिक और एक, कंचनजंघा राष्ट्रीय उद्यान, मिश्रित प्रकार का है। यूनेस्को द्वारा विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त विरासत स्थलों की संख्या के मामले में भारत छठे स्थान पर है। ये विरासत स्थल मानव सभ्यता में भारत के योगदान के जीवंत प्रतीक हैं, जो पर्यटन, शिक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।



जैसा कि भारत पहली बार 46वें विश्व विरासत सत्र की मेजबानी कर रहा है, वैश्विक ध्यान विरासत के संरक्षण पर केंद्रित है। यह आयोजन विश्व मंच पर भारत की पहचान और विरासत के संरक्षण और प्रचार के महत्व को रेखांकित करता है। इन प्रयासों को टिकाऊ बनाने के लिए युवा पीढ़ी में विरासत संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी और जागरूकता की भावना पैदा करना अत्यंत आवश्यक है, जो स्कूल से शुरू होकर विश्वविद्यालय शिक्षा तक फैली हो। भारत में विरासत स्थल, भीमबेटका की प्रागैतिहासिक गुफाओं से लेकर ताजमहल तक और अजंता व एलोरा से लेकर सुंदरबन की प्राकृतिक भव्यता तक, भारत के समृद्ध सांस्कृतिक और प्राकृतिक इतिहास को समेटे हुए हैं। ये स्थल हर साल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, जो अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इन विरासत स्थलों से उत्पन्न पर्यटन स्थानीय व्यवसायों का समर्थन करता है, रोजगार पैदा करता है, और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, ये स्थल शैक्षिक संसाधनों के रूप में काम करते हैं, जो भारत के इतिहास, वास्तुकला और प्राकृतिक सौंदर्य के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। वे अतीत से मूर्त संबंध प्रदान करते हैं, जो मानव सभ्यता की यात्रा को समझने में मदद करते हैं।


भारत में कई कम ज्ञात स्थल भी हैं, जिनका अपार ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सौंदर्यात्मक मूल्य है। ये स्थल, हालांकि अभी तक यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं हैं, लेकिन संरक्षण के योग्य हैं। इनमें से एक है कोटुमसर गुफा, जो छत्तीसगढ़ के जगदलपुर के पास स्थित एक चूना पत्थर की गुफा है, जो पारिस्थितिकी पर्यटन के लिए एक प्रमुख आकर्षण है। ओडिशा के खुर्दा जिले में स्थित शिशुपालगढ़, जो कभी राजा खारवेल की राजधानी थी, प्राचीन भारत के शहरी नियोजन और वास्तुकला कौशल को प्रदर्शित करता है। महाराष्ट्र के रायगढ़ में कोंकण तट के पास एक छोटे से द्वीप पर स्थित मुरुद जंजीरा किला भारत के सबसे मजबूत किलों में से एक है, जिसने कई हमलों को विफल कर दिया था। मध्य प्रदेश का एरण कई ऐतिहासिक कलाकृतियों का घर है, जिसमें विशाल वराह प्रतिमा और भगवान विष्णु को समर्पित एक मंदिर शामिल है। झारखंड के दुमका में स्थित मालुटी के टेराकोटा मंदिर अपनी उत्कृष्ट नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, जो विभिन्न पौराणिक दृश्यों और स्थानीय परंपराओं को चित्रित करते हैं।

युवा पीढ़ी को इन स्थलों के महत्व के बारे में शिक्षित करना और संवेदनशील बनाना आवश्यक है। स्कूली स्तर पर शैक्षिक कार्यक्रमों में विरासत स्थलों की यात्राएं, संरक्षण विशेषज्ञों के साथ इंटरैक्टिव सत्र और ऐसी परियोजनाएं शामिल होनी चाहिए, जो छात्रों को विरासत के विभिन्न पहलुओं पर शोध करने के लिए प्रोत्साहित करें। विश्वविद्यालय स्तर पर, विरासत संरक्षण को सभी विषयों में आधार पाठ्यक्रमों में शामिल किया जा सकता है। इतिहास, पुरातत्व, वास्तुकला और पर्यावरण विज्ञान के पाठ्यक्रम विरासत संरक्षण पर विशेष मॉड्यूल प्रदान कर सकते हैं। साथ ही युवाओं को इस क्षेत्र में कॅरिअर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। सरकार को इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने चाहिए और युवाओं को इनकी ओर आकर्षित करना चाहिए।

भारत में 46वीं विश्व धरोहर सत्र पीएम मोदी की धरोहर को संरक्षित करने की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। इन प्रयासों को वास्तव में प्रभावी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि युवा पीढ़ी को धरोहर संरक्षण के महत्व के बारे में शिक्षित और संवेदनशील बनाया जाए। अकादमिक पाठ्यक्रमों में कम प्रसिद्ध स्थलों को शामिल करना और स्थानीय समुदायों को इन स्थलों के संरक्षण में शामिल करना धरोहर संरक्षण के प्रति जागरूकता और समर्थन बढ़ाने में मदद करेगा। हमारी विरासत हमारी पहचान है। यह हमारे अतीत की कहानी कहती है और हमारे भविष्य को आकार देती है। यह हमारी सामूहिक स्मृति का संग्रह है, जो हमें एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करता है। इसे संरक्षित करना केवल सरकार या कुछ विशेषज्ञों का नहीं, हम सभी का दायित्व है। ये स्थान केवल अतीत के अवशेष नहीं, देश के समृद्ध इतिहास और संस्कृति के जीवंत प्रतीक हैं। वे हमारी सतत सभ्यता का प्रमाण हैं।

-लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव हैं।

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