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बुनियादी आय से खुशहाली

Mon, 01 Aug 2016 06:29 PM IST
वरुण गांधी
वरुण गांधी Updated Mon, 01 Aug 2016 06:29 PM IST
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Happiness from Basic income
वरुण गांधी

वर्ष 1974 में कनाडा सरकार ने विनिपेग, डॉफिन एवं ग्रामीण मनीटोबा में अचानक एक नियंत्रित परीक्षण का आयोजन किया, जिसमें इस पूरे इलाके के निम्न आय वाले परिवारों को नियंत्रण के साथ सात निदान समूहों में बांटा गया। कामकाजी आय से लाचार परिवारों को उनके परिवार के आकार के आधार पर आय की गारंटी दी गई। इस परीक्षण में से उन परिवारों को अलग रखा गया, जिनकी आय 1975 में 13 हजार डॉलर की पूर्वनिर्धारित राशि से ज्यादा थी। निदान समूहों से प्रत्येक को 3,386 डॉलर की आधार राशि दी गई, जो अब 16,094 डॉलर के बराबर है, जबकि अन्य स्रोतों से अर्जित प्रति डॉलर आय पर 50 सेंट की कटौती की गई। इस नकारात्मक आयकर के प्रयोग, जिसे 'मिनकम' कहा गया, ने डॉफिन के गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को जीवन यापन के लायक आय अर्जित करने में मदद की। इसने वित्तीय पूर्वानुमान की पेशकश की-खाद्य असुरक्षा खत्म हो गई, बिलों का भुगतान किया गया और शिक्षा से कोई समझौता नहीं किया गया।

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हर व्यक्ति को जीवन यापन के लिए न्यूनतम आय की गारंटी मिलनी चाहिए-यह विचार कोई नया नहीं है। थॉमस पेन (अमेरिकी क्रांतिकारी दार्शनिक) ने हर किसी के लिए एकसमान विरासत की मांग की थी। वह चाहते थे कि 'एक राष्ट्रीय कोष' हो, जो हर वयस्क को अचल संपत्ति प्रणाली की शुरुआत के लिए मुआवजे के तौर पर पंद्रह पाउंड स्टर्लिंग राशि का भुगतान करे। बर्ट्रेंड रसेल ने 'सोशल क्रेडिट' आंदोलन चलाया, जिसे ब्रिटिश लेबर पार्टी ने प्रसिद्ध 'सामाजिक लाभांश' के रूप में तब्दील कर दिया। अब हालांकि बिना किसी शर्त के वार्षिक आय का विचार गति पकड़ रहा है। सिलिकॉन वैली के वाई काम्बिनेटर (प्रभावी संरक्षक) एक नए व्यापार मॉडल का परीक्षण कर रहे हैं, जिसके तहत एक अनाम अमेरिकी समुदाय में बिना किसी जुड़ाव के लोगों को पैसा दिया जाता है।
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यह सर्वाधिक जरूरतमंद लोगों की मदद करने में विफल रहने वाली कल्याणकारी नीतियों के सुरक्षा तंत्र का स्थान लेने की कोशिश है। भले ही स्विट्जरलैंड ने अपने नागरिकों को प्रति महीने करीब 2,500 डॉलर देने के जनमत संग्रह को खारिज कर दिया, लेकिन कनाडाई प्रांत ओन्टारियो परीक्षण के तौर पर ऐसा करने पर विचार कर रहा है। प्रगतिशील लोग इसे अत्यधिक काम करने वाले लोगों के लिए दमनकारी नौकरियों और स्थितियों से बाहर निकलने के विकल्प के तौर पर देख रहे हैं, ताकि उन्हें सामाजिकता बढ़ाने, शिक्षा जारी रखने और अपनी कलात्मक रुचियों के लिए अधिक समय मिल सके। विभिन्न उद्योगों में ऑटोमेशन बढ़ने से रोजगार की चिंता के मद्देनजर बुनियादी आय रामबाण साबित होगा।
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यहां तक कि भारत में भी बुनियादी आय के प्रयोग देखे गए हैं। एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत मध्य प्रदेश के आठ गांवों में छह हजार से ज्यादा लोगों को मासिक भुगतान किया गया। शुरू में बच्चों को सौ रुपये और वयस्कों को दो सौ रुपये का भुगतान किया गया, जिसे बाद में बढ़ाकर क्रमशः डेढ़ सौ और तीन सौ रुपये किया गया। शुरू में यह पैसा उन्हें नकद दिया गया, लेकिन तीन महीने बाद इसे उनके बैंक खाते में हस्तांतरित किया जाने लगा। खाद्य सब्सिडी के नकद भुगतान में धांधली रोकने के लिए यह हस्तांतरण बिना शर्त किया गया। इसका नतीजा बहुत दिलचस्प रहा। अधिकांश ग्रामीणों ने उस पैसे का उपयोग घरेलू सुविधा बढ़ाने (शौचालय, दीवाल, छत) में किया, ताकि मलेरिया के खिलाफ सावधानी बरती जाए। 24.3 फीसदी लोगों ने खाना पकाने और रोशनी के लिए अपने ऊर्जा के प्रमुख स्रोतों को बदला, जबकि 16 फीसदी लोगों ने अपने शौचालय को बदला। खासकर अनुसूचित जाति और जनजाति के परिवारों में यह देखा गया कि बेहतर वित्तीय स्थिति में वे राशन की दुकानों के बजाय बाजार जाने लगे, अपने पोषण में सुधार किया और स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति और प्रदर्शन बेहतर हुआ। छोटे स्तर के निवेश (बेहतर बीज, बुआई मशीन, उपकरणों की मरम्मत आदि) में भी वृद्धि हुई। आकस्मिक मजदूरी के साथ-साथ बंधुआ मजदूरी घटी, जबकि स्वरोजगार खेती और व्यावसायिक गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई। वित्तीय समावेशन में तेजी आई-पायलट प्रोजेक्ट के चार महीनों के भीतर 95.6 फीसदी लोगों के पास बैंक खाते थे। साल भर के भीतर 73 फीसदी परिवारों के कर्ज में कमी दर्ज की गई। शराब पर खर्च बढ़ने का कोई सबूत नहीं मिला।

