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शतरंज की बिसात पर दो बंदरगाह, अरब सागर में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा

Tue, 16 Jun 2026 06:53 AM IST
Ravindra Dubey रवीन्द्र दुबे
Updated Tue, 16 Jun 2026 06:53 AM IST
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सार
दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात पर पाकिस्तान में ग्वादर और ईरान में चाबहार बंदरगाह दो बड़े मोहरों की तरह खड़े हैं। दोनों ही अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए प्रवेश द्वार बनने की होड़ में हैं, पर पाकिस्तान के साथ चीन के गठजोड़ ने कई मोर्चों पर भारत पर रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली है।
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ग्वादर और चाबहार बंदरगाह की जंग - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात पर दो बंदरगाह दो बड़े मोहरों की तरह खड़े हैं-पाकिस्तान में ग्वादर और ईरान में चाबहार। अरब सागर के दक्षिण-पूर्वी किनारे पर महज 80 से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इन दोनों बंदरगाहों के क्षेत्रीय प्रभाव में जमीन-आसमान का फर्क है। पाकिस्तान के साथ 40 साल की लीज के जरिये चीन द्वारा संचालित ग्वादर बीजिंग की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और सैन्य विस्तार की रीढ़ बन चुका है। ईरान के साथ मिलकर भारत द्वारा विकसित चाबहार नई दिल्ली की मध्य एशिया तक पहुंच बनाने और चीनी प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश है। विडंबना है कि पाकिस्तान के साथ चीन के इस गठजोड़ ने कई मोर्चों पर भारत पर रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली है।


ग्वादर बंदरगाह होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जहां से विश्व के सबसे महत्वपूर्ण और व्यस्त तेल परिवहन मार्ग गुजरते हैं। चीन ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के हिस्से के रूप में ग्वादर में 60 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के सामने अपनी चुनौतियां हैं। मध्य एशिया और अफगानिस्तान के लिए रणनीतिक स्थिति के बावजूद उसे गहरी ड्रेजिंग, यानी पानी के नीचे से मिट्टी और चट्टानें हटाने की जरूरत है। बंदरगाह विकास के लिए भारत का निवेश 50 करोड़ डॉलर है, जो चीन के निवेश के मुकाबले कुछ भी नहीं है।


पैमाने का यह फर्क वित्तीय से अधिक रणनीतिक है। चीन का 60 अरब डॉलर का निवेश ग्वादर को सड़कों, रेलवे, ऊर्जा पाइपलाइनों और विशेष आर्थिक क्षेत्रों के साथ एक व्यापक गलियारे में पिरोता है। भारत के चाबहार के पास ऐसा कोई एकीकृत बुनियादी ढांचा नहीं है। ग्वादर से चीन को सबसे बड़ा रणनीतिक फायदा ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर मिलता है। मध्य एशिया से चीन का करीब 80 प्रतिशत तेल आयात मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यह मलयेशिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया के बीच का ऐसा संकरा रास्ता है, जिसे अमेरिका युद्ध की स्थिति में कभी भी बंद कर सकता है। चीनी रणनीतिकार इसे ‘मलक्का की मुश्किल’ कहते हैं। ग्वादर इस मुश्किल का सीधा हल है।

चीन ग्वादर से अपने भीतरी इलाकों तक 3,021 किलोमीटर लंबा जमीनी पाइपलाइन मार्ग बनाने की योजना पर काम कर रहा है। अगर वह इसमें सफल हो जाता है, तो यह रास्ता शिपिंग दूरी को 75 प्रतिशत तक घटा देगा। अनुमान है कि 2030 तक ग्वादर चीन के तेल आयात का 30 से 40 प्रतिशत संभाल सकता है, जिससे समुद्री शिपिंग पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी। चूंकि, दुनिया का 20 प्रतिशत तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, ग्वादर होर्मुज के करीब होने की वजह से चीन को अहम रणनीतिक लाभ देता है। अगर होर्मुज बंद हो जाए, तो ग्वादर वैकल्पिक जमीनी रास्ता मुहैया कराता है। पाकिस्तान-ईरान के बीच आठ अरब डॉलर की पाइपलाइन इस गलियारे से लाखों बैरल तेल बहा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की तरह भारत को ऐसा कोई रणनीतिक फायदा नहीं मिलता। हालांकि, चाबहार उसी तेल-समृद्ध क्षेत्र के पास है, लेकिन भारत के पास कोई जमीनी पाइपलाइन नहीं है। भारत का 80 प्रतिशत से अधिक तेल आयात समुद्री शिपिंग पर निर्भर है। चाबहार व्यावसायिक शिपिंग के लिए काफी मुफीद है, पर भारत को ऊर्जा सुरक्षा की वह स्वायत्तता नहीं देता, जो चीन को ग्वादर से मिलती है।

