फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Ground reality different politics and trick of presenting statistics out of context for political gains

राजनीतिक विमर्श में धुंधलाती जमीनी हकीकत: संदर्भों से काटकर आंकड़े पेश करने की जुगत, सियासी फायदे की तलाश...

Tue, 08 Apr 2025 04:49 AM IST
Badri Narayan बद्री नारायण
Updated Tue, 08 Apr 2025 04:49 AM IST
विज्ञापन
सार
भारत में शिक्षा का क्षेत्र लगातार विकसित और विस्तारित हो रहा है, लेकिन विपक्ष जमीन पर हो रहे बदलावों की तरफ से आंखें मूंदकर अपने ढंग से आंकड़ों और संदर्भों से काटकर राजनीतिक विमर्श रच रहा है और इनमें सियासी फायदे की संभावनाएं भी तलाश रहा है।
loader
Ground reality different politics and trick of presenting statistics out of context for political gains
स्कूल में कंप्यूटर-शिक्षण सामग्री। (प्रतीकात्मक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय जनतांत्रिक राजनीति के स्वरूप में इन दिनों कुछ नए परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। ये नए बदलाव भारतीय राजनीति के गोलबंदी के मुद्दों से जुड़े हुए हैं। गोलबंदी के लिए जाति एवं धर्म से जुड़े मुद्दे तो आज भी चल रहे हैं, लेकिन बिजली, पानी और सड़क जैसे मुद्दे, जो 2014 के पहले प्रभावी थे, वे अब सुनाई़़ नहीं पड़ते। इसका मुख्य कारण यह है कि अब गांव-गांव तक सड़क, हाईवे, बिजली, पानी पहुंचता जा रहा है। फलतः राजनीतिक दलों के लिए इन मुद्दों के इर्द-गिर्द राजनीतिक गोलबंदी की संभावना भी क्षीण होती जा रही है।



ऐसे में राजनीतिक दल अपनी राजनीति के लिए नए मुद्दों की तलाश में लगे हैं। भारत में हो रहे तीव्र गति से ढांचागत विकास के कारण इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े अन्य मुद्दे भी अपने राजनीतिक अर्थ खोते जा रहे हैं, ऐसे में मानवीय विकास से जुड़े मुद्दों यथा शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि को राजनीतिक मुद्दों में तब्दील किया जाने लगा है। यह जानना रोचक है कि शिक्षा, जो भारत के भविष्य एवं विकसित भारत का आधार है, उसे राजनीतिक विमर्श में लाने की कोशिशें की जा रही हैं। ऐसी ही दो कोशिशें हाल में देखने को मिली हैं। एक तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी का शिक्षा पर एक वीडियो संवाद का जारी होना, दूसरा, कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी का द हिंदू में छपा आलेख। इन दोनों प्रयासों में एक पैटर्न दिखाई पड़ता है। यह पैटर्न है-शिक्षा को राजनीतिक विमर्श में लाकर उसे राजनीतिक गोलबंदी के लिए इस्तेमाल करना।


दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी से जुड़े राजनीतिज्ञ एवं बौद्धिक अनेक आंकड़ों से यह प्रस्तावित करते हैं कि भारत में शिक्षा के विकास को दो भागों में बांटकर देखा जाए, पहला-2014 के पहले भारत में शिक्षा की दशा और दिशा, दूसरा-2014 के बाद के भारत में शिक्षा की दशा एवं दिशा। उनका तर्क है कि 2014 के बाद से भारत में शिक्षा एक तरफ जमीन से जुड़ी है, दूसरी तरफ, उसने वैश्विक पटल पर भी अपनी धाक जमाई है। उसने 2014 के पहले की शिक्षा की प्रभावी अंग्रेजी केंद्रित अभिजात्यता को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 लाकर ध्वस्त करने की कोशिश की है। साथ ही उसे मातृभाषा से तो जोड़ा ही है, उसमें अनेक उपेक्षितों की आवाजों और सपनों को भी शामिल किया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, जिस पर सोनिया गांधी ने बिना संवाद के लागू किए जाने का आरोप मढ़ा है, वह वस्तुतः दुनिया के सबसे बड़े ‘संवाद अभ्यास’ (कन्सलटेशन एक्सरसाइज) से उभरा है। इसमें सरकार-केंद्र एवं राज्य, दोनों के राजनीतिज्ञ, अधिकारी, शिक्षाविद, छात्र, थिंकटैंक, शिक्षा संस्थाएं, जनजातीय, अनुसूचित संवर्गों के प्रतिनिधियों, गांव, नगर, कस्बा सबसे संवाद किया गया है।

दूसरे, 2014 के पहले शिक्षा पर खर्च कभी भी देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ पाया था, वह आज बढ़कर 4.6 फीसदी हो गया है। इसका असर देश के शोध एवं शिक्षण के परिवेश में साफ-साफ दिख रहा है। गांवों में स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों में इन्फ्रास्ट्रक्चर में विकास एवं विस्तार हुआ है। साथ ही इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च से लगातार शोध परियोजनाएं, संगोष्ठी-सहयोग, दूरस्थ क्षेत्रों से लेकर मेट्रोपोल तक के शोध छात्रों, फैकल्टी एवं शिक्षा संस्थाओं को दिया जा रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी शिक्षा संस्थाओं को लगातार आर्थिक एवं अन्य सहयोग योजनाओं से संवर्धित करता जा रहा है। ब्लैक बोर्ड से आगे बढ़कर क्लास रूम में ‘डिजिटल बोर्ड’ तक हम पहुंच गए हैं। देश के ज्यादातर शिक्षा संस्थान धीरे-धीरे ‘स्मार्ट क्लास’ के लक्ष्य को भी प्राप्त करते जा रहे हैं। शोध आधारित आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि जहां 2013-14 की यह सुविधा मात्र 53 फीसदी स्कूलों एवं शिक्षा संस्थानों में उपलब्ध थी, वह अब 90 प्रतिशत शिक्षा केंद्रों तक पहुंच गई है।

2014 के पहले जहां करीब 43 फीसदी स्कूलों में हैंडवॉश उपलब्ध रहते थे, वे अब 93 फीसदी स्कूलों में पहुंच गए हैं। 2014 के पहले इंटरनेट सुविधा, जहां 7.3 फीसदी स्कूलों में उपलब्ध होती थी, वह अब 33.9 फीसदी स्कूलों में उपलब्ध हो गई है। 2014 के पहले स्कूलों में जहां 38 लाख के आसपास महिला शिक्षिकाएं थीं, उनकी संख्या अब 49 लाख के करीब पहुंच गई है। सरकारी क्षेत्र में लगातार नए शिक्षा संस्थान खुल रहे हैं। 2014 के बाद 17 फीसदी बढ़ोतरी उच्च शिक्षा संस्थानों को प्रारंभ करने के प्रयासों में पाई गई है।

अगर 2014 के पूर्व से आज की स्थिति की तुलना करें, तो नए विश्वविद्यालयों के खुलने एवं स्थापित होने की गति में 59 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। देश में लगातार नए कॉलेज भी खुल रहे हैं। उनकी संख्या में 2014 के बाद 21.1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। आज कॉलेजों की संख्या 38,498 से बढ़कर 46,624 हो गई है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था का यह विकास एवं विस्तार इस बात से समझा जा सकता है कि 2004-05 में हमारे देश में मात्र 16,000 कॉलेज थे, 95 डीम्ड यूनिवर्सिटी, 329 राज्य एवं केंद्रीय विश्वविद्यालय ही मौजूद थे। अनेक आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति, छात्रों के नामांकन तथा शिक्षा की गुणात्मकता में व्यापक विस्तार हुआ है। उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी (नामांकन दर) 2014 की स्थिति से 32 फीसदी बढ़ चुकी है। यह प्रगति खासकर चिकित्सा विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और कला जैसे क्षेत्रों में स्पष्ट है, जहां महिलाएं अब नामांकन में नेतृत्व कर रही हैं।

इन सबसे जाहिर होता है कि भारत में शिक्षा का क्षेत्र लगातार अपना विकास एवं विस्तार करता जा रहा है। सरकार अपने संसाधनों का एक बेहतर हिस्सा आज शिक्षा पर खर्च कर रही है। शिक्षा में गुणात्मकता के विकास पर लगातार नजर रखी जा रही है। इससे जाहिर होता है कि राजनीतिक विमर्श को आज जमीन की सच्चाइयों से ज्यादा मतलब नहीं रह गया है। वह अपने ढंग से आंकड़ों और संदर्भों से काट कर राजनीतिक विमर्श रचता है एवं इनमें राजनीतिक गोलबंदी की संभावनाएं तलाशता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed