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गुरु नानकदेव जी का आशीर्वाद
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 01 Mar 2013 10:22 PM IST
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हमारे धर्मग्रंथों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जो हमें सेवा-सहायता में अपना जीवन बिताने की प्रेरणा देते हैं। जब कोई व्यक्ति रोगियों की सेवा-सहायता करता है, तो वह स्वतः प्रभु से साक्षात दर्शन का अधिकारी बन जाता है।
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एक बार गुरु नानकदेव जी महाराज ने ज्येष्ठ पुत्र श्रीचंद से पूछा, तुम्हें किस वस्तु की इच्छा है? श्रीचंद ने कहा, पिताजी, मुझे कोई भी सांसारिक वस्तु नहीं चाहिए। मुझे आशीर्वाद दें कि मैं ईश्वर भक्ति में अपना जीवन अर्पित कर दूं। गुरुजी ने कहा, ईश्वर तुम्हारी इच्छा पूरी करेंगे।
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दूसरे पुत्र लक्ष्मीचंद से भी उन्होंने इच्छा पूछा, तो उन्होंने जीवन व्यतीत करने लायक धन-संपत्ति की इच्छा जताई। गुरुजी ने उसे भी आशीर्वाद दिया।
गुरुजी ने अपने अनन्य भक्त लाहिणी से पूछा, तुम क्या चाहते हो? लाहिणी ने कहा, गुरुजी, मुझे न तो ईश्वर दर्शन की इच्छा है, न सांसारिक धन-संपत्ति की। मैं चाहता हूं कि अपना जीवन आपके सेवकों की सेवा में बिता दूं। इसी में मैं अपना जीवन सार्थक मानूंगा।
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गुरु नानक जी महाराज लाहिणी के ये शब्द सुनकर गद्गद हो उठे। उन्होंने कहा, बेटा, भगवान उसी से प्रसन्न होते हैं, जो सेवा को सर्वोपरि महत्व देता है। इस तत्व को समझने के कारण तू गुरु गद्दी का सच्चा अधिकारी है। और यही भाई लाहिणी आगे चलकर सिखों के द्वितीय गुरु अंगददेव के नाम से विख्यात हुए।