{"_id":"67562c1ba3d6e2750c0d0c15","slug":"happy-family-the-one-who-learns-to-bow-down-wins-the-game-be-humble-and-learn-to-tolerate-2024-12-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"खुशहाल परिवार: जिसे झुकना आ गया वह बाजी मार गया... विनम्र बनें और सहना सीखें","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
खुशहाल परिवार: जिसे झुकना आ गया वह बाजी मार गया... विनम्र बनें और सहना सीखें
Mon, 09 Dec 2024 05:00 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
डॉ. विश्वामित्र महाराज
डॉ. विश्वामित्र महाराज
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Mon, 09 Dec 2024 05:00 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
सनातन संस्कृति में संपूर्ण जीवन को चार आश्रमों में बांटा गया है। इनमें गृहस्थ आश्रम का दूसरा स्थान है और उसके कर्तव्य कर्मों को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। विश्व में ज्यादातर संख्या गृहस्थों की है। यदि इनका जीवन साधनामय और भक्तिमय हो जाए, तो यह विश्व शांति का अमोघ साधन बन जाएगा। या यों कहें यदि गृहस्थ अपने सभी कर्तव्यों को ईमानदारीपूर्वक निभाएं, तो उनका जीवन सबसे आदर्श जीवन होगा। शास्त्रों, संतों-महात्माओं, ऋषि-मुनियों और मनीषियों की ज्यादातर शिक्षाएं इसी वर्ग यानी गृहस्थों को केंद्रित कर वर्णित की गई हैं।
वस्तुत: सुखी और शांत जीवन का आधार, तो प्रेम ही है। संतजन कहते हैं-‘फिर कर देखा जगत जो, जहां प्रेम लवलेश। वहां तो सुख रस है कुछ, शेष है कष्ट कलेश।। मित्र बंधु संबंध में, स्नेह सूत है सार। प्रेम बिना नीरस सभी, अपना पर संसार।।’ कहने का मतलब है कि जिस परिवार में प्रेम होता है, सभी सदस्यों में मेलजोल अच्छा होता है और सब अपने-अपने कर्तव्यों को ठीक-ठीक निभाते हैं, वहां शांति और संपन्नता रहती है। एक महिला बहुत बड़े संत की शिष्या थी। वह अपने नवविवाहित पुत्र और बहू को संत जी से आशीर्वाद दिलाने के लिए ले गई। सबने संत को प्रणाम किया और बैठ गए। लड़का उच्छृंखल स्वभाव का था। उसकी साधु-संतों और धर्म-कर्म में आस्था नहीं थी। वह भगवान और धर्म का मखौल उड़ाता था तथा साधु-संतों को समाज पर बोझ समझता था। बेटे के स्वभाव से दुखी मां ने संत जी से प्रार्थना की, ‘गुरुदेव कृपया आशीर्वाद दीजिए, ताकि मेरे बेटे की उद्दंडता दूर हो जाए और सन्मार्ग पर चलने लगे।’ यह आज आपके पास भी बड़ी मुश्किल से आया है, मेरे कहने से नहीं, बल्कि पत्नी के कहने पर आया है। संत ने पूछा-‘बेटा तुम्हारे कितने हाथ हैं?’ लड़के ने कहा, ‘यह भी कोई पूछने वाली बात है, दो हैं।’ ‘और पत्नी के?’ लड़के ने खीझकर जवाब दिया, ‘उसके भी दो।’ संत ने फिर पूछा, ‘दोनों के मिलाकर कितने हुए?’ ‘चार’। संत ने फिर कहा-‘बेटा! पांव कितने हैं।’ लड़का क्रोधित हो गया और अधिक झुंझलाकर कहा, ‘दो मेरे, दो मेरी पत्नी के और दोनों के मिलाकर चार।’ संत ने कहा, ‘शाबाश बेटा! जब पति-पत्नी सदाचारी जीवन व्यतीत करते हैं अर्थात धर्मानुकूल चलते हैं, तो चतुर्भुज हो जाते हैं। और यदि शास्त्र विरुद्ध दुराचारी जीवन-यापन करें, तो बिल्कुल पशुवत चतुर्पाद हो जाते हैं। अर्थात झूठ, भ्रष्टाचार, चोरी, बेईमानी तथा हेरा-फेरी धन तो दे सकते हैं, लेकिन शांति नहीं।’ महाराज ने कहा, ‘बेटा! गलत तरीके से एक अर्थ के मिलने पर अनेक अनर्थ भी साथ हो जाते हैं।’ संत की बात सुनकर युवक के अंदर सनसनी दौड़ गई और हाथ जोड़कर बोला, ‘मैं आपके उपदेश का सदा ध्यान रखूंगा।’ महाराज बोले-‘धन्यवाद बेटा! सुखी दांपत्य जीवन के लिए एक बात और याद रखना, जिंदगी में झुकना सीखना, जिसे झुकना आ गया, वह बाजी मार गया।’
सूत्र: विनम्र बनें और सहना सीखें
आज के युग में पति पत्नी के आगे, तो पत्नी पति के आगे नहीं झुकती, कहते हैं-हम किस बात में कम हैं? बाद में दोनों कचहरी में मिलते हैं। सास-बहू एक-दूसरे का सम्मान नहीं करतीं। बाद में परिवार में कलह होता है। इसलिए यह न सोचें कि झुकना, सहना या विनम्र होना कमजोरी की निशानी है, बल्कि ये तो शूरवीरता और महानता के प्रतीक हैं।