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तीखे सवाल फिर उठेंगे

Wed, 21 Nov 2012 11:28 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Wed, 21 Nov 2012 11:28 PM IST
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hard question rise again

अजमल कसाब को फांसी देकर भारत ने विश्व समुदाय के साथ-साथ राह से भटके युवाओं को भी संदेश देने की कोशिश की है। बेशक 26/11 का मास्टरमाइंड अब भी सीमा के उस पार बैठा है, और कसाब एक मोहरा-भर था। पर केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि अब वह आतंकवाद को लेकर लचीला रुख नहीं अपना सकती। देश में आतंकी वारदात को अंजाम देने वाले को अब कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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फांसी की पूरी प्रक्रिया में बरती गई गोपनीयता और समय को लेकर हालांकि तमाम तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। मसलन, यह कहा जा रहा है कि आगामी चुनावों में राजनीतिक फायदा लेने के लिए कसाब को अभी फांसी दी गई है, पर सवाल उठाने वालों को समझना चाहिए कि आज नहीं तो कल, कसाब को फांसी देनी ही थी।
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तमाम कानूनी प्रक्रियाओं के बाद राष्ट्रपति के पास गई उसकी दया याचिका भी खारिज हो चुकी थी। इसलिए उसे सजा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। वैसे भी हर सरकार के पास फैसलों को तय वक्त पर लागू करने का अधिकार होता है, जिसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। पर यह भारतीय राजनीति की विडंबना है कि इस फांसी पर भी जमकर सियासत हो रही है।
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एक तरफ पूरा देश कसाब की फांसी पर उल्लसित है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा के कद्दावर नेता नरेंद्र मोदी संसद हमले के आरोपी अफजल गुरु का मामला उठा रहे हैं। देखा जाए, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं। कांग्रेस जहां आगामी चुनावों में इस फांसी का सियासी लाभ लेने की जुगत में है, वहीं भाजपा जैसी विपक्षी पार्टी अफजल गुरु का मामला उठाकर उसकी काट खोज रही है।

हालांकि सवाल क्रिकेट कूटनीति पर भी उठ रहे हैं। कहा जा रहा है कि सरकार जब क्रिकेट जैसे प्रयासों से संबंध सुधारने में लगी है, तो फिर कसाब को फांसी देने से क्या रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलेगी। लेकिन हमें कूटनीति और खेल के अंतर को समझना होगा। हम अपने पड़ोसी का चयन नहीं कर सकते। इसलिए हमें उनसे किसी न किसी तरह रिश्ते तो बनाए ही रखने पड़ेंगे।

बहरहाल, हाल के महीनों में जिस तरह केंद्र सरकार पर 'पॉलिसी पैरालिसिस' (नीतिगत रूप से अक्षम होने) के आरोप लगते रहे हैं, कसाब प्रकरण से वह छवि थोड़ी खंडित होती दिख रही है। यह मामला बताता है कि कई फैसलों पर कदम वापस खींचने वाली सरकार अब मजबूती की तरफ बढ़ रही है। हालांकि महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे जनमुद्दों पर चौतरफा विरोधों से घिरी केंद्र सरकार ज्यादा दिनों तक शायद ही सुकून की नींद ले सके।


कसाब की फांसी बेशक संसद के शीतकालीन सत्र में बहस का रुख बदल दे और आतंकवाद तथा सुरक्षा जैसे मुद्दों को सुर्खियों में ला दे, लेकिन यह भी सच है कि केंद्र सरकार को आने वाले दिनों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, भ्रष्टाचार, महंगाई जैसे मुद्दों पर उठते तीखे सवालों को जवाब देना ही होगा। लिहाजा यह प्रकरण सरकार के लिए राजनीतिक लाभ का नहीं, बल्कि एक ठहराव का मुद्दा है, जहां कुछ दिनों तक वह विपक्षी हमले से बच सकेगी। लेकिन उसके बाद तो उसे जवाब देना ही होगा। इसलिए इससे सरकार को भी दीर्घावधि में कोई लाभ नहीं मिलने वाला। उसकी छवि तो आखिर उसके कामकाज से ही बनेगी।

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