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एक रहस्य का जिंदा हो जाना

Sun, 03 Feb 2013 12:04 AM IST
शीतला सिंह
शीतला सिंह Updated Sun, 03 Feb 2013 12:04 AM IST
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gumnami baba was netaji subhash chandra bose

सुभाषचंद्र बोस के जीवन का विवाद आज भी हल नहीं हो पा रहा। भले ही 18 अगस्त, 1945 को ताईपेइ में हुई विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु बताई जाती रही हो, लेकिन इसकी पुष्टि संदिग्ध है। फैजाबाद के सिविल लाइन के रामभवन बंगले में किराये पर रहने वाले तथाकथित गुमनामी बाबा को अनेक लोग नेताजी मानते थे।

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लेकिन मृत्यु के तीन दिन बाद तक प्रतीक्षा करने के बाद भी जब कोलकाता से कोई अंतिम क्रिया में शामिल होने नहीं आया, तब अंत में पहचान छिपाने के लिए उनका चेहरा कुचल कर गुप्तारघाट की एक सुनसान जगह पर अंतिम क्रिया कर दी गई थी।
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गुमनामी बाबा की मृत्यु के बाद यह प्रश्न उठा था कि क्या वह वास्तव में सुभाषचंद्र बोस ही थे, क्योंकि उनके पास से जो सामग्री उपलब्ध हुई है, वह नेताजी से ही संबद्ध है। किंतु उसकी पुष्टि किन्हीं साक्ष्यों से कराने की आवश्यकता नहीं समझी गई। बाद में सरकार ने मुखर्जी आयोग भी बनाया, जिसने गुमनामी बाबा को नेताजी तो नहीं माना, लेकिन उसका भी निष्कर्ष यही था कि नेताजी की मौत विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी।
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वर्ष 1985 में कुछ पत्रकारों और पुलिस अधिकारियों के साथ मैं कोलकाता उन लोगों से मिलने गया था, जो प्रतिवर्ष 23 जनवरी को फैजाबाद आते थे। उनमें पवित्र मोहन राय सर्वप्रमुख थे। लेकिन गुमनामी बाबा की मृत्यु के बाद उन्हें वह नेताजी बताने को तैयार नहीं थे!

जब उनसे पूछा गया कि सूचना के बाद भी वह नेताजी के अंतिम संस्कार में फैजाबाद क्यों नहीं पहुंचे, तो इसका भी कोई संगत उत्तर उनके पास नहीं था। उनसे अंतिम सवाल यह पूछा गया कि आप केवल इतना बता दें कि वह नेताजी थे या नहीं, तो उन्होंने केवल इतना ही कहा कि अगर ऐसा होता, तो क्या मृत्यु की सूचना के बाद हम खुद को वहां जाने से रोक पाते?

गुमनामी बाबा के फैजाबाद निवास के समय बस्ती जिले की सरस्वती देवी नाम की एक महिला उनके साथ रहती थी। वही उनका भोजन बनाने के अलावा सारी व्यवस्था करती थी। गुमनामी बाबा के जिन लोगों सेे संबंध थे, उनमें से डॉ. ताराचंद्र बनर्जी और उनकी पत्नी का देहांत हो चुका है।

रामकिशोर पंडा जी भी जीवित नहीं है, जिनके मकान में बाबा 1974 में एक वर्ष तक रहे। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. बी.राय अवकाश प्राप्त कर लखनऊ में बसे हैं, लेकिन वह इस विवाद में नहीं पड़ना चाहते। नेताजी के साथियों में कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने गुमनामी बाबा को नेताजी मानने से इनकार कर दिया था। कैप्टन भानमती आर्य भी उन्हें नेताजी नहीं मानतीं।

गुमनामी बाबा प्रकरण की जांच तो अवश्य होनी चाहिए, लेकिन आस्थाओं व विश्वासों से नहीं, बल्कि तथ्यों से ही सही निष्कर्ष निकल पाएगा। संदेह इसलिए भी होता है कि गुमनामी बाबा के मरने के बाद अगर असलियत प्रकट हो जाती, तो भी देश या उनके साथियों को कोई खतरा नहीं हो सकता था।


इसके बावजूद उनके मरने के बाद न तो मृत शरीर का फोटो खींचने की अनुमति दी गई और न सरकारी तौर पर उस व्यक्ति की पहचान का कोई प्रयास हुआ। अंतिम क्रिया के पूर्व मुंह विकृत करने के पीछे का उद्देश्य तो यही था कि उनकी असलियत का पता न चल पाए। उनका लक्ष्य और उद्देश्य क्या था। नेताजी जैसा साहसी व्यक्ति आजादी के 38 वर्षों बाद तक गुमनाम कोठरी में रहेगा, ऐसा सहज विश्वास नहीं होता। फिर भी यह सवाल तो बना ही हुआ है कि गुमनामी बाबा को आखिर किस रूप में देखा जाए। उनका उद्देश्य क्या था, और उनके गुमनामी में रहने की वजह भी क्या थी।

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