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गर्मी, योजनाएं और चुनौतियां: अभी देश के 130 से अधिक शहरों में हीट एक्शन प्लान, संरचनात्मक चुनौतियों से संघर्ष
Mon, 18 May 2026 06:52 AM IST
सुरेंद्र कुमार
अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: सुरेंद्र कुमार
Updated Mon, 18 May 2026 06:52 AM IST
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भीषण गर्मी से हाल बेहाल (फाइल)
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अमर उजाला
विस्तार
मौसम विज्ञान विभाग ने राजधानी दिल्ली और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भीषण लू और तापमान के 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की जो चेतावनी जारी की है, वह चिंतित करने वाली है। दरअसल, यह चेतावनी पाकिस्तान और राजस्थान से आने वाली गर्म और शुष्क उत्तर-पश्चिमी हवाओं के कारण जारी की गई है, जिससे पूरे क्षेत्र का तापमान बढ़ रहा है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि न्यूनतम तापमान में वृद्धि जारी रहने की वजह से अब रातें भी गर्म होने लगेंगी, जिससे सूर्यास्त के बाद मिलने वाली राहत कम हो जाएगी।
मौसम विभाग ने बच्चों, बुजुर्गों और सीधी धूप में भारी शारीरिक श्रम करने वालों को सतर्कता बरतने की हिदायत दी है। जाहिर है कि इन स्थितियों के आर्थिक नुकसान भी होंगे। द लैंसेट की एक रिपोर्ट के अनुसार, भीषण गर्मी की वजह से 1990-99 की तुलना में 2024 में 124 फीसदी अधिक श्रम घंटों का नुकसान हुआ। यह अफसोस की बात है कि केंद्र सरकार द्वारा 2016 में निर्मित हीट एक्शन योजना, जिसका उद्देश्य ही लोगों को भीषण गर्मी से बचाना था, प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो सकी है।
योजना के पहले चरण में इसे दिल्ली, चेन्नई, जयपुर, अहमदाबाद, भोपाल सहित कुल बीस शहरों में लागू होना था, लेकिन हैरत की बात है कि अहमदाबाद को छोड़कर कहीं भी इसका कुछ खास असर नहीं दिखता। हालांकि कहने को तो देश में फिलहाल 130 से भी अधिक शहरों में हीट एक्शन योजनाएं लागू हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर संरचनात्मक चुनौतियों से ही घिरी दिखती हैं। राजधानी का हीट वेव एक्शन प्लान हो या फिर राजस्थान में अनौपचारिक श्रमिकों के लिए बनाए गए शीतलन केंद्र, ये सभी खबरों में तो रहते हैं, लेकिन साल-दर-साल बढ़ रही गर्मी की समस्या के पर्याप्त समाधान नहीं बन पाते। समस्या यह है कि हीट एक्शन योजनाएं अब तक विकास और शहरी नियोजन की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन सकी हैं।
शहरों में तेजी से कंक्रीट के जंगल बढ़ रहे हैं, हरित क्षेत्र घट रहे हैं और जलस्रोत भी खत्म ही हो रहे हैं। इससे अर्बन हीट आईलैंड प्रभाव पैदा होता है, जिसमें शहर अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक गर्म हो जाते हैं। जब तक शहरी नियोजन में छायादार सड़कें, जल संरक्षण और छतों को ठंडा रखने के उपायों को शामिल नहीं किया जाता, तब तक केवल चेतावनी जारी कर देने भर से समस्या का समाधान नहीं होगा। सबसे जरूरी यह सुनिश्चित करना है कि इन योजनाओं का सर्वाधिक लाभ दिहाड़ी मजदूरों, रिक्शा चालक, रेहड़ी-पटरी वाले, खेतिहर मजदूर और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले उस वर्ग तक पहुंचे, जो गर्मी की मार सबसे अधिक झेलता है। तभी गर्मी के प्रबंधन की कोई मॉडल योजना बन सकती है।