भारतीय संदर्भ में बुनियादी आय की अवधारणा की स्वीकार्यता साबित करने के लिए हमें और आंकड़ों की जरूरत होगी। लोगों पर सार्वभौमिक बुनियादी आय के प्रभावों की जांच के लिए बड़े पैमाने पर मात्र आठ पायलट प्रोजेक्ट हैं। इसमें सामाजिक संदर्भ भी मायने रखते हैं- जो नीतियां मनीटोबा या केन्या में कामयाब हंै, जरूरी नहीं कि वे भारत में भी लागू हों। हमें पायलट प्रोजेक्ट के गंभीर अध्ययन की जरूरत होगी, जिसमें सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करने, दीर्घकालीन अर्थों (कम के कम एक दशक) और जीने के न्यूनतम खर्च पर जोर देना होगा। ऑकलैंड, नीदरलैंड, जर्मनी और यहां तक भारत में भी ज्यादा से ज्यादा पायलट प्रोजेक्टों से विकसित अंतर्दृष्टि को कल्याणकारी नीतियों को संशोधित करने में उपयोग किया जाना चाहिए।


नियमित रूप से बुनियादी आय को पायलट प्रोजेक्ट के जरिये बढ़ाना और धीरे-धीरे सावधानी पूर्वक इसे अमल में लाना भारत में आदर्श लगता है। यह हमारे गांवों में स्वच्छता समेत लोगों के रहन-सहन के स्तर को सुधारने में मदद कर सकता है, उन्हें पेयजल की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध करा सकता है और बच्चों के पोषण में सुधार ला सकता है। नियमित बुनियादी आय का भुगतान संस्थानों को बीमारी और भूख से विवेकपूर्ण ढंग से निपटने में मदद कर सकता है, कर्ज के दुष्चक्र का सामना करने के बजाय परिवार इससे स्वास्थ्य खर्च जुटा पाने में सक्षम होंगे। यह बाल श्रम को कम करने में मददगार हो सकता है, जबकि स्कूली खर्च में वृद्धि को सुगम बना सकता है। उत्पादक कार्यों में वृद्धि करके यह गांवों की तस्वीर बदल सकता है और उन्हें आय के सतत विकास की तरफ बढ़ा सकता है। यह विषमता में कमी ला सकता है, अर्थव्यवस्था का विकास कर सकता है और सबको खुशहाल बना सकता है।

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