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जीएम फसलों के जमीनी परीक्षण से नुकसान ही होगा
अश्विनी महाजन
Updated Mon, 18 Aug 2014 06:46 PM IST
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केंद्र सरकार के पर्यावरण एवं वन विभाग के अंतर्गत जीईएसी (जेनेटिक इंजीनियरिंग एपरेजल कमेटी) द्वारा चावल, गन्ना, चना, बीटी बैंगन सहित 15 फसलों के खुले जमीनी परीक्षण के लिए 18 जुलाई को अनुमति देने और स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय किसान संघ द्वारा विरोध के बाद उसे ठंडे बस्ते में डालने के सरकारी निर्णय के बाद इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है।
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जीएम (जेनेटिकली मोडिफाइड) फसलों का विरोध कर रहे संगठनों, संस्थाओं और व्यक्तियों का कहना है कि अगस्त, 2013 में कृषि पर संसद की स्थायी समिति ने कहा था कि जीएम फसलों के सभी जमीनी परीक्षणों को तब तक रोकना चाहिए, जब तक मानव, धरती और जैव विविधता पर इनके प्रभाव का पता नहीं लग जाता। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित तकनीकी विशेषज्ञ समिति ने भी, जिसमें संबंधित क्षेत्रों के बड़े वैज्ञानिक शामिल थे, सिफारिश की थी कि जब तक नियामक व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो जाती, तब तक जीएम फसलों का खुले में परीक्षण नहीं होना चाहिए। भाजपा नेताओं ने जीएम फसलों के परीक्षण के विरोध में वक्तव्य ही नहीं दिए, अपने चुनावी घोषणापत्र में भी कहा कि मानव एवं मिट्टी पर जीएम फसलों के प्रभावों का पूरा वैज्ञानिक मूल्यांकन न होने तक इसके जमीनी परीक्षण की अनुमति नहीं दी जाएगी।
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देश के एक बड़े वर्ग का मानना है कि जीएम फसल का परीक्षण देश की खाद्य सुरक्षा, मानवता और पर्यावरण को खतरे में डालने वाला है। जीएम फसल में कोई बाहर का जीन साथ आता है, जिसे फसल से बाहर नहीं निकाला जा सकता। ऐसे में अगर भविष्य में पता लगे कि मानव के लिए वह जीन हानिकारक है, तो समाधान क्या होगा? जीएम फसल से उत्पादन बढ़ने का भी कोई मजबूत वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है।
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हां, इसके जरिये फसल के स्वरूप को बदला जा सकता है। मसलन, टमाटर के छिलके को मोटा किया जा सकता है, पर उसका उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता। जिस बीटी कपास की सफलता का बार-बार हवाला दिया जा रहा है, उसकी सच्चाई यह है कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान इसकी प्रति हेक्टेयर उत्पादकता सालाना 3.5 प्रतिशत ही बढ़ी। इसके बावजूद कपास के उत्पादन और निर्यात में वृद्धि इसलिए हुई, क्योंकि कपास की खेती का रकबा बढ़ा है। नतीजतन खाद्य सुरक्षा बाधित हुई है और आयातित दालों और तेलों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।
आज किसान पशुओं के लिए खेत के आसपास से चारा इकट्ठा कर लेता है, गांवों और आदिवासी इलाकों के लोग भोजन का इंतजाम भी आसपास के जंगलों से कर लेते हैं। अगर अपने यहां जीएम फसलों का इस्तेमाल होने लगा और खरपतवारनाशक मशीनों से डाले जाने लगे, तो फसल तो नहीं, पर बाकी सभी वनस्पति नष्ट हो जाएगी। ऐसे में किसान को पशुओं के लिए चारा भी नहीं मिलेगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खरपतवारनाशक जैव विविधता खत्म करने के साथ मानव स्वास्थ्य पर भी असर डालते हैं।
देश की तेरह राज्य सरकारों ने बीटी बैंगन समेत दूसरी जीएम फसलों के खिलाफ केंद्र को पत्र लिखा है। भाजपा की राज्य सरकारें भी इसके खिलाफ है। ऐसे में जीएम फसल के संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा अनुमति देना संघीय व्यवस्था के उल्लंघन का भी मुद्दा है।