चीन की नौसैनिक महत्वाकांक्षाएं स्थानीय सुरक्षा से बढ़कर वैश्विक दायरे तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन उनके सामने भौगोलिक चुनौतियां हैं। चीन के प्राथमिक नौसैनिक बेड़े हिंद महासागर से बहुत दूर दक्षिण-पूर्वी चीन सागर में तैनात हैं। ग्वादर बीजिंग को नौसैनिक बेड़े की तैनाती किए बिना अरब सागर तक पहुंच देता है। यह बंदरगाह उस ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नेटवर्क का हिस्सा है, जो चीनी मुख्यभूमि से अफ्रीका के तटों तक फैली व्यावसायिक व सैन्य सुविधाओं की माला है। यह हिंद महासागर में चीन की उपस्थिति बढ़ाता है और भारत के साथ सीधी टक्कर से बचते हुए घेरेबंदी का काम करता है। भारत की नौसैनिक प्रतिक्रिया चाबहार के जरिये सीमित है। चाबहार मुख्यतः व्यावसायिक बंदरगाह है। चीन के नौसैनिक अभ्यासों, रडार तैनाती और सुरक्षा सहयोग की बराबरी भारत वहां नहीं कर पाया है।

ग्वादर और चाबहार, दोनों ही अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए प्रवेश द्वार बनने की होड़ में हैं, पर चीन ने पैमाने और एकीकरण के दम पर बाजी मार ली है। चाबहार का असल मकसद यह था कि भारत और अफगानिस्तान को पाकिस्तान को बायपास करते हुए सीधा निर्यात मार्ग मिलेगा। भारत ने इस उम्मीद में 50 करोड़ डॉलर लगाए। लेकिन, ग्वादर में चीन की रणनीति कहीं ज्यादा कामयाब रही। चीन ने ग्वादर को पाकिस्तान के औद्योगिक केंद्रों और उससे आगे तक जोड़ने के लिए व्यापक बुनियादी ढांचा खड़ा किया। नतीजतन, अफगानिस्तान बेहतर बुनियादी ढांचे और कम खर्च की वजह से कराची बंदरगाह का ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है।

भारत का नुकसान दोहरा है-अफगानिस्तान की शिपिंग भारत के चाबहार मार्ग के बजाय पाकिस्तान से बढ़ रही है और मध्य एशिया में चीन का बुनियादी ढांचा प्रभाव बीजिंग को वहां के देशों का प्राथमिक आर्थिक भागीदार बनाता जा रहा है। भारत का राजनीतिक निवेश कोई विशेष आर्थिक लाभ नहीं दे पाया। ग्वादर और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के जरिये दोनों देशों (चीन व पाकिस्तान) का गठजोड़ भारत के चाबहार प्रयास पर रणनीतिक बढ़त पा चुका है। चीन मलक्का जलडमरूमध्य पर निर्भरता समाप्त कर रहा है, अरब सागर में नौसैनिक पहुंच बना रहा है और मध्य एशिया के आर्थिक गलियारों पर दबदबा जमा रहा है।

यह रणनीतिक असंतुलन संरचनात्मक है। वैसे भी चीन का निवेश भारत से कई गुना अधिक है। चीन का बुनियादी ढांचा एक व्यापक गलियारे को समेटता है, जबकि भारत का नहीं। चीन रणनीतिक स्वायत्तता हासिल कर रहा है, जबकि भारत व्यावहारिक स्तर पर उलझा है। क्षेत्रीय शक्ति का झुकाव बीजिंग की तरफ बढ़ रहा है। ग्वादर दक्षिण एशिया का प्रमुख बंदरगाह बनता जा रहा है। भारत की चाबहार नीति रणनीतिक दृष्टि से सही है, पर उसका अमल पर्याप्त नहीं है। ग्वादर-पाकिस्तान गठजोड़ ने चीन को वह रणनीतिक बढ़त दी है, जिसकी बराबरी भारत अभी नहीं कर पा रहा। यही गठजोड़ दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य को आने वाले दशकों तक आकार देता रहेगा। भारत इससे निपटने के लिए क्या रणनीति बनाता है और इसका प्रतिकार कैसे करता है, यह देखना अभी शेष है।
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