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शिक्षा: समय नया पर पाठ पुराना, सत्ता परिवर्तन के बाद भी बीत गये हैं कई साल

Sat, 14 Oct 2023 07:52 AM IST
tarun veejay तरुण विजय
Updated Sat, 14 Oct 2023 07:52 AM IST
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सार
सम्मानित विद्वान दिन-रात मार्क्स-लेनिन-मैकाले के बारे में बोलते हैं, पर पाठ नहीं बदलते। वह कौन-सी बात है, जो इसे सच होने से रोकती है?
 
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govt changed name of Education Ministry but lessons of colonial slave mentality does not change
CBSE board exams 2022 - फोटो : Social media

विस्तार

प्रधानमंत्री मोदी ने 16 फरवरी, 2021 को कहा था, 'जिन लोगों ने इतिहास रचा, उनके प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त इतिहासकारों के अन्याय का परिष्कार अब किया जा रहा है।' यदि किसी एक मंत्रालय का विलंबित जागरण और इतिहास संशोधन कार्य प्रधानमंत्री के इन वचनों के विरुद्ध हुआ है, तो उसका नाम है शिक्षा मंत्रालय। सदियों से औपनिवेशिक दास मानसिकता के जो पाठ बदलने का काम सत्ता परिवर्तन के बाद तुरंत होना था, वह कथित 'भगवा सरकारों' के पंद्रह वर्षों में भी होना बाकी ही है।



हाल में हम उत्तर पूर्वांचल के 10वीं के छात्रों को हिंदी पढ़ा रहे थे। सीबीएससी पाठ्यक्रम के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा प्रकाशित 2022 संस्करण वाली हिंदी पुस्तक है, क्षितिज, भाग दो। पृष्ठ 94, पाठ संस्कृति। लेखक हैं भदंत आनंद कौसल्यायन। संपादक के स्थान पर नामवर सिंह का नाम है। इस पाठ में प्रागैतिहासिक काल के गुहावासियों के आग तापते हुए चित्र हैं। गांधी का नहीं, राम, कृष्ण, नानक, महावीर, बुद्ध, तेगबहादुर, थिरूवल्लुवर या शंकर देव का नहीं। भारत की संस्कृति का प्रथम परिचय ही गुहावासी है। उसमें आगे लिखा है, 'रूस का भाग्य विधाता लेनिन अपनी डेस्क में रखे डबल रोटी के सूखे टुकड़े स्वयं न खाकर दूसरों को खिला दिया करता था। वह आखिर ऐसा क्यों करता था? संसार के मजदूरों को सुखी देखने का स्वप्न देखते हुए कार्ल मार्क्स ने अपना सारा जीवन दुख में बिता दिया। और इन सबसे बढ़कर आज नहीं, आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व सिद्धार्थ ने अपना घर केवल इसलिए त्याग दिया...।'


यानी गौतम बुद्ध, लेनिन और मार्क्स एक श्रेणी में डाल दिए गए। पाठ भारत के स्कूल में, परिचय संस्कृति का, संदर्भ कहीं और का। जाहिर है, यह एक विचारधारा को पाठ्यक्रम के जरिये बच्चों में बोने का उपक्रम है। यह वर्तमान वर्ष में देश भर के लाखों विद्यालयों में पढ़ाई जानेवाली पुस्तक थी। कमेटी बन गई होगी, लेकिन अभी तक परिणाम प्रतीक्षित हैं। नए समय में किताबें बदलने का बड़ा शोर है, परंतु वास्तविकता इसके विपरीत है। पाठ्यक्रमों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय, दत्तोपंत ठेंगड़ी या दामोदर गणेश बापट तो नहीं आ गए हैं। मां शारदा, लक्ष्मीबाई केलकर, रानी चेनम्मा, वेलु नाच्चियार, आण्डाल, अव्वैयार, गाइदिन्लिउ को भी कहीं जगह नहीं मिली।

जब गृहमंत्री अमित शाह वामपंथी अतिवाद के समापन के संकल्प की बात करते हैं, तब उनका संकेत लेनिन और मार्क्स की विचारधारा मानने वाले नक्सलियों के पूर्ण अंत से होता है। लेकिन उन नक्सलियों के तथाकथित आदर्श आज भी बच्चों को पाठ्यपुस्तकों में गरीबी और शोषण से मुक्तिदाताओं के रूप में पढ़ाए जा रहे हों, तो यह विसंगति स्तब्धकारी है।

कक्षा आठ की पुस्तक वूमेन, कास्ट ऐंड रिफॉर्म के पृष्ठ 113 और 119 का अवलोकन करें, तो पता चलेगा, यहां झूठा आभास दिया गया कि पंडित रमाबाई हिंदू धर्म सुधारिका थीं, जबकि वह अति घोर हिंदू विरोधी ईसाई महिला पादरी थीं, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद पर इतने सार्वजनिक आक्रमण किए कि उनको रमाबाई का विषैलापन अपनी जीवन कथा में बताना पड़ा। रामास्वामी नायीक्कर ने देवमूर्तियों पर सार्वजनिक शोभायात्राओं में जूते मारे, वैदिक विवाह का निषेध किया और स्त्री के दैहिक शोषण का आरोप झेला। गलत शिक्षा विकृत असत्याधारित मानस के नागरिक भी पैदा कर सकती है।

केरल की चौथी कक्षा की शासकीय पाठ्यपुस्तक में एक पाठ बच्चों को बताता है- अभिमन्यु कभी दांत नहीं साफ करता, उसके मुख से दुर्गंध आती है। सामने ही उदाहरण है- मैं आदिल हूं, स्वस्थ रहने वाली आदतों को पालता हूं। दूसरे पाठ में दो मिठाई विक्रेताओं के रेखाचित्र दिए गए हैं। गंदे, मक्खियों वाले मिठाई विक्रेता का नाम अप्पन लिखा है, साफ सुंदर विक्रेता का नाम लिखा- असलम। फिर लिखा- आप किससे मिठाई खरीदेंगे? यह बच्चों को पढ़ाने का तरीका नहीं है। यह तो सांप्रदायिक घृणा फैलाने का उपक्रम हो जाता है।

सम्मानित विद्वान दिन-रात मार्क्स-लेनिन-मैकाले के बारे में बोलते रहते हैं, लेकिन पाठ नहीं बदलते। आखिर वह कौन-सी बात है, जो इस बदलाव को सच होने से रोकती है?

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