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फिर वही शाम, वही राग, वही धुंध...

Mon, 10 Aug 2015 08:05 PM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Updated Mon, 10 Aug 2015 08:05 PM IST
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he same evening, the same passion, the same mist ...

लोकसभा ने बुधवार को सरकार को 40,821 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने की मंजूरी दे दी। इसमें से 11,116.76 करोड़ रुपये, जो पेयजल और स्वच्छता कार्यक्रम को दिए गए अतिरिक्त समर्थन से चार गुना और समेकित बाल विकास कार्यक्रम को मिले अतिरिक्त आवंटन से तीन गुना ज्यादा है, प्रसार भारती को हुए नुकसान की भरपाई के लिए खर्च किए जाएंगे। जबकि 12,721 करोड़ रुपये गैर निष्पादित संपत्ति (एनपीए) से जूझते बैंकों को पूंजी उपलब्ध कराने के लिए खर्च किया जाएगा और 800 करोड़ रुपये घाटे में चल रही आकाशवाणी पर खर्च किया जाएगा। 40,821 करोड़ रुपये के इस अतिरिक्त आवंटन का 56 प्रतिशत, जो 24,000 करोड़ रुपये से अधिक है या जो प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के बजट आवंटन से 10,000 करोड़ रुपये ज्यादा है, विभिन्न तरह के बेल आउट पैकेज पर खर्च होगा। सवाल यह है कि नुकसान पर नुकसान को रोकने से संबंधित सुधार के उपायों के बारे में क्या विचार है!

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बदलाव के वायदे पर नरेंद्र मोदी को ऐतिहासिक जनादेश मिला था। जैसा फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट ने 1932 में किया था, मोदी ने भी निराशा के दौर में परिवर्तन का वैसा ही वायदा किया था। रूजवेल्ट ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए न्यू डील की शुरुआत की और सत्ता संभालने के पहले हफ्ते में पंद्रह बड़े कानून पारित किए थे। नतीजतन वह लगातार चुने गए और दूसरे विश्वयुद्ध में अमेरिका को जीत दिलाने के साथ उसे विश्वशक्ति भी बनाया। रूजवेल्ट की सफलता के पीछे उनकी टीम थी, जिसने अमेरिकी जनता से किए वायदों को पूरा किया। जबकि टीम मोदी वक्तृत्व कला को बेहतर प्रशासन के तौर पर, और नारों को समाधान के रूप में तब्दील करने के लिए जूझ रही है। नतीजतन उम्मीदों की जगह नुकसान ही हुआ, फिर वही शाम...।
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मोदी अपनी सरकार की गुणवत्ता और क्षमता को लेकर मजबूर हैं। वह जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए अब भी प्रचार अभियान के मूड में हैं। ऐसा नहीं है कि मोदी ने अपने विचारों या इरादों को जाहिर नहीं किया। पर उन पर अमल के लिए ब्लूप्रिंट का इंतजार है। यहां संघर्ष अनुभवहीन मंत्रियों और जिद्दी बाबू राज से है। स्वच्छ भारत अभियान को ही लीजिए। गंदगी की सफाई, कुपोषण और महामारियों को खत्म करने के लिए यह जरूरी पहल है। पर कचरा निष्पादन के लिए डस्टबिन से लेकर नीति-निर्माण और कचरा प्रबंधन के लिए वित्तीय सहायता तक यह सांस्थानिक मदद की कमी से जूझ रहा है। स्मार्ट सिटी के विचार ने उम्मीदें जगाई थीं। पर लगता है कि इसके लिए आवंटित धन बुरी तरह नियोजित शहरों को सजाने-संवारने पर खर्च किया जाएगा।
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आर्थिक विकास को पुनर्जीवित करने के लिए मेक इन इंडिया बढ़िया विचार है। इसके लिए कम लागत वाली पूंजी, जमीन और आसान व्यावसायिक माहौल की जरूरत है। पर यह पूंजी बैंकों की पस्त बैलेंस शीट के कारण उपलब्ध नहीं है। अब जिस भूमि अधिग्रहण कानून का वायदा किया गया है, वह 2013 जैसा ही है। आसान व्यावसायिक माहौल बनाने के लिए जरूरी है कि मोदी अपने मंत्रियों पर मंजूरी प्रक्रिया को विकेंद्रित करने और पैसे के राज को खत्म करने का दबाव बनाएं। लगता है कि अब जीएसटी का वायदा पूरे होने में भी देर लगेगी।

