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हरि की पैड़ी : हरिद्वार में जगदीश वत्स की गुमनाम शहादत
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हरिद्वार
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अमर उजाला
विस्तार
हरिद्वार में हरि की पैड़ी पर श्रद्धालुओं और पर्यटन प्रेमियों की भीड़ है। मैं यहां खड़े होकर शहर के इतिहास को मुड़-मुड़कर देख रहा हूं। वर्ष 1808 का साल था, तब एक अंग्रेज पर्यटक फैलिक्स विन्सेंट रेपर आया और उसने यहां बाजारों में ‘हर चौथी दुकान हलवाई की’ देखी। वर्ष 1848 में अंग्रेज इंजीनियर कर्नल प्रॉबी टी काटले के नेतृत्व में गंगा से पहली बार नहर निकालने का विराट अभियान चला, जिसका उद्घाटन आठ अप्रैल, 1854 को भारत के तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड डलहौजी ने किया।
मैं हरि की पैड़ी के ऊपर पसरे आधुनिकतम बाजार से गुजरते हुए इस पैड़ी के प्रथम निर्माण के साथ जुड़ी एक कथा को याद करता हूं, जब सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई अवंतिका नरेश भर्तृहरि गृहस्थी से विरक्त होकर यहां के गंगा तट पर आ बसे थे। उनके निधन के बाद विक्रमादित्य ने ही सबसे पहले यहां भर्तृहरि की स्मृति में घाट और सीढ़ियां बनवाई थीं। मुझे पुराना हरिद्वार देखना है। मैं कनखल की ओर चल पड़ता हूं।
ब्रह्मा-पुत्र प्रजापति दक्ष की राजधानी रहे इस उपनगर में अनेक प्राचीन इमारतें अपनी गौरव-कथा बताने के लिए अब अंतिम सांसें गिन रही हैं। कनखल के झंडा चौक पर पहुंचकर मैं प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य और लेखक आचार्य किशोरी दास वाजपेयी की प्रतिमा को प्रणाम करता हूं, जिसका अनावरण आठ फरवरी, 1992 को साहित्यकार अक्षय कुमार जैन ने किया था। भीड़ है चारों तरफ। पर किसी का ध्यान आचार्य वाजपेयी के इस उपेक्षित स्मारक की ओर नहीं है।
उनकी प्रतिमा के आसपास कारों, मोटर साइकिलों और ऑटो रिक्शा के खड़े होने की जगह बन गई है या फिर यह आवारा पशुओं की शरण स्थली है। मैं लोगों से पूछता हूं कि आचार्य वाजपेयी कहां रहते थे। कोई अता-पता न मिलने पर निकट के खन्ना स्वीट्स के नब्बे वर्षीय पेरूमल खन्ना के पास बैठकर शहर के अतीत पर कुछ चर्चा करता हूं। वह बताते हैं कि आचार्य वाजपेयी होली चौक पर इंजन वाली हवेली में किराये पर रहते थे।
हिंदी के इस ‘पाणिनी’ ने 11 अगस्त, 1981 को यहीं अंतिम सांस ली थी। अब यहां उनके परिवार का कोई नहीं है। कनखल से लौटते हुए मैंने ज्वालापुर का रास्ता पूछ लिया है। मार्ग में एक चौराहे पर शहीद-ए-आजम भगत सिंह की आवक्ष प्रतिमा और उससे थोड़ा आगे लोहामंडी जाकर एक संकरी गली के आखिरी मकान के सामने खड़े होकर मुझे कवि त्रिलोचन शास्त्री के वे कठिन दिन याद आते हैं, जब उन्होंने अपनी पुत्रवधू उषा सिंह के इसी घर में जीवन के अंतिम दिन गुजारे थे।
तब यह शहर हिंदी लेखकों और साहित्य-प्रेमियों का केंद्र बन गया था। उषा सिंह मुझे वह कमरा भी दिखाती हैं, जिसमें त्रिलोचन की यादें बसी हैं। उषा जी के पास से लौटते हुए योगेश योगी से मेरी भेंट हुई, जो स्वामी श्रद्धानंद और आचार्य श्रीराम शर्मा की पत्रकारिता का तुलनात्मक अध्ययन कर रहे हैं। स्वामी दयानंद के प्रिय शिष्य स्वामी श्रद्धानंद ने यहां गुरुकुल की नींव डाली, जो आज गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात है।
इसी विश्वविद्यालय के पुरातत्व संग्रहालय में बीते वर्ष पाकिस्तान के लाहौर उच्च न्यायालय से शहीद भगत सिंह के मुकदमे की कार्यवाही की प्रमाणित प्रति लाकर रखी गई, जो दो हजार पृष्ठों में फारसी लिपि में है। इस शहर में ऋषिकुल जैसी संस्था का निर्माण महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा से हुआ था। कौन जाने कि 19वीं सदी के कवि जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ ने अपनी गंगालहरी की रचना यहां विष्णुघाट स्थित अयोध्या भवन (हाउस) में बैठकर की थी और बाद में प्रभाकर माचवे भी यहां की चेतनदेव कुटिया में रहकर लेखन कार्य करते रहे।
अरुणा आसफ अली की गिरफ्तारी 1942 में हरिद्वार में लड़कों के एक हॉस्टल से हुई थी। अब मैं राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के प्रांगण में आ चुका हूं, जहां के छात्र जगदीश प्रसाद वत्स 14 अगस्त, 1942 को हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर झंडा फहराते हुए पुलिस की गोली से शहीद हुए थे। उनका शव परिवार वालों को नहीं दिया गया। तब वत्स की उम्र 17 वर्ष थी। पुलिस ने उन पर रेलवे बुकिंग ऑफिस से पैसा लूटने का आरोप लगाया था, पर जज ने वह बात स्वीकार नहीं की।
पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1945 में वत्स के परिवार को एक ट्रॉफी भेजी, जिस पर लिखा था, 'दिस ट्रॉफी इस अवार्डेड टू वत्स फैमिली ऑफ खजूरी अकबरपुर इन मेमोरी ऑफ श्री जगदीश प्रसाद वत्स द मार्टियर हू वाज शॉट डेड इन पुलिस स्ट्रगल ऑफ 1942 एट हरिद्वार।' आयुर्वेदिक कॉलेज के प्रांगण में ऋषिकुल स्नातक संघ, हरिद्वार की ओर से 22 दिसंबर, 2004 को स्थापित शहीद वत्स की प्रतिमा की ओर अब कोई नहीं देखता।
इस कॉलेज में प्राचार्य रहे डॉ. विष्णुदत्त अग्रवाल से मैं शहीद वत्स की बलिदान-कथा बांचता हूं। सहारनपुर से वत्स का गांव खजूरी अकबरपुर 10 किलोमीटर दूर है, जहां उनका स्मारक बना है। वहीं 25 जुलाई, 1925 को उनका जन्म हुआ था। उनके पिता कदमसिंह शर्मा पटवारी थे। सहारनपुर जिले में स्वतंत्रता संग्राम सैनिक संघ के अध्यक्ष रहे स्वर्गीय पं. ताराचंद अक्सर शहीद वत्स की चर्चा किया करते थे। बयालीस के आंदोलन की 75वीं सालगिरह पर भी किसी याराने-वतन की जुबान पर जगदीश वत्स का नाम नहीं आया।
dsfadsa