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Happiness Index: कितने प्रसन्न हैं 'खुशहाल' देश? तलाक की दर बहुत अधिक

Bharat Dogra भारत डोगरा
Updated Mon, 12 Sep 2022 05:04 AM IST
सार

नार्डिक देशों में विश्व की आबादी का बहुत कम हिस्सा ही रहता है, जो वैश्विक आबादी के एक फीसदी के आसपास है। ऐसे में बहुत से लोगों में यह जानने की उत्कंठा रही कि आखिर वहां लोग इतने प्रसन्न क्यों हैं।

Happiness Index
Happiness Index - फोटो : पेक्सेल्स
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विस्तार

हाल के वर्षों में जब सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) व आय पर आधारित सूचकांकों को अपर्याप्त ही नहीं, भ्रामक भी माना जाने लगा, तो किसी देश में लोग कितने प्रसन्न हैं, यह पता लगाने पर अधिक जोर दिया गया। इसलिए हैप्पीनेस इंडेक्स या खुशहाली के सूचकांक तैयार किए गए। खुशहाली या प्रसन्नता के जितने भी सूचकांक तैयार किए गए हैं, उनमें पाया गया है कि नार्डिक देश प्रायः इन सभी सूचकांकों में शीर्ष पर रहते हैं। नार्डिक देशों में मुख्यतः यूरोप के पांच देश गिने जाते हैं, हालांकि कभी आसपास के कुछ छोटे टापुओं को अलग से भी गिना जाता है। ये पांच देश हैं-स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड, आइसलैंड व डेनमार्क। प्रायः इन्हीं में से कोई न कोई देश हैप्पीनेस इंडेक्स के शीर्ष पर पाया जाता है। 



लेकिन नार्डिक देशों में विश्व की आबादी का बहुत कम हिस्सा ही रहता है, जो वैश्विक आबादी के एक फीसदी के आसपास है। ऐसे में बहुत से लोगों में यह जानने की उत्कंठा रही कि आखिर वहां लोग इतने प्रसन्न क्यों हैं। दूसरी ओर इन नार्डिक देशों के कुछ विद्वानों ने भी कहना शुरू कर दिया कि दुनिया हमें जितना खुश बता रही है, उतने खुश तो हम हैं ही नहीं। इस कशमकश के बीच एक मुद्दा यह उठा कि प्रायः नार्डिक देशों में तलाक की दर बहुत अधिक है। विभिन्न नार्डिक देशों के हाल के वर्षों के आंकड़ों को देखें, तो तलाक की दर वहां 35 से 60 प्रतिशत के बीच पाई गई है। दूसरे शब्दों में, हर दूसरे या तीसरे विवाह का अंत यहां तलाक में होता है व कहीं-कहीं तो यह दर इससे भी अधिक है। इस बारे में कुछ समाजशास्त्रियों का कहना है कि इसका लोगों के जीवन की खुशी या प्रसन्नता पर कोई विशेष प्रतिकूल असर नहीं पड़ता है। उनका नजरिया यह है कि यह तो लोगों की आजादी का मुद्दा है कि वे किसी रिश्ते में तब तक ही रहें, जब तक वे उसमें खुश हैं।


दूसरी ओर यूरोप के संदर्भ में ही किए गए अनेक अध्ययन बताते हैं कि सतही तौर पर चाहे कुछ भी कहा जाए, पर हकीकत यह है कि प्रायः तलाक के सभी मामले तनावों व झगड़ों से जुड़े होते हैं। उदाहरण के लिए, रिचर्ड डाऊथवेट ने अपनी चर्चित पुस्तक द ग्रोथ इल्यूजन में बताया है कि तलाक व अलगाव के अधिकांश मामलों में काफी तनाव होता है, जिसका असर वर्षों तक बना रहता है। विशेषकर बच्चों पर इसका बहुत प्रतिकूल असर पड़ता है। जो बच्चे टूटे हुए परिवारों से आते हैं, उनके जीवन में अनेक प्रतिकूल स्थितियों की आशंका बढ़़ जाती है। ब्रिटेन में स्वास्थ्य व विकास के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि जिन घरों में माता-पिता के रिश्ते टूट जाते हैं, वहां बच्चों के विकास व मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ता है।

नार्डिक क्षेत्रों में भी अनेक अध्ययनों ने यह बताया है कि किशोरों व युवाओं में मानसिक तनाव व डिप्रेशन (अवसाद) की समस्या अधिक पाई गई है। वैसे यह समस्या अधिकांश पश्चिमी देशों में हाल के समय में बढ़ी है एवं अमेरिका में तो इस समय चरम पर है। वर्ष 2021 में अमेरिका के बाल व किशोर स्वास्थ्य से जुड़े कुछ प्रमुख संगठनों ने तो बाल व किशोर स्वास्थ्य के लिए आपातकाल की घोषणा कर दी। नार्डिक देशों में बाल, किशोर व युवा मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति अमेरिका जैसी विकट तो नहीं है, फिर भी काफी अधिक है। अनेक अध्ययनों में इस आयु वर्ग में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से त्रस्त किशोरों व युवाओं की संख्या 10 से 25 प्रतिशत तक पाई गई है। विशेषकर नॉर्वे में इसमें हाल में काफी वृद्धि भी हुई है।

ऐसे में जहां प्रसन्नता के सूचकांक को अधिक समग्र बनाने की जरूरत महसूस की गई है, वहीं नार्डिक देशों में प्रसन्नता की अतिशयोक्तिपूर्ण समझ को भी कुछ अधिक संतुलित बनाने की जरूरत महसूस की गई है। सच कहा जाए, तो प्रसन्नता के सूचकांक अभी बहुत समग्र नहीं बन सके हैं व इनमें जो कमियां रह गई हैं, उनके संकेत नार्डिक देशों से भी मिल रहे हैं।

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