मोदी मॉडल एवं मोदी सरकार के बीच की दूरी ऊर्जा क्षेत्र में स्पष्ट दिखती है। सरकार मानती है कि रिसाव और बिजली की चोरी से रोज 232 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। उसने चौबीस घंटे बिजली देने का वायदा किया है। चार लाख करोड़ रुपये से अधिक के कर्जदार राज्य विद्युत बोर्ड बिजली का मूल्य चुका नहीं सकते, जिससे कई इलाके अंधेरे में हैं। गुजरात में समानांतर ग्रिड की शुरुआत कर मोदी ने जिस तरह घाटे को कम किया था, वैसे ही देश को समानांतर विद्युत वितरक कंपनी की जरूरत है। भाजपा शासित पांच राज्य थोक में इस घाटे के लिए जिम्मेदार हैं। पर सवाल है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे!

डिजिटल इंडिया भी परिदृश्य बदलने और उद्यमशीलता, रोजगार और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। पर इसके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर को उन्नत बनाने से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़ाने की सख्त जरूरत है। यह कैसे होगा, यह स्पष्ट नहीं है, क्योंकि ब्रॉडबैंड बनाने का खाका धूमिल है और इस निवेश के लिए संसाधनों के आवंटन के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है।

निश्चित रूप से पिछली सरकार एक मुद्दा है, पर कोई सरकार अपनी विरासत को दोष देने में अपना पूरा कार्यकाल खर्च नहीं कर सकती। आर्थिक विकास दर सात फीसदी से अधिक होने के बावजूद बैंकों की गैर निष्पादित संपत्ति बढ़ रही है, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की वृद्धि दर तीन फीसदी है। कम मुद्रास्फीति के बाद भी कॉरपोरेट लाभ पांच प्रतिशत से नीचे है, सीमेंट एवं स्टील उद्योग में क्षमता उपयोग औसत से नीचे है, ब्लू चिप कंपनियां कर्ज की पुनर्संरचना के लिए कतार में हैं, रियल एस्टेट ध्वस्त हो रहा है और निर्यात महीनों से नकारात्मक है।


इस हफ्ते मूडीज ने कहा कि सुधारों में कमी की वजह से मध्यम से लेकर दीर्घकालीन विकास संभावनाओं पर पानी फिर सकता है। जनधन और आधार के माध्यम से नकद हस्तांतरण का प्रशंसनीय उद्देश्य अब गोपनीयता के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में मुकदमेबाजी में फंस गया है। किसी भी सरकार के एजेंडे में मध्यम और दीर्घकालीन उद्देश्य होने चाहिए। इस सरकार ने लंबी अवधि के कई वायदे किए हैं, पर मध्यम अवधि के उन उद्देश्यों पर कम ध्यान है, जो गति देते हैं। मानें या न मानें, पर उदासी का माहौल और सरकारी सुस्ती की चर्चा है। शायद यह घोटालों का धब्बा है, जो सुर्खियों में है, मानसून सत्र का विघटनकारी टकराव है, सरकार चलाने की रोजमर्रा की निरर्थक प्रक्रिया है या शायद यह सब है। इसे धारणा कहकर खारिज किया जा सकता है, पर धारणा में बदलाव की जो ताकत होती है, वही तो सत्ता में ले जाती है।

अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक

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