फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Hemant Biswa Sarma: Epidemic and double challenge of NRC

हेमंत बिस्वा सरमा के सामने महामारी और एनआरसी की दोहरी चुनौती

Sat, 22 May 2021 05:17 AM IST
संजय हजारिका संजय हजारिका
संजय हजारिका Published by: संजय हजारिका Updated Sat, 22 May 2021 05:17 AM IST
विज्ञापन
Hemant Biswa Sarma: Epidemic and double challenge of NRC
हिमंता बिस्वा सरमा

कई वर्षों तक हेमंत बिस्वा सरमा प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के लिए असम और उत्तर-पूर्व से संबंधित मुद्दों के लिए जाने-माने व्यक्ति थे। संकट मोचक, दुर्जेय आयोजक, कुशल रणनीतिकार और उल्लेखनीय भीड़ जुटाने वाले सरमा को किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता था, जो असंभव लगने वाले काम को संभव कर सकते थे। वह एक के बाद एक आने वाले मुख्यमंत्री का दाहिना हाथ रहे। लेकिन अब राज्य व देश के लिए खतरनाक समय में वह असम के मुख्यमंत्री बने हैं। मौजूदा संकट पहले के दशकों के विपरीत है, जब उग्रवाद और आतंकवादी हिंसा, जातीय अलगाववाद और पहचान आंदोलन ने शांति भंग कर दी थी और स्थिरता को खतरा पैदा कर दिया था। कोविड-19 की वापसी ने एक अद्वितीय चुनौती पैदा कर दी है। 


loader

एक ऐसे राजनेता, जिसे कभी कांग्रेस ने ठुकरा दिया था, और जो भाजपा में शामिल होने के कुछ ही वर्षों के भीतर न केवल राज्य में, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर में सबसे प्रभावशाली बनकर उभरे, असाधारण से कम नहीं हैं। लंबे समय तक कांग्रेस में रहे सरमा ने असम में अपना एक व्यापक नेटवर्क बनाया, जिसमें समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लोग शामिल हैं। कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने अपने कौशल का विस्तार तो किया ही, सबसे महत्वपूर्ण बात है कि उन्होंने कांग्रेस और उसके लोगों की ताकत व कमजोरियों का आकलन किया। पिछली (सोनोवाल) सरकार में सरमा चार महत्वपूर्ण -वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवर्तन और विकास विभागों के मंत्री थे। त्वरित निर्णय लेने और अपनी टीम का समर्थन करने की उनकी क्षमता को व्यापक रूप से माना जाता है। चूंकि सरमा ने परिणाम लाकर दिखाया है, इसलिए उन्हें प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ-साथ पार्टी नेतृत्व का भी विश्वास हासिल है।  यह किसी ऐसे व्यक्ति के लिए बड़ी उपलब्धि है, जो इतने कम समय से पार्टी में है। लेकिन सोनोवाल और सरमा की जोड़ी को 2018 और फिर 2019-20 में विवादास्पद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर आक्रोश का सामना करना पड़ा।

एनआरसी का उद्देश्य असम में नागरिकता के पेचीदा मुद्दे को हल करना है। इसके बाद सर्वप्रथम नागरिकता संशोधन विधेयक और फिर नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ सार्वजनिक विरोध और आंदोलन हुए, जिसमें बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के छह समूहों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है। देश के अन्य हिस्सों की धारणा के विपरीत असम में लोकप्रिय जनाग्रह ने अप्रवासी विरोधी आख्यान को जटिल बना दिया है कि अन्य देशों (इस मामले में विशेष रूप से बांग्लादेश) से अवैध प्रवासियों का मुद्दा धार्मिक पहचान पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

सरमा ने असम में महामारी की पहली लहर को संशोधित स्वास्थ्य प्रणाली और वर्षों में तैयार बुनियादी ढांचे के साथ कुशलता से संभाला, जिसमें निजी संगठनों की भागीदारी शामिल थी। इससे उन्हें काफी लोकप्रियता मिली। इसने सीएए के तूफान को दूर करने में मदद की और 2021 की जीत में प्रमुख भूमिका निभाई, जैसा कि मैंने पूर्व के लेख में अनुमान व्यक्त किया था कि भाजपा गठबंधन आराम से जीत जाएगा। 

नए मुख्यमंत्री की प्राथमिक चुनौती महामारी से निपटना है। हालांकि सरमा ने कहा है कि एनआरसी की समीक्षा की जाएगी और कुछ नामों की फिर से जांच की जाएगी, पर वह आज पूरे राज्य के मुख्यमंत्री हैं, किसी एक समूह या राजनीतिक समुदाय के नहीं। वह जानते हैं कि अन्य मुद्दे फिलहाल स्थगित किए जा सकते हैं, लेकिन नागरिकता का सवाल खत्म नहीं होने वाला है। सरमा की सरकार अभी एक ऐसे स्वास्थ्य संकट से जूझ रही है, जैसा शायद पहले कभी नहीं था। यह सर्वोच्च प्राथमिकता है और उनकी सरकार राज्य भर में सख्त लॉकडाउन लागू करके इसे बहुत गंभीरता से ले रही है। उन्हें न केवल अपने विशाल प्रशासनिक कौशल का उपयोग करने की आवश्यकता होगी, बल्कि अपने राजनीतिक कौशल का उपयोग कर पूरे राज्य में सुरक्षा और देखभाल प्रदान करने के लिए समर्थन हासिल करना होगा। इससे लड़ने के लिए सबका साथ जरूरी है।

 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed