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मनोरंजन खत्म, ज्ञानरंजन शुरू
यशवंत व्यास
Updated Sat, 17 May 2014 01:54 AM IST
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अभी बहत्तर घंटे पहले हमारे एक अत्यंत बुद्धिमान मित्र का फोन आया था। आवाज कांप रही थी।
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'क्या लगता है? ये आदमी काबिज हो जाएगा?'
मैंने कहा, 'इस देश में काबिज होने का धंधा नहीं फलता। या तो उसे चुना जाएगा या उसे नहीं चुना जाएगा। आप चिंता मत कीजिए। यह देश अपना सत्य निर्धारित करना जानता है।'
वे आधे घंटे तक इस तरह जूझते रहे जैसे इस देश में जनतंत्र को हथिया लिया जाने वाला है और जनहितैषियों को इकट्ठे होकर तानाशाह को रोकने वाले गीत गाने चाहिए। अभाव इतना था कि इसके लिए गीतों के बोल वे उनसे उधार ले रहे थे जो घोटालों, संप्रदायों, जातियों, जेलों और खानदानी गोटियों से खुद शाहाना जिंदगी जीते रहे हैं। मुझे हैरत हुई। उन्होंने प्रतीक उल्टे कर लिए थे और खुद उन्हें सीधा स्थापित कर देना चाहते थे।
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अब उनका मोबाइल बंद है।
वे रसूल हमजातोव की किताब का वह पन्ना भूल गए हैं, जिसमें लिखा था- 'कहते हैं कि सागर की जगह कभी उदास और वनस्पतिविहीन मरुस्थल था। बाद में उसने पर्वतों को देखा और हर्षोल्लास से ओतप्रोत होकर उनके दामन में अपना नीला विस्तार फैला लिया। कहते हैं कि पर्वत कभी आपस में लड़ने वाले अजगर थे। बाद में उन्होंने सागर को देखा और चकित होकर बुत बने रह गए तथा पाषाणों में बदल गए।'
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व्यर्थ ही तो नहीं कहा जाता, परिन्दे को पत्थर मारो-परिन्दा मर जाएगा, परिन्दे को पत्थर पर मारो-परिन्दा मर जाएगा।
रसूल के इस सुंदर संदर्भ को भूलकर बार-बार मनचीते गीत गाने वाले जब निराशा के ज्योतिषियों में बदलकर भी अपनी 'इंडिया इंटरनेशनल' प्रासंगिकता जनता के सिर मढ़ना चाहते हैं तो यही होता है। कोई देश छोड़ने की धमकी देना चाहता है, कोई समंदर में डूबने की सलाह देना चाहता है, किसी को पाकिस्तान से हवाएं आती दिखाई देती हैं। पर उस आम इंसान का सम्मान कोई नहीं करना चाहता, जो केजरीवाल को भी जगह देता है और स्मृति ईरानी को भी। किसी भी एक पार्टी को 1984 के बाद पूर्ण बहुमत मिलने का, एक स्थिर सरकार बनने का और पूरी तरह से नए सशक्त परिवर्तनकारी आदेश देने का इरादा यदि उसने किया है, तो उसका सम्मान करने का माद्दा क्यों नहीं दिखाया जाना चाहिए। और यदि फिर भी आत्मा को कष्ट है, तो नई संसद को अपना काम करने और दिखाने की मोहलत देकर, कुछ धीरज तो धरना ही चाहिए।
ब्रांड और कोर वैल्यू
पूरा चुनाव मीडिया के लिए एक मनोरंजक सोप ऑपेरा जैसा बन गया था, जिसमें बयानों के मजे लिए जाते रहे, ब्रांडिंग और मार्केटिंग की रणनीतियों की चौबीसों घंटे बौछार होती रही और दिलचस्प बात यह है कि कुछ लोगों ने यह मान लिया कि यह प्रचार का धंधा ही था जिसने मोदी को मेगास्टार बना दिया। दरअसल किसी भी ब्रांड की कोर वैल्यू को समझे बिना इसका विश्लेषण करना घोर अर्थहीन एकालाप है। बिना ऊंची कोर वैल्यू के ब्रांड नहीं खड़ी होती। क्या मनमोहन सिंह वे अर्थशास्त्री नहीं थे, जिनके करकमलों से ग्लोबलाइजेशन का मंगलाचरण संपन्न हुआ था? पूंजी और बाजार के जिस खेल को दक्षिणपंथी कहा जाता रहा है, वह मध्य-वाम के हाथों काफी पहले खेला जा चुका है। दूसरा पक्ष सांप्रदायिकता का है जिसे 'राष्ट्रवाद' के पोस्टर में बदल जाने का खतरा दिखाने वाले खुद उसका शिकार हो गए हैं। हालत यह नहीं थी कि मीडिया, कॉरपोरेट की मदद से मोदी-गीत गा रहा था, सच यह था कि मोदी-गीत के बिना टीआरपी गड्ढे में चली जाती थी। रॉबर्ट वाड्रा की खबर न छापने से, प्रियंका गांधी का ग्राफ नहीं उठाया जा सकता। गुजरात की कमियां खोल-खोलकर हांफने से अमेठी की बदहाल सड़कों को नहीं ढका जा सकता। कैमरे की बहसों से जनता 'रोड शो' में नहीं उतरती। जब 'मोदी विरुद्ध शेष सभी' हो गया तो जनता ने 'फेंकू' और 'पप्पू', 'चाय वाले' और 'शहजादे', 'मौत के सौदागर' और 'नीच' का सार्थक अनुवाद कर दिया।
अब जब मनोरंजन समाप्ति के बाद जिम्मेदारियां सामने खड़ी हैं तब ज्ञानरंजन का दौर शुरू हो गया है।
चलो, मजबूरन ज्ञानी मान लेते हैं कि नरेंद्र मोदी की जीत, 'ब्रांड' नरेंद्र मोदी की ही जीत है। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि जो साबुन खूब विज्ञापन के बाद घर पहुंचे और कपड़े फाड़ दे तो, कभी नहीं बिकता? इसकी प्रतीक्षा आडवाणी-भक्तों, उनके प्रेमी नीतीश ब्रांड मित्रों, जनपथ केंद्रित कांग्रेसियों और निरपेक्ष जशोदाबेन की चिंता में आंसू बहाने वाले समाजसेवी महानुभावों को निश्चित ही करने का अधिकार है। किंतु, यह विचार कि एक दिन हम इसे पत्थर साबित कर देंगे, यह तो उन पर नहीं साबुन पर ही निर्भर करेगा। तब तक उसे खारिज करने के लिए तर्कों की तैयारी महज ज्ञानरंजन के लिए उत्तम है, देश-दिशा के निर्धारण के लिए नहीं। यह ऐतिहासिक है कि एक व्यक्ति ने आजादी के बाद समूची धुरी को बदल दिया है। इसे मानकर आप किसी पर एहसान नहीं करने जा रहे, न ही पाताल में चले जा रहे हैं।
अहंकार के ध्वस्त किलों से कंगूरों की गिनती
इस झूठ को कितनी बार दोहराया जाएगा कि पिछली सरकारें सोनिया-राहुल नहीं चलाते थे। और, हार की जिम्मेदारी एक लाइन की व्यक्तिगत तथा सौ लाइन की सामूहिक है या कॉरपोरेट ताकतों के प्रचार तंत्र ने सत्ता का केंद्र बदल दिया है।
किस कॉरपोरेट समूह ने कांग्रेस को चंदा और सेवाएं नहीं दी हैं? किस मीडिया ने राहुल गान नहीं किया है? 'गुजरात के सच को उजागर' करने की सारी टाइमिंग क्या संयोग से सैट होती रही होगी? दरअसल, पूंजी तो उसके पीछे भागती है जिसका राज हो। जब राज बनने की संभावनाएं मामूली शर्ट-पेंट मफलर लेकर निकले अरविंद केजरीवाल में दिखने लगी तो कई कॉरपोरेट-टेक्नोक्रेट उसमें भी कूदने लगे थे। सामूहिक भावनाओं को शक्तिशाली नायक की तलाश होती है। आप रैली रोकते हैं, तो बंद कार के ही काफिले भी 'रोड शो' में तब्दील हो जाते हैं। अहंकार के ध्वस्त किलों से कंगूरों की गिनती करने वाले सामंतों को अगर कोई अपनी कथित क्रांतिकारी कविता सौंप दे तो क्या उससे राज बच जाता है? नहीं, क्योंकि ऐसे झूठ से सजी कविता अगर प्रशस्ति की भी हो तो उसे ध्वस्त किले का आंगन नहीं, वाह-वाही का राजदरबार चाहिए। नरसिंहराव ने दस, जनपथ भुला दिया था, लेकिन कांग्रेस को नया पथ बनाने में क्या कोई रुचि शेष रही है? उस पथ का सच यह है कि वह पथ के ठेकेदारों और टोल की कमाई के अनुपात को ही गिनती रही है।
कोरे कागज से शुरू करें
स्पष्ट जनमत का मोदी - एक सच है। असफल राहुल गांधी भी सच है। नई राजनीति सच है। नया समय सच है। कुछ संभावनाएं हैं जिन पर बात होगी। पहला, देश के आर्थिक प्रशासन में निर्णायक बदलाव आ सकता है। दूसरा, एशिया की राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक ताकतों के अंतर्सम्बंधों पर गहरा काम हो सकता है। राजनीतिक प्रशासन में विषय विशेषज्ञों की सार्थक एंट्री हो सकती है। कसावट के 'पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण' राजनीतिक फॉर्मूले पर काम हो सकता है। सांप्रदायिक वोट बैंक की राजनीति और दंगों-विस्फोटों के करंसीकरण का रूप बदल सकता है। यह कठिन है, लेकिन जैसे वी.पी. सिंह के मंडल ने 'दलित-मुस्लिम' नतीजों से कांग्रेस की तीलियां बिखेर दी थीं, वैसे विकास और सामूहिक भागीदारी के प्रति ईमानदारी से कई अंतर्विरोधों को खत्म करने की दिशा में पहल हो सकती है। अहंकार से दूर, सुदृढ़ नेतृत्व की इच्छा से युवाओं ने एक चेहरे पर विश्वास किया है। उस चेहरे की पार्टी, उसके नेतृत्व की शक्ति को, विशाल भारतीय गरिमा में तब्दील कर सके तो मध्य-वाम और मध्य-दक्षिण की स्पष्ट रेखाएं उभर सकती हैं। यह जनतंत्र के लिए शुभ होगा।
कांग्रेस को भी अब तो कोरे कागजों के लिए नए जंगल कटने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।
रसूल ने लिखा था, 'दिलेर लोग ही सागर में काम करने जाते हैं, मगर सभी वहां से वापस नहीं आते। इसलिए पहाड़ी लोग वसंत के पहले फूल सागर को भेंट करते हैं और इस तरह सदा को सागर में ही रह जाने वाले सभी वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।'
मेरे फूल भी, लहरों में अनेक बार तैरते थे।
क्या कांग्रेस सुन रही है?