फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Has yet to sweep away

झाड़ू फेरना अभी बाकी है

Sun, 02 Feb 2014 06:13 PM IST
श्याम विमल
श्याम विमल Updated Sun, 02 Feb 2014 06:13 PM IST
विज्ञापन
Has yet to sweep away

आम आदमी पार्टी मीडिया की बदौलत जन-जन में आज इस कदर पॉपुलर हो चली है कि इस आप में हर कोई खुद को शामिल मानकर खास हुआ लगता है। चुनाव चिह्न झाड़ू का योगदान इसको दूसरी राजनीतिक पार्टियों से अलग पहचान देता है। अब तक आप के चाल, चेहरा और चरित्र से साबित हो रहा है कि इसका टटकापन पुरानी, जर्जर राजनीतिक पार्टियों से उकताई पब्लिक के दिल-ओ-दिमाग में ताजा रक्त संचार की प्रतीति करा रहा है।

विज्ञापन


यह क्रांति हुई है, क्रांति शब्द हिंसात्मक लगे, तो कह सकते हैं कि यह बदलाव का आगाज है। भले यह फिलवक्त दिल्ली प्रदेश की सीमा में बदलाव लगे, लेकिन इसका फैलाव समूचे लोकतंत्र में अवतरित लगता है। मानो गीता में श्रीकृष्ण का कथन संभवामि युगे युगे प्रमाणित होने को है।
विज्ञापन


परिवर्तनशील इस युग में हिंदुस्तान का अवाम इस आप को तभी अपने अनुकूल मानेगा, जब इसे घाघ किसिम के राजकीय दलवीरों के चक्रव्यूह को भेदकर लोकानुरूप रहने देने का अनुमोदन दिल से दिया जाए। दिल्ली के वोटरों ने दिल्ली के इन सप्तर्षियों या मंत्रियों की मंचीय मंत्रणा सुनकर आश्वस्त भाव से इन्हें चने के नहीं, कहें कि गन्ने के झाड़ पर चढ़ा तो दिया, लेकिन राजकीय भाषा से बचकर, देह की भाषा से भी यह जतलाते रहना जरूरी होगा कि इनकी चुटीली बोली के साथ-साथ चेहरों की विद्रूप मुस्कान भी राजनेताओं की-सी हिप्पोक्रेट, उपहासकारी एवं अहंकारी न लगे। वर्ना इनके वायदे हवाई हो जाएंगे और आप धराशायी।
विज्ञापन
विज्ञापन


प्रेस के प्रश्नों की मार एवं कैमरों के यथार्थ चित्रण इतने भी उपेक्षित न किए जाएं कि आप की सादगी से ओढ़ी हुई दिखावट के नीचे-पीछे अवांछित भाव पकड़ में आ जाएं, कि मुखौटे खुल-खुल जाएं, सत्तासीन राजनेताओं के चेहरों से वकीलों वाली तिरछी सिंबल मुस्कान झलक-झलक जाए, कि आप के इर्द-गिर्द मौकापरस्त लोगों की भीड़ लग जाए, बम-पटाखों के धुएं की झड़ी लग जाए और लड्डू-बर्फी से गाल भरकर, फूल-पत्तों की गोलाकार विशाल माला के बीच मुंडीक्षेप कराकर फोटो खिंचवाने की तमन्ना लिए हुए नचैये-भूतगणादि के हो-हो-कारों से आप की सादगी प्रदूषित हो जाए।


ऐसे दृश्य नुक्कड़ नाटक का आभास तो दे सकते हैं, उपयोगी संदेश और शिष्ट शिक्षा नहीं। ऐसे उबाऊ रस्म-रिवाजों पर भी झाड़ू फेरने से आप की परिपक्वता साबित हो, तो क्या कहने